तीस्ता नदी के तेज बहाव में बहा हाथी का नवजात बच्चा, फिर जो हुआ देख भर आएंगी आंखें
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तीस्ता नदी के तेज बहाव में बहा हाथी का नवजात बच्चा, फिर जो हुआ देख भर आएंगी आंखें

तीस्ता नदी के तेज बहाव में बहा हाथी का नवजात बच्चा, फिर जो हुआ देख भर आएंगी आंखें

प्रकृति की गोद में कई बार ऐसी घटनाएं घट जाती हैं, जो इंसान के भीतर छिपी संवेदनाओं को झकझोर कर रख देती हैं। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले से एक ऐसा ही वाकया सामने आया है, जिसने मां के आंचल की उस ममता को एक बार फिर साबित कर दिया है, जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती। तीस्ता नदी के उफनते और बेरहम बहाव के बीच तीन दिनों के एक छोटे से नवजात हाथी के संघर्ष और उसकी मां के सब्र ने हर किसी की आंखें नम कर दी हैं।

तीस्ता नदी की तेज लहरों में गायब हुआ नया जीवन

घटना जलपाईगुड़ी जिले के गजोल्डोबा इलाके की है। यहां से गुजरने वाली तीस्ता नदी का मिजाज इन दिनों काफी आक्रामक बना हुआ है। नदी के तेज बहाव और उथल-पुथल के बीच अचानक एक ऐसी आपदा आई जिसने एक बेजुबान परिवार की दुनिया ही बदल दी। केवल तीन दिन पहले इस दुनिया में कदम रखने वाला एक छोटा हाथी का बच्चा अचानक पैर फिसलने या पानी के तेज दबाव के कारण तीस्ता नदी के तेज बहाव की चपेट में आ गया।

नदी की धारा इतनी प्रचंड थी कि उस नन्हीं सी जान को संभलने का मौका तक नहीं मिला। पानी का तेज बहाव उस नवजात को अपने साथ बहाकर मिलों दूर ले गया। पानी की उथल-पुथल और भंवर के बीच वह अकेला और असहाय बच्चा खुद को बचाने की जद्दोजहद कर रहा था, लेकिन नदी की रफ्तार के आगे उसकी ताकत बहुत कम थी।

किनारे पर बैठी बेबस मां की आंखें और इंतजार

जिस वक्त यह हादसा हुआ, उस नन्हीं जान की मां नदी के ठीक किनारे पर ही मौजूद थी। एक मां के रूप में उसने अपने बच्चे को अपनी आंखों के सामने पानी की तेज लहरों में खोते हुए देखा। पानी के बहाव ने भले ही उसके बच्चे को उससे दूर कर दिया हो, लेकिन एक मां का कलेजा और उसका विश्वास अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ।

वह हथिनी कई दिनों तक बिना खाए-पिए उसी नदी के तट पर टकटकी लगाए बैठी रही। उसकी खोजती और नम नजरें लगातार नदी की सतह को टटोल रही थीं कि शायद उसका लाल वापस लौट आएगा। जंगली जानवरों की दुनिया में अक्सर क्रूरता और संघर्ष की कहानियां सामने आती हैं, लेकिन इस मूक जानवर के भीतर जो दर्द और धैर्य था, वह किसी भी इंसान को सोचने पर मजबूर कर दे। वह लगातार अपनी सूंड हवा में उठाकर अपने बच्चे की महक तलाश रही थी और एकटक पानी की तरफ देख रही थी।

वैकुंठपुर वन विभाग की त्वरित और साहसी कार्रवाई

जैसे ही इस घटना की भनक वैकुंठपुर फॉरेस्ट डिवीजन (Baikunthapur Forest Division) के अधिकारियों को लगी, उन्होंने बिना एक पल गंवाए तुरंत मोर्चा संभाल लिया। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े अधिकारियों को अच्छी तरह पता था कि इस वक्त एक-एक सेकंड की कीमत है। अगर समय रहते बच्चे को नहीं खोजा गया, तो नदी का तेज बहाव या तो उसे किसी गहरी खाई में धकेल देगा या फिर उसकी जान खतरे में पड़ जाएगी।

वन विभाग की टीम ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। तीस्ता नदी के विशाल दायरे और खतरनाक लहरों को देखते हुए स्थानीय मछुआरों की भी मदद ली गई। स्थानीय लोगों को नदी के भूगोल और पानी के बहाव के रास्तों की बेहतर समझ होती है, जिसका फायदा इस अभियान में मिला। घंटों की कड़ी मशक्कत और जान जोखिम में डालकर चलाई गई तलाश के बाद आखिरकार टीम को सफलता मिल ही गई।

