उम्र के उस पड़ाव पर, जब इंसान को सबसे ज्यादा अपनों के सहारे और आत्मीयता की दरकार होती है, कई बार उसकी दुनिया चंद गज की चारदीवारी में सिमट कर रह जाती है। यह कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की नहीं है, बल्कि उस आधुनिक सामाजिक ताने-बाने पर एक गहरा सवालिया निशान है, जहां तरक्की की दौड़ में रिश्ते पीछे छूटते जा रहे हैं। वाराणसी के सामने घाट इलाके में स्थित 'अपना घर आश्रम' की चौखट पर जब कदम रखते हैं, तो वहां की आबोहवा में एक खामोश दर्द घुला हुआ नजर आता है। इसी आश्रम में इन दिनों अपना बाकी बचा जीवन गुजार रही हैं 85 वर्षीय कल्पना भट्टाचार्या।
कल्पना जी की कहानी किसी को भी अंदर तक झकझोर देने के लिए काफी है। मूल रूप से कलकत्ता (अब कोलकाता) की रहने वाली कल्पना का परिवार आज के दौर के हिसाब से बेहद संपन्न और शिक्षित है। उनके बेटे एक जाने-माने कंप्यूटर प्रोग्रामर हैं, उनकी बहू पेशे से वकील हैं, और घर के दोनों पोते देश-विदेश की बड़ी तकनीकी कंपनियों में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर कार्यरत हैं। यानी आर्थिक मोर्चे पर परिवार पूरी तरह सक्षम है। बावजूद इसके, जीवन के अंतिम और सबसे नाजुक पड़ाव पर कल्पना अपने इस पढ़े-लिखे और समृद्ध परिवार के साथ नहीं, बल्कि एक वृद्धाश्रम की एक छोटी सी चौकी पर दिन काटने को मजबूर हैं।
महज तीन फीट की चौकी और यादों का संसार
बढ़ती उम्र और शरीर की लाचारी ने कल्पना जी के दायरे को बेहद सीमित कर दिया है। उनकी दुनिया अब आश्रम के एक कोने में पड़ी करीब तीन फीट चौड़ी और छह फीट लंबी लकड़ी की चौकी तक ही सिमट कर रह गई है। उनका ज्यादातर वक्त इसी चौकी पर लेटे-बैठे गुजरता है। शरीर अब पहले जैसा साथ नहीं देता, हड्डियां कमजोर हो चुकी हैं और पैरों में ताकत नहीं बची है। ऐसे में जब अतीत की यादें और अपनों का चेहरा उनकी आंखों के सामने उभरता है, तो वह आश्रम के दूसरे सहपाठियों या वहां सेवा दे रहे कार्यकर्ताओं से बात करके अपना दिल हल्का करती हैं।
अपने अतीत को याद करते हुए कल्पना बताती हैं कि उनके पति सरकारी सेवा में थे। उन्होंने अपने जीवन के करीब 32 साल मध्यप्रदेश के अलग-अलग शहरों में बिताए। गृहस्थी, पति और बच्चों की परवरिश में उन्होंने अपनी पूरी जवानी झोंक दी। तब उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि बुढ़ापे का सूरज उनके लिए अपनों के आंगन में नहीं, बल्कि किसी अनजान जगह की चारदीवारी में ढलेगा। हालांकि, अब उन्होंने इन हालातों से समझौता कर लिया है। उनका मानना है कि वह अपने बच्चों के जीवन में रुकावट या बोझ नहीं बनना चाहतीं। आश्रम के लोग अब उनके लिए नए परिवार की तरह हैं, जो उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखते हैं।
अकेली कल्पना नहीं, ऐसी कई कहानियां हैं यहां दफन
सामने घाट स्थित 'अपना घर आश्रम' में केवल कल्पना भट्टाचार्या ही अकेली नहीं हैं, जिनकी यह दास्तां है। यहाँ ऐसी दर्जनों बुजुर्ग महिलाएं और पुरुष मौजूद हैं, जिनके परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहद मजबूत है। किसी के परिवार में बैंक मैनेजर रह चुके लोग हैं, तो किसी के बच्चे बड़े ओहदों पर तैनात हैं। इसके बावजूद ये सभी बुजुर्ग अपने घरों से दूर यहाँ अपनी जिंदगी के आखिरी दिन गिन रहे हैं।
आश्रम के प्रबंधन से जुड़े डॉ. निरंजन बताते हैं कि जब इन बुजुर्गों को यहाँ लाया जाता है, तो संस्था की प्राथमिकता सबसे पहले उनके परिजनों की तलाश करने की होती है। कई मामलों में बुजुर्गों की पहचान हो जाती है, उनके घर का पता और परिजनों के फोन नंबर भी मिल जाते हैं। आश्रम के लोग पूरी उम्मीद के साथ परिवारों से संपर्क साधते हैं और उन्हें उनके माता-पिता या बुजुर्गों की स्थिति से अवगत कराते हैं। लेकिन इसके बाद जो सामने आता है, वह मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाला होता है। कई परिजन बुजुर्गों को वापस अपने घर ले जाने से साफ इनकार कर देते हैं।
