नवादा के ऐतिहासिक रेलवे कॉलोनी में शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर मां दुर्गा के पट खुलते ही दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ पड़ा है। पट खुलते ही पूरा क्षेत्र माता के जयकारों और भक्तिमय गीतों से गूंज उठा है, जहां बड़ी संख्या में पहुंचकर श्रद्धालु अपने परिवार की सुख, शांति और समृद्धि की कामना कर रहे हैं।
आधुनिकता के इस दौर में भी नवादा की रेलवे कॉलोनी की यह दुर्गा पूजा अपनी प्राचीन परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए विशेष रूप से जानी जाती है। इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां आज भी पूरी तरह से पुरानी परंपराओं और विधानों का कड़ाई से पालन किया जाता है। पंडाल में माता की आराधना पूरी तरह से बंगाली रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न होती है, जो इसे आसपास के अन्य आयोजनों से अलग बनाती है।
पूजा के दौरान स्थानीय महिलाएं खुद आगे आकर मां दुर्गा के पारंपरिक और पावन भक्ति गीत गाती हैं। महिलाओं के सामूहिक और मधुर स्वरों में गूंजने वाले ये माता रानी के गीत पूरे पंडाल के माहौल को अत्यधिक आध्यात्मिक और जीवंत बना देते हैं। इस पूरी व्यवस्था और परंपरा को लेकर स्थानीय निवासी चंद्रिका यादव ने विस्तार से जानकारी दी है।
षष्ठी के दिन खुलते हैं पट
चंद्रिका यादव ने बताया कि रेलवे कॉलोनी में षष्ठी पूजा के पावन दिन ही बंगाली रीति-रिवाज के तहत मां दुर्गा का पट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाता है। इसी पारंपरिक शुरुआत के साथ ही यहां दर्शन-पूजन का विधिवत सिलसिला आरंभ होता है। उन्होंने कहा कि इन पारंपरिक तौर-तरीकों से होने वाले इस आयोजन में महिलाएं पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ हिस्सा लेती हैं, जिससे उनकी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर आज भी जीवंत बनी हुई है।
षष्ठी के दिन पट खुलने के साथ ही जिस प्रकार भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी है, उससे साफ जाहिर है कि आमजन में इस आयोजन को लेकर कितना उत्साह है। मां के अलौकिक दर्शन के साथ-साथ यहां की अनूठी बंगाली परंपराओं को देखने और अनुभव करने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंच रहे हैं। रेलवे कॉलोनी की यह दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन मात्र नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे, सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक एकता का भी एक बेहतरीन केंद्र बन चुकी है।