महाराष्ट्र की राजधानी और अन्य प्रमुख शहरों में पिछले ढाई सप्ताह से सुलग रही एक बड़ी सामाजिक और प्रशासनिक चिंगारी आखिरकार प्रशासनिक सूझबूझ और राजनीतिक इच्छाशक्ति से शांत हो गई है। पिछले 17 दिनों से अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आमरण अनशन और आंदोलन कर रहे आदिवासी छात्रों ने आखिरकार अपना संघर्ष विराम कर दिया है। राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सीधे और निर्णायक हस्तक्षेप के बाद छात्रों के प्रतिनिधिमंडल ने संतोष व्यक्त किया है, जिसके परिणामस्वरूप यह ऐतिहासिक अनशन समाप्त हो गया। इस अनशन के खत्म होने से न केवल छात्रों और उनके परिजनों ने राहत की सांस ली है, बल्कि राज्य सरकार के प्रशासन ने भी एक बड़ी चुनौती से सफलतापूर्वक पार पा लिया है।
17 दिनों का लंबा संघर्ष और पुणे से लेकर नागपुर तक गूंज
पुणे के मांजरी क्षेत्र सहित नागपुर और नासिक जैसे महत्वपूर्ण शहरों में आदिवासी छात्र पिछले 16-17 दिनों से लगातार सड़कों पर उतरे हुए थे। इन छात्रों की मांगें बेहद बुनियादी और उनके अधिकारों से जुड़ी थीं, जिन्हें लेकर वे अपनी पढ़ाई और भविष्य को दांव पर लगाकर ठंड और अन्य कठिनाइयों के बीच अनशन पर बैठे थे। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए राज्य सरकार ने मामले को और अधिक उलझने देने के बजाय सीधे तौर पर शीर्ष स्तर से बातचीत के द्वार खोले।
शनिवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में छात्रों के प्रतिनिधिमंडल ने अपनी बात पूरी मजबूती से रखी। इस मैराथन बैठक और आदिवासी विकास मंत्री अशोक उईके की छात्रों के साथ चली लंबी करीब पांच घंटे की चर्चा के बाद आखिरकार एक सकारात्मक सहमति बन पाई। सरकार की ओर से सभी प्रमुख मांगों को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किए जाने का भरोसा मिलने के बाद छात्रों ने जूस पीकर अपना अनशन तोड़ा।
पेसा (PESA) भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाने का बड़ा फैसला
आदिवासी छात्रों के आंदोलन के केंद्र में सबसे प्रमुख मुद्दा सरकारी नौकरियों में पेसा (PESA - Panchayat Extension to Scheduled Areas) के तहत होने वाली भर्तियों में हो रही देरी था। छात्रों की इस गंभीर चिंता पर सरकार ने त्वरित कार्रवाई का आश्वासन दिया है।
आदिवासी विकास मंत्री अशोक उईके ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि मुख्यमंत्री के साथ हुई बैठक में यह स्पष्ट किया गया है कि पेसा के तहत आने वाले विभिन्न संवर्गों में भर्ती प्रक्रिया को अब युद्ध स्तर पर आगे बढ़ाया जाएगा।
- पेसा के कुल 17 चिन्हित संवर्गों में से 9 में भर्ती प्रक्रिया पहले ही पूरी की जा चुकी है।
- शेष बचे संवर्गों में भी तत्काल प्रभाव से भर्ती प्रक्रिया शुरू करने के कड़े निर्देश संबंधित विभागों को दे दिए गए हैं।
- वर्ष 2017 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दायरे में रहते हुए अधिसंख्य पदों के संबंध में भी कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई को आगे बढ़ाया जाएगा।
- अनुसूचित जनजाति (ST) के उम्मीदवारों को रोजगार के अधिक से अधिक अवसर उपलब्ध कराने और रिक्त पदों की वास्तविक संख्या तय करने की प्रक्रिया को अगले 3 महीनों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके ठीक बाद के 6 महीनों में आगे की सभी औपचारिकताओं को पूरा कर नियुक्तियां सुनिश्चित करने के निर्देश जारी किए गए हैं।
बिंदुनामावली (Roster Point) विवाद पर 3 महीने में रिपोर्ट