बहाने अनेक, लेकिन अपनों का साथ नदारद
जब भी आश्रम की ओर से बच्चों या रिश्तेदारों को फोन किया जाता है, तो उनके पास बहाने की कोई कमी नहीं होती। कोई वक्त की कमी का रोना रोता है, तो कोई घर में जगह न होने या बुजुर्गों की चिकित्सा देखभाल का खर्च उठाने में असमर्थता जताता है। जिन मां-बाप ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों की उंगली पकड़कर उन्हें चलना सिखाया, आज वही बच्चे उनके बुढ़ापे की जिम्मेदारी उठाने से कन्नी काट लेते हैं।
डॉ. निरंजन के अनुसार, वर्तमान में इस आश्रम में कुल 632 लोग रह रहे हैं, जिनमें से 275 महिलाएं हैं। इनमें से करीब 35 प्रतिशत लोगों के परिवारों की पहचान सफलतापूर्वक की जा चुकी है। इसके बावजूद उन सभी को उनके घरों को लौटाना संभव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि उनके खून के रिश्ते उन्हें अपनाने से मुंह मोड़ चुके हैं। ऐसे लावारिस या अपनों द्वारा ठुकराए गए बुजुर्गों के लिए यह आश्रम ही अब उनका असली आशियाना बन चुका है.
निस्वार्थ सेवा और मानवीय मूल्यों की मिसाल
जहाँ एक तरफ अपनों की बेरुखी से दिल टूट जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ 'अपना घर आश्रम' जैसी संस्थाएं मानवता की मिसाल पेश कर रही हैं। यहाँ रहने वाले सभी बुजुर्गों के खान-पान, रहने और स्वास्थ्य संबंधी सभी इंतजाम पूरी तरह निशुल्क हैं। संस्था से जुड़े दर्जनों लोग बिना किसी स्वार्थ के दिन-रात इनकी सेवा में जुटे रहते हैं।
- निशुल्क भोजन: आश्रम में सभी 632 कैदियों/आश्रितों को हर दिन समय पर पौष्टिक और ताजा भोजन उपलब्ध कराया जाता है।
- चिकित्सा सुविधाएं: बुजुर्गों की सेहत का खास ख्याल रखा जाता है। छोटी-मोटी बीमारियों से लेकर गंभीर समस्याओं के लिए डॉक्टरों की टीम मौजूद रहती है।
- आईसीयू जैसी सुविधाएं: गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए आश्रम के भीतर ही उन्नत चिकित्सा और आईसीयू बेड तक की व्यवस्था की गई है, ताकि किसी को इलाज के अभाव में परेशानी न हो।
डॉ. निरंजन कहते हैं कि बेसहारा लोगों की सेवा करना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य और संतोष है। जब कोई बुजुर्ग बिना अपनों के इस दुनिया में अकेला रह जाता है, तो यह संस्था उनके चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करती है।
आधुनिक समाज के नाम एक खुला सवाल
कल्पना भट्टाचार्या की यह कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की आत्मकथा नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे आधुनिक समाज के माथे पर एक सवालिया निशान है। आज हम भौतिक रूप से भले ही कितने भी आधुनिक और संपन्न क्यों न हो गए हों, लेकिन मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं के मामले में हम लगातार पिछड़ते जा रहे हैं।
बुजुर्गों को सिर्फ दो वक्त की रोटी, एक अदद छत और दवाइयों की ही जरूरत नहीं होती; उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है अपनेपन की, उस साए की जो बुढ़ापे में उनकी लाठी बन सके। लेकिन जब संपन्न घरों के पढ़े-लिखे युवा अपने ही माता-पिता को बोझ समझने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि हमारी तथाकथित आधुनिक शिक्षा प्रणाली में कहीं न कहीं कोई बहुत बड़ी कमी जरूर रह गई है। कल्पना जी आज भी उस चौकी पर बैठे-बैठे शायद चुपचाप यही सोचती होंगी कि आखिर उन्होंने अपने बच्चों को काबिल बनाने के लिए इतनी मेहनत क्यों की थी, यदि अंत में उन्हें नसीब सिर्फ परायापन ही होना था।