आईडीबीआई बैंक में केंद्र सरकार और एलआईसी की हिस्सेदारी बेचने के विरोध में हरदोई के बैंककर्मियों ने किया प्रदर्शन, सरकार के फैसले को बताया आर्थिक संप्रभुता के खिलाफ।
हरदोई जिले में आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी कनाडा की निजी कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को बेचे जाने के प्रस्तावित निर्णय का विरोध तेज हो गया है। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन्स (यूएफबीयू) की हरदोई इकाई के आह्वान पर बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों ने शुक्रवार को हाथों में काली पट्टी बांधकर और विरोध बैज लगाकर अपनी नाराजगी दर्ज कराई। इस दौरान केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की गई और फैसले को तुरंत वापस लेने की मांग उठाई गई।
सार्वजनिक क्षेत्र की हिस्सेदारी और विदेशी निवेश पर उठे सवाल
यूनियन प्रतिनिधियों ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जिस आईडीबीआई बैंक में केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की संयुक्त रूप से करीब 94 प्रतिशत हिस्सेदारी है, उसे एक विदेशी निजी निवेशक को सौंपने का कोई तार्किक औचित्य नहीं बनता है। प्रदर्शनकारियों के मुताबिक, यह कदम देश की बैंकिंग व्यवस्था, आम जनता की गाढ़ी कमाई की सुरक्षा और देश की आर्थिक संप्रभुता के सीधे खिलाफ है।
बैंक के वित्तीय आंकड़े और जमा पूंजी
प्रदर्शन के दौरान बैंक यूनियनों ने संस्थान के मजबूत वित्तीय स्वास्थ्य का हवाला दिया। यूनियन के आंकड़ों के अनुसार, आईडीबीआई बैंक में देश के आम नागरिकों की लगभग 3.50 लाख करोड़ रुपये की बड़ी जमा राशि सुरक्षित है। इसके अलावा, बैंक ने पिछले तीन वित्तीय वर्षों के दौरान कुल 22,600 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ (नेट प्रॉफिट) अर्जित किया है। इन मजबूत आंकड़ों के बावजूद निजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।
संसद में दिए गए पुराने आश्वासनों की याद
बैंककर्मियों ने वर्ष 2003 के उस घटनाक्रम का भी जिक्र किया जब आईडीबीआई को एक सामान्य बैंकिंग कंपनी में परिवर्तित किया गया था। उनका आरोप है कि उस समय सरकार ने संसद में स्पष्ट आश्वासन दिया था कि सरकारी हिस्सेदारी को किसी भी स्थिति में 51 प्रतिशत से कम नहीं किया जाएगा। यूनियनों का कहना है कि वर्तमान में लिया जा रहा यह निर्णय संसद में दिए गए उस आधिकारिक आश्वासन के बिल्कुल विपरीत है।
आरक्षण और सामाजिक न्याय पर संभावित असर
निजीकरण के इस दौर में सामाजिक सुरक्षा और संवैधानिक प्रावधानों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। बैंक यूनियनों ने आशंका जताई कि निजी हाथों में कमान जाने के बाद अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और पूर्व सैनिकों के लिए वर्तमान में लागू आरक्षण व्यवस्था और रोस्टर प्रणाली के भविष्य पर संकट आ सकता है। उनका तर्क है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल व्यावसायिक लाभ कमाने वाली इकाइयां नहीं हैं, बल्कि वे देश में सामाजिक न्याय की धुरी भी हैं।
'आत्मनिर्भर भारत' के नारे पर बहस
प्रदर्शनकारियों ने सरकार के प्रमुख अभियान 'आत्मनिर्भर भारत' के लक्ष्य और देश के एक अहम बैंक में विदेशी निजी कंपनी की हिस्सेदारी बढ़ाने की नीति के बीच सीधा विरोधाभास होने का दावा किया। यूएफबीयू ने चेतावनी देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि केंद्र सरकार ने इस निजीकरण के फैसले को वापस नहीं लिया, तो आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों को और अधिक व्यापक स्तर पर तेज किया जाएगा।