लोकतंत्र की मजबूती का सबसे बड़ा आधार एक पारदर्शी और सटीक मतदाता सूची होती है। लेकिन जब प्रशासनिक प्रक्रियाओं और कानूनी दांव-पेंच के कारण लाखों मतदाताओं के नाम अधर में लटक जाएं, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। पश्चिम बंगाल में वर्तमान में कुछ ऐसा ही प्रशासनिक संकट खड़ा हो गया है, जिसने देश के चुनाव प्रबंधन तंत्र को भी सकते में डाल दिया है। राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया से जुड़े मामलों का जो अंबार लगा है, उसने चुनाव आयोग के माथे पर बल ला दिया है।
लंबित अपीलों का विशाल पहाड़: क्या कहते हैं आंकड़े
पश्चिम बंगाल की राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों से इस वक्त एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत कुल 38.31 लाख अपीलें दाखिल की गई थीं। इनमें से भारी संख्या में अपीलें आज भी लंबित पड़ी हुई हैं। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, यदि मौजूदा गति से ही इन मामलों का निपटारा किया जाता रहा, तो इन सभी अपीलों के निस्तारण में लगभग 12 साल का लंबा समय लग सकता है।
एक दशक से अधिक का यह समय किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए बेहद निराशाजनक है, क्योंकि तब तक अगली कई चुनावी प्रक्रियाएं संपन्न हो चुकी होंगी और मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित महसूस कर सकता है। यही कारण है कि चुनाव आयोग ने इस मामले पर अत्यंत गंभीरता दिखाते हुए तत्काल प्रभाव से बड़े कदम उठाने का मन बनाया है।
चुनाव आयोग का कड़ा रुख और ट्रिब्यूनल की मांग
लंबित मामलों के इस अंबार को देखकर चुनाव आयोग ने कमर कस