अमरावती के जिला महिला अस्पताल (डफरीन अस्पताल) के एनआईसीयू (NICU) में हुई दिल दहला देने वाली आग की घटना के बाद प्रशासनिक स्तर पर हड़कंप मचा हुआ है। इस गंभीर हादसे से सबक लेते हुए स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन ने नवजातों के उपचार की व्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने के लिए युद्धस्तर पर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। अस्पताल परिसर में दो नए अत्याधुनिक मिनी एनआईसीयू कक्षों का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है, ताकि जल्द से जल्द प्रभावित सेवाओं को बहाल किया जा सके।
29 बेड की क्षमता वाले दो नए मिनी एनआईसीयू कक्ष
अस्पताल प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार, आग की विभीषिका के बाद नवजात शिशुओं की सुरक्षा और उनके निरंतर इलाज को सुनिश्चित करने के लिए दो अलग-अलग मिनी एनआईसीयू स्थापित किए जा रहे हैं। इनमें से एक कक्ष की क्षमता 12 बेड की होगी, जबकि दूसरे कक्ष में 17 बेड लगाए जाएंगे। इस तरह कुल मिलाकर 29 नवजात शिशुओं के लिए उच्चस्तरीय उपचार की क्षमता फिर से तैयार की जा रही है।
इन कक्षों को तैयार करने का काम दिन-रात जारी है। प्रशासन का दावा है कि सुरक्षा मानकों के सभी पैमानों को ध्यान में रखते हुए इन यूनिट्स को तैयार किया जा रहा है, ताकि भविष्य में इस तरह की किसी भी अनहोनी से पूरी तरह बचा जा सके।
निजी अस्पतालों में हो रहा है 36 नवजातों का इलाज
डफरीन अस्पताल की एनआईसीयू यूनिट में आग लगने के तुरंत बाद वहां भर्ती सभी नवजात बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया था। वर्तमान स्थिति यह है कि कुल 36 नवजातों को शहर के विभिन्न चुनिंदा निजी अस्पतालों में शिफ्ट किया गया है, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में उनका इलाज लगातार चल रहा है।
बच्चों की सेहत पर लगातार नजर रखी जा रही है। स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी खुद निजी अस्पतालों का दौरा कर रहे हैं और बच्चों की रिकवरी रिपोर्ट ले रहे हैं ताकि परिजनों को किसी प्रकार की असुविधा या चिंता का सामना न करना पड़े।
स्वास्थ्य आयुक्त संजय काटकर ने किया निजी अस्पतालों का दौरा
घटना की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य सेवा आयुक्तालय, मुंबई के आयुक्त संजय काटकर के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय समिति अमरावती पहुंची। इस समिति ने शहर के उन तमाम निजी अस्पतालों का दौरा किया, जहां डफरीन अस्पताल से निकाले गए 36 नवजातों का इलाज चल रहा है।
आयुक्त ने अस्पताल के बिस्तरों तक जाकर बच्चों की मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने बच्चों के माता-पिता और परिजनों से भी लंबी बातचीत की। परिजनों को ढांढस बंधाते हुए उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार बच्चों के बेहतर इलाज और सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इस उच्चस्तरीय दौरे में उनके साथ उपसंचालक स्वास्थ्य सेवा अकोला मंडल डॉ. सुशीलकुमार वाघचौरे और जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. प्रवीण पारिसे भी प्रमुख रूप से मौजूद रहे।
फायर सेफ्टी को लेकर विशेष इंतजाम और विशेषज्ञों की नियुक्ति
भविष्य में इस प्रकार की अग्निकांड की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए अस्पताल प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। नई एनआईसीयू व्यवस्था के साथ-साथ अब अस्पताल परिसर में विशेष फायर सेफ्टी विशेषज्ञों (अग्नि सुरक्षा विशेषज्ञों) की नियुक्ति की जाएगी।
हाल ही में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में अग्निशमन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी शिरकत की। इस बैठक में अस्पताल की पूरी बिल्डिंग के फायर ऑडिट, आधुनिक उपकरणों की सुरक्षा, स्मोक डिटेक्टर्स और ऑटोमैटिक स्प्रिंकलर सिस्टम जैसे महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई।
राजनीतिक हलचल: सदोष मनुष्यवध का मामला दर्ज करने की उठी मांग
अस्पताल की इस घटना के बाद राजनीतिक गलियारों में भी उबाल देखा जा रहा है। अमरावती जिला की भाजपा महिला प्रदेश अध्यक्ष एवं विधायक चित्रा वाघ ने घटनास्थल का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया। इसके बाद एक पत्र परिषद (प्रेस कॉन्फ्रेंस) को संबोधित करते हुए उन्होंने इस पूरी घटना पर तीखा रोष व्यक्त किया।
विधायक चित्रा वाघ ने दोटूक शब्दों में कहा कि इस जांच में जो भी अधिकारी या कर्मचारी दोषी पाया जाता है, उसे तुरंत निलंबित किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने मांग की कि लापरवाह लोगों के खिलाफ 'सदोष मनुष्यवध' (Culpable Homicide) का गंभीर मामला दर्ज किया जाना चाहिए।
फायर ऑडिट और निरीक्षण के दावों पर उठे गंभीर सवाल
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान विधायक ने अस्पताल के फायर ऑडिट और प्रशासनिक दावों की पोल खोली। उन्होंने खुलासा किया कि अस्पताल के फायर ऑडिट को लेकर गत 25 जून को ही एक महत्वपूर्ण पत्र जारी किया गया था।
लोनिवि (सार्वजनिक निर्माण विभाग - PWD) की तरफ से यह दावा किया गया था कि उनके द्वारा 30 जून और 22 अगस्त को अस्पताल का निरीक्षण किया गया था। हालांकि, इसके विपरीत अस्पताल प्रशासन का यह स्पष्ट कहना है कि इन दोनों ही निर्धारित तारीखों पर कोई भी जिम्मेदार अधिकारी निरीक्षण के लिए मौके पर पहुंचा ही नहीं था।
लोनिवि की ओर से इसके पीछे स्टाफ की कमी या उपलब्धता न होने का तर्क दिया गया है, जिस पर विधायक ने कड़ा ऐतराज जताया है।
अभियंता और कर्मचारियों की भूमिका पर संदेह
इस पूरे मामले में लोनिवि के अभियंता (Engineer) शेंडे और कर्मचारी सानप की कार्यप्रणाली और भूमिका पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। विधायक ने इन दोनों कर्मचारियों की भूमिका की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
उन्होंने चेतावनी दी है कि आरोपी या दोषी कितना भी रसूखदार या प्रभावशाली क्यों न हो, उसे किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। सरकार द्वारा इस हादसे की जांच के लिए पहले ही एक उच्चस्तरीय समिति का गठन कर दिया गया है। समिति की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद प्रशासनिक कार्रवाई के साथ-साथ सख्त आपराधिक कदम उठाया जाना भी बेहद जरूरी है, ताकि भविष्य में सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाओं के साथ इस तरह का खिलवाड़ करने की कोई हिम्मत न कर सके।
फिलहाल, अमरावती के डफरीन अस्पताल के पास नई एनआईसीयू यूनिट्स का निर्माण तेजी से पूरा किया जा रहा है, और प्रशासन की नजर निजी अस्पतालों में भर्ती नवजातों के स्वास्थ्य पर टिकी हुई है। जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस भीषण लापरवाही के असल दोषियों पर कानून का शिकंजा कब और कितना सख्त कसता है।
