Breaking
► पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर में मुकेश कुमार शर्मा ने चलाया जनसंपर्क अभियान ► कल्याण में दो नाबालिग बच्चियों के साथ यौन अपराध, पुलिस ने दोनों आरोपियों को दबोचा ► बिहार में दुर्गा पूजा सप्तमी पर खिलेगी धूप, उमस भरी गर्मी से रहना होगा सतर्क ► सिवनी के लखनादौन सिविल अस्पताल में लापरवाही, सुरक्षा गार्ड करता दिखा मरीजों का चेकअप ► बाहुबली विधायक अनंत सिंह की बगावत, जेडीयू उम्मीदवार के खिलाफ खोला मोर्चा ► आयकर विभाग को नहीं मिल रहा 5,121 करोड़ रुपये के लेनदेन का हिसाब ► नवादा: रेलवे कॉलोनी में मां दुर्गा का पट खुलते ही उमड़े श्रद्धालु, बंगाली रीति-रिवाजों से हो रही पूजा ► हरदोई में आईडीबीआई बैंक के निजीकरण के खिलाफ प्रदर्शन, कर्मियों ने बांधी काली पट्टी ► वाराणसी: मिशन शक्ति 6.0 के तहत कैंट थाने में सम्मानित हुए सुलह करने वाले परिवार ► औरेया में अनोखा मामला: 75 साल के बुजुर्ग और 30 साल की युवती की शादी तय ► पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर में मुकेश कुमार शर्मा ने चलाया जनसंपर्क अभियान ► कल्याण में दो नाबालिग बच्चियों के साथ यौन अपराध, पुलिस ने दोनों आरोपियों को दबोचा ► बिहार में दुर्गा पूजा सप्तमी पर खिलेगी धूप, उमस भरी गर्मी से रहना होगा सतर्क ► सिवनी के लखनादौन सिविल अस्पताल में लापरवाही, सुरक्षा गार्ड करता दिखा मरीजों का चेकअप ► बाहुबली विधायक अनंत सिंह की बगावत, जेडीयू उम्मीदवार के खिलाफ खोला मोर्चा ► आयकर विभाग को नहीं मिल रहा 5,121 करोड़ रुपये के लेनदेन का हिसाब ► नवादा: रेलवे कॉलोनी में मां दुर्गा का पट खुलते ही उमड़े श्रद्धालु, बंगाली रीति-रिवाजों से हो रही पूजा ► हरदोई में आईडीबीआई बैंक के निजीकरण के खिलाफ प्रदर्शन, कर्मियों ने बांधी काली पट्टी ► वाराणसी: मिशन शक्ति 6.0 के तहत कैंट थाने में सम्मानित हुए सुलह करने वाले परिवार ► औरेया में अनोखा मामला: 75 साल के बुजुर्ग और 30 साल की युवती की शादी तय

बढ़ती उम्र या अल्जाइमर? माता-पिता के इन बदलावों को भूलकर भी न करें नजर अंदाज

बढ़ती उम्र या अल्जाइमर? माता-पिता के इन बदलावों को भूलकर भी न करें नजर अंदाज

घर के बड़े-बुजुर्गों के साथ वक्त बिताना और उनके चेहरे पर मुस्कान देखना हर संतान की ख्वाहिश होती है। लेकिन, जैसे-जैसे उम्र ढलती है, उनके शरीर के साथ-साथ उनके व्यवहार और मानसिक क्षमता में भी कुछ बदलाव आने लगते हैं। हम में से ज्यादातर लोग इन बदलावों को बहुत ही सहजता से लेते हुए यह मान लेते हैं कि यह तो बस 'उम्र का तकाजा' या बुढ़ापे का असर है। लेकिन, क्या आपने कभी गहराई से सोचा है कि क्या वाकई यह सिर्फ उम्र का असर है या फिर इसके पीछे कोई गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी छिपी है?