लहरों के बीच से सुरक्षित निकाला गया नवजात

मछुआरों और वन कर्मियों के संयुक्त प्रयासों से नदी के एक शांत कोने में उस नवजात हाथी के बच्चे को तैरते हुए और संघर्ष करते हुए देखा गया। पानी का बहाव कम होने के बाद वह एक जगह अटक गया था। टीम ने पूरी सावधानी बरतते हुए पानी के बीच नाव और अन्य उपकरणों की मदद से उस तक पहुंच बनाई।

बच्चा बुरी तरह डरा हुआ था और ठंड तथा थकान की वजह से कांप रहा था। वन विभाग के कर्मचारियों ने अत्यधिक संवेदनशीलता दिखाते हुए उसे बेहद सुरक्षित तरीके से नदी की लहरों के बीच से बाहर निकाला। किनारे पर लाते ही तुरंत पशु चिकित्सकों (Veterinary Doctors) की टीम को बुलाया गया।

डॉक्टरों की देखरेख और मेडिकल केयर

जंगल और वन्यजीव मामलों के जानकारों के मुताबिक, इस उम्र के बच्चों के लिए पानी में इतने लंबे समय तक रहना जानलेवा साबित हो सकता है। डॉक्टरों ने तुरंत उस नवजात का प्राथमिक उपचार शुरू किया। उसके शरीर का तापमान सामान्य करने की कोशिश की गई और यह जांचा गया कि कहीं उसे अंदरूनी चोट तो नहीं आई है।

प्राथमिक मेडिकल केयर मिलने के बाद बच्चे की हालत में सुधार होना शुरू हुआ। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि उसे उसकी असली दुनिया यानी उसकी मां तक कैसे पहुंचाया जाए। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि इंसानी संपर्क में ज्यादा देर रहने पर जानवर के बच्चे की गंध बदल जाती है, जिससे कई बार मां उसे अपनाने से इनकार कर देती है। लेकिन वैकुंठपुर डिवीजन की टीम इस बात से पूरी तरह वाकिफ थी।

दिल को छू लेने वाला वह ऐतिहासिक पल: मां और बच्चे का पुनर्मिलन

मेडिकल ट्रीटमेंट के बाद बिना देर किए वन विभाग की टीम उस बच्चे को वापस उसी जगह ले गई जहां उसकी मां उसके लौटने का इंतजार कर रही थी। जैसे ही हथिनी ने अपनी संतान की गंध को महसूस किया और अपनी आंखों से उसे अपनी तरफ आते देखा, उसका रिएक्शन वहां मौजूद हर एक शख्स के दिल को छू गया।

खुशी और आत्मीयता से भरी उस हथिनी ने तुरंत दौड़कर अपने बच्चे को अपनी गिरफ्त में ले लिया। उसने अपनी लंबी सूंड से उसे सहलाना शुरू किया, उसके शरीर पर जमी मिट्टी और पानी को साफ किया और ममता बरसाते हुए उसे तुरंत अपना दूध पिलाने लगी। वह दृश्य इतना भावुक करने वाला था कि वहां खड़े कई वन कर्मियों और स्थानीय लोगों की आंखें भर आईं।

वन विभाग की मुस्तैदी की हो रही है सराहना

इस पूरी घटना का वीडियो और जानकारी सामने आने के बाद सोशल मीडिया से लेकर हर तरफ वैकुंठपुर फॉरेस्ट डिवीजन और स्थानीय मछुआरों के इस सराहनीय कार्य की तारीफ हो रही है। लोगों का कहना है कि जहां एक तरफ प्रकृति की मार क्रूर थी, वहीं इंसानियत और वन्यजीव प्रेम ने उस संकट को एक खूबसूरत अंत में बदल दिया।

यह घटना इस बात का भी प्रमाण है कि यदि सही समय पर सही कदम उठाए जाएं, तो बेजुबानों की जिंदगी को भी बचाया जा सकता है। फिलहाल, मां और उसका बच्चा दोनों सुरक्षित हैं और अपनी झुंड के साथ जंगल की छांव में सुकून भरा समय बिता रहे हैं।

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नसीम अहमद

नसीम अहमद

Writer (स्थानीय खबरें)

नसीम अहमद जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं। उन...

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