पश्चिम बंगाल की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। राज्य सरकार ने सरकारी स्वामित्व वाली जमीनों को लेकर एक बेहद कड़ा और बड़ा फैसला लिया है। सरकार अब पूरे राज्य में एक व्यापक सर्वे कराने जा रही है, जिसका मुख्य उद्देश्य सरकारी जमीनों पर हुए अवैध कब्जों और अतिक्रमण की पहचान करना है। इस कदम से उन लोगों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं जिन्होंने लंबे समय से सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा जमा रखा है।
राज्यव्यापी सर्वे की पूरी रूपरेखा
मिली जानकारी के अनुसार, यह महत्वाकांक्षी सर्वे पश्चिम बंगाल भूमि अभिलेख और सर्वेक्षण निदेशालय की देखरेख में किया जाएगा। यह निदेशालय राज्य के भूमि और भूमि राजस्व विभाग के अंतर्गत काम करता है। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद केवल अवैध कब्जों की पहचान करना ही नहीं है, बल्कि सरकारी स्वामित्व वाली प्रत्येक जमीन की सही सीमा (बाउंड्री) तय करना भी है ताकि भविष्य में इस तरह की अवैध गतिविधियों पर पूरी तरह लगाम लगाई जा सके।
विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि इस सर्वे के जरिए यह दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा कि कागजों में दर्ज सरकारी जमीन में से असलियत में कितनी जमीन सरकार के नियंत्रण में है और कितनी जमीन पर अवैध कब्जा हो चुका है।
पिलर गाड़कर सुरक्षित की जाएगी जमीन
अतिक्रमणकारियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार ने एक और अहम फैसला लिया है। अधिकारियों के मुताबिक, सर्वे के बाद जितनी भी सरकारी जमीन को अवैध कब्जों से मुक्त कराया जाएगा, उस पर दोबारा अतिक्रमण न हो इसके लिए जमीन की सीमाओं पर स्थायी खंभे यानी पिलर लगाए जाएंगे। इससे जमीन की बाउंड्री स्पष्ट रहेगी और कोई भी उस पर दोबारा आंख उठाने की हिम्मत नहीं कर सकेगा।
राजस्व विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक, राज्य सरकार के पास अकूत जमीन का स्वामित्व है। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि इन जमीनों का एक बड़ा हिस्सा दशकों से खाली पड़ा था। मॉनिटरिंग की कमी और प्रशासनिक सुस्ती के कारण धीरे-धीरे व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर इन जमीनों पर बड़े पैमाने पर अवैध कब्जे होते चले गए।
नई भूमि नीति और निवेश का बड़ा प्लान
इस बड़े पैमाने पर चलाए जाने वाले सर्वे के पीछे एक और बहुत बड़ा कारण छिपा है। पश्चिम बंगाल सरकार वर्तमान में एक नई भूमि नीति के तहत राज्य में बड़े पैमाने पर औद्योगिक निवेश को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है। जब बड़े निवेशक राज्य में आएंगे, तो उन्हें भारी-भरकम जमीनों की आवश्यकता होगी।
उद्योगपतियों और कंपनियों को आसानी से जमीन उपलब्ध कराई जा सके, इसके लिए जरूरी है कि सरकार के पास अपनी खाली और साफ-सुथरी जमीन का पूरा ब्योरा हो। यही वजह है कि सरकार ने युद्ध स्तर पर इन जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराने का यह बीड़ा उठाया है।
विशेषज्ञ एजेंसी को सौंपा जाएगा जिम्मा
इस कार्य को पूरी पारदर्शिता और तकनीकी दक्षता के साथ पूरा करने के लिए पश्चिम बंगाल भूमि अभिलेख और सर्वेक्षण निदेशालय ने कमर कस ली है। निदेशालय ने इस सर्वे के काम को किसी पेशेवर और विशेषज्ञ एजेंसी को सौंपने के लिए 'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल' (आरएफपी) यानी टेंडर भी जारी कर दिया है ताकि काम में किसी भी तरह की कोताही न बरती जाए।
आधुनिक तकनीक का होगा इस्तेमाल
इस सर्वे को पूरी तरह से अचूक और सटीक बनाने के लिए पारंपरिक तौर-तरीकों के बजाय आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जाएगा। विभाग इस पूरी प्रक्रिया में आधुनिक 'ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम' (GNSS) तकनीक का इस्तेमाल करेगा। सैटेलाइट आधारित इस तकनीक से इंच-इंच जमीन की पैमाइश सटीक तरीके से हो सकेगी, जिससे किसी भी तरह की हेरफेर या विवाद की गुंजाइश नहीं बचेगी।
महज 6 महीने का रखा गया है कड़ा लक्ष्य
राज्य प्रशासन इस पूरे अभियान को लेकर बेहद गंभीर और एक्टिव मोड में नजर आ रहा है। सरकार की तरफ से तय किए गए टाइमलाइन के मुताबिक, इस पूरे सर्वे की प्रक्रिया को आगामी छह महीने के भीतर हर हाल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। सर्वे पूरा होने के बाद प्रशासन के लिए सरकारी जमीन की सटीक लोकेशन, उसका कुल क्षेत्रफल और उसकी सीमाएं निर्धारित करना बेहद आसान हो जाएगा।
बहरहाल, इस मेगा सर्वे के शुरू होने से उन लोगों की नींद उड़नी तय है जिन्होंने सरकारी जमीनों पर अवैध रूप से अपने ठिकाने या व्यापार बना रखे हैं। आने वाले महीनों में पश्चिम बंगाल की भूमि नीति और अतिक्रमणकारियों के खिलाफ यह अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई साबित हो सकती है।