उम्र का असर या किसी बड़ी बीमारी की आहट?आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अपने बुजुर्ग माता-पिता की छोटी-बड़ी आदतों पर उस तरह से ध्यान नहीं दे पाते, जैसी जरूरत होती है। जब वे किसी बात को भूलने लगते हैं या थोड़ा चिड़चिड़ाने लगते हैं, तो हम उसे नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह लापरवाही भारी पड़ सकती है। फोर्टिस अस्पताल, नोएडा की सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट, डॉ. नेहा पंडिता के अनुसार, माता-पिता के स्वभाव और दिनचर्या में आने वाले छोटे-छोटे बदलाव किसी गहरी परेशानी का शुरुआती संकेत हो सकते हैं।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारे माता-पिता कभी भी खुलकर यह स्वीकार नहीं करते कि उन्हें किसी प्रकार की शारीरिक या मानसिक तकलीफ हो रही है। उनके मन में हमेशा एक अज्ञात डर बना रहता है कि अगर उन्होंने अपनी किसी कमजोरी का जिक्र किया, तो घर के लोग उनकी स्वतंत्रता पर पाबंदी लगा देंगे या उन्हें लाचार समझ लेंगे। कई बार तो वे खुद भी अपनी घटती मानसिक क्षमताओं से अनजान होते हैं। ऐसे में परिवार के सदस्यों की यह नैतिक और पारिवारिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वे इन संकेतों को समय रहते पहचानें और सही कदम उठाएं।

इन बदलावों को 'उम्र का असर' कहकर न करें इग्नोर

यह समझना बेहद जरूरी है कि केवल यह बात मायने नहीं रखती कि माता-पिता क्या भूल रहे हैं, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने कौन से ऐसे काम करने बिल्कुल बंद कर दिए हैं जो वे पहले रोज किया करते थे। आइए इसे कुछ व्यावहारिक उदाहरणों से समझते हैं:

  • रसोई से दूरी: अगर आपकी मां जो बरसों से अपने हाथ के बेहतरीन खाने के लिए जानी जाती थीं, अचानक रसोई में जाने से कतराने लगें या खाना पकाने के चरण यानी रेसिपी के क्रम को ही उलझाने लगें, तो इसे सिर्फ पसंद का बदलना न समझें।
  • हिसाब-किताब में गड़बड़ जो पिता जीवनभर घर का पूरा बजट और वित्तीय लेन-देन संभालते आए हैं, वे अचानक बिजली का बिल भरना भूल जाएं या पैसों के मामलों में पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाएं, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
  • रास्ता भूल जाना: नई जगह का रास्ता भटकना कभी-कभार आम हो सकता है, लेकिन अगर वे अपने ही शहर के जाने-पहचानी गलियों, आसपास के बाजारों या पार्क में जाने से झिझकने लगें या रास्ता भूल जाएं, तो यह अल्जाइमर का संकेत हो सकता है।

चश्मा भूलना और चश्मे का इस्तेमाल भूलना- दोनों में है फर्क

न्यूरोलॉजी के जानकारों का स्पष्ट कहना है कि चीजों को भूल जाना और उन चीजों के बुनियादी इस्तेमाल को भूल जाना, दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। उदाहरण के लिए, चश्मा कहां रखा है यह भूल जाना सामान्य बुढ़ापे का हिस्सा हो सकता है, लेकिन चश्मा हाथ में आने के बाद भी यह समझ न पाना कि उसे आंखों पर कैसे लगाया जाता है, एक अलग ही स्तर की मानसिक समस्या का संकेत है। इसी तरह, एक ही बातचीत को बार-बार दोहराना और थोड़ी देर पहले पूछी गई बात को दोबारा पूछना भी इसी फेहरिस्त में आता है।

बातचीत में अटकना और व्यक्तित्व में अचानक बदलाव

अल्जाइमर या डिमेंशिया के शुरुआती दौर में व्यक्ति को अपने विचारों को शब्दों में पिरोने में दिक्कत आने लगती है। यदि आप गौर करें कि आपके माता-पिता बातचीत करते वक्त सही शब्द खोजने में संघर्ष कर रहे हैं, चीजों के नाम लेने की बजाय उनका लंबा-चौड़ा विवरण दे रहे हैं, या बोलते-बोलते अपनी बात बीच में ही भूल जा रहे हैं, तो आपको तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए।