आदिवासी समाज और छात्रों की एक अन्य सबसे बड़ी और पुरानी मांग एसटी वर्ग की बिंदुनामावली (रोस्टर सिस्टम) में उचित स्थान दिए जाने से जुड़ी थी। छात्रों का स्पष्ट तर्क था कि वर्ष 2017 के शासन निर्णय के नियमों और प्रावधानों के मुताबिक, बिंदुनामावली में एसटी वर्ग को दूसरा स्थान मिलना चाहिए, जिसे लेकर प्रशासनिक स्तर पर असमंजस की स्थिति बनी हुई थी।
इस संवेदनशील और तकनीकी मुद्दे के समाधान के लिए सरकार ने एक विशेष समिति के गठन का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस समिति को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे पूरी गहराई से मामले की जांच कर आगामी 3 महीनों के भीतर अपनी विस्तृत सिफारिशें सरकार को सौंपें, ताकि इस पर अंतिम और स्थायी निर्णय लिया जा सके।
आश्रमशालाओं की बदहाली पर सख्त रुख: होगा थर्ड पार्टी ऑडिट
केवल रोजगार और भर्ती ही नहीं, बल्कि शिक्षा के स्तर और आदिवासी छात्रों के रहन-सहन से जुड़ी व्यवस्थाओं पर भी इस आंदोलन के दौरान गंभीर सवाल उठाए गए थे। राज्य भर में चल रही सरकारी और अनुदानित आश्रमशालाओं में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी और कुप्रबंधन की शिकायतें लगातार मिल रही थीं।
छात्रों की इन जायज शिकायतों को सरकार ने बेहद गंभीरता से लिया है। मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार, अब राज्य की सभी सरकारी और अनुदानित आश्रमशालाओं में उपलब्ध सुविधाओं, भोजन, शिक्षा और अन्य व्यवस्थाओं का स्वतंत्र 'थर्ड पार्टी ऑडिट' (Third Party Audit) कराया जाएगा। इस ऑडिट रिपोर्ट में जो भी कमियां या खामियां सामने आएंगी, उन पर बिना किसी देरी के तत्काल और कड़ी कार्रवाई करने के स्पष्ट आदेश दिए गए हैं ताकि आदिवासी बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो सके।
समीक्षा और क्रियान्वयन: सरकार की आगे की रूपरेखा
किसी भी आंदोलन के समाप्त होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सरकार द्वारा किए गए वादे केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगे या धरातल पर भी उतरेंगे? इस बात को समझते हुए राज्य प्रशासन ने इस बार एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था तय की है।
आदिवासी विकास मंत्री अशोक उईके ने आश्वस्त किया है कि मुख्यमंत्री द्वारा स्वीकार की गई सभी मांगों पर समयबद्ध तरीके से काम शुरू हो गया है। इसके साथ ही, आज से ठीक तीन महीने बाद सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच एक बार फिर उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की जाएगी। इस बैठक का मुख्य एजेंडा इन तीन महीनों में लिए गए फैसलों और उनके क्रियान्वयन की प्रगति की समीक्षा करना होगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि छात्रों के साथ किसी भी स्तर पर प्रशासनिक कोताही न बरती जाए।
सफलता का संदेश और सामाजिक मायने
पुणे, नागपुर और नासिक के आदिवासी छात्रों का यह 17 दिवसीय शांतिपूर्ण लेकिन अडिग संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि लोकतांत्रिक दायरे में रहकर उठाई गई सही मांगें आखिरकार रंग लाती हैं। हालांकि अनशन समाप्त होने से फिलहाल प्रशासनिक और राजनीतिक मोर्चे पर चैन की सांस ली गई है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है—तय की गई समय-सीमा के भीतर इन सभी आश्वासनों को अमलीजामा पहनाने की। यदि सरकार निर्धारित 3 और 6 महीनों के भीतर इन वादों को पूरा कर देती है, तो यह महाराष्ट्र के आदिवासी युवाओं के शैक्षणिक और व्यावसायिक भविष्य के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।