इसके अलावा उनके व्यवहार में निम्नलिखित बदलाव भी देखे जा सकते हैं:

  • अचानक बिना किसी ठोस वजह के बहुत ज्यादा शक्की या चिड़चिड़ा हो जाना।
  • बागवानी, पढ़ना, संगीत सुनना या सुबह टहलना जैसे अपने बरसों पुराने पसंदीदा शकों से अचानक पूरी तरह किनारा कर लेना।
  • सामाजिक मेल-जोल कम करना और लोगों से मिलने-जुलने से कतराना।
  • निर्णय लेने की क्षमता का कमजोर होना, जैसे अनाप-शनाप खर्चे करना, बेकार की चीजें खरीद लाना या साइबर ठगों या ऑनलाइन धोखाधड़ी का आसानी से शिकार बन जाना।

हर बदलाव नहीं होता 'डिमेंशिया'

यह बात दिमाग से बिल्कुल निकाल देनी चाहिए कि उम्र के हर पड़ाव पर दिखने वाला मानसिक बदलाव सीधे तौर पर डिमेंशिया या अल्जाइमर ही है। कई बार गंभीर अकेलापन, पुराना डिप्रेशन, नींद की कमी, कम सुनाई देना या फिर किसी अन्य बीमारी में खाई जाने वाली दवाइयों के साइड-इफेक्ट्स के कारण भी ऐसे ही लक्षण उभर सकते हैं। इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के खुद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाना और हर लक्षण को एक खतरनाक बीमारी का नाम दे देना बिल्कुल सही नहीं है।

सबसे समझदारी भरा तरीका यह है कि आप उनके आज के व्यवहार की तुलना किसी बाहरी या हमउम्र व्यक्ति से न करें, बल्कि उनके खुद के बीते हुए सालों के व्यवहार से उनकी तुलना करें। अगर आपको गिरावट साफ नजर आए, तो डॉक्टर के पास जाने का समय आ गया है।

प्यार और संवेदनशीलता से बढ़ाएं मदद का हाथ

परिवार का मुख्य उद्देश्य किसी बीमारी का खुद मेडिकल निदान करना नहीं होता, बल्कि समय रहते लक्षणों को पहचानकर अपने बुजुर्गों को बेहतर मेडिकल सपोर्ट और प्यार देना होता है। जब भी आपको उनके बर्ताव में कोई असामान्य बात दिखे, तो कभी भी सीधे यह न कहें कि "आपको कोई मानसिक बीमारी हो रही है" या "आप भूलने की बीमारी से घिर गए हैं।" ऐसा कहने से वे और ज्यादा डिप्रेशन में जा सकते हैं या आपसे चीजें छिपाने लग सकते हैं।

इसके बजाय उनके पास बैठकर बहुत ही नरमी और प्यार से कहें, "मैंने महसूस किया है कि आजकल आपको इस काम को करने में कुछ परेशानी हो रही है, क्या कोई बात है जो आपको अंदर ही अंदर परेशान कर रही है?" आपका यह अपनापन और भरोसा उनके आधे तनाव को कम कर देगा।

याद रखिए, अल्जाइमर जैसी बीमारियां किसी बड़े खतरे के सायरन के साथ नहीं आतीं, बल्कि यह रोजमर्रा की छोटी-छोटी अनदेखी बातों में चुपके से पैर पसारती हैं—जैसे एक अनभरा हुआ बिल, छूट गया कोई पुराना शौक, या जाने-पहचाने रास्ते पर आया हुआ असमंजस। इन संकेतों से घबराने के बजाय थोड़ी सी जागरूकता, संवेदनशीलता और वक्त पर डॉक्टर की सही सलाह आपके पूरे परिवार के लिए एक ढाल साबित हो सकती है।ी:

About the Author

रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

Writer

रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

Read More

अगली खबर पढ़ें:

आगे पढ़ें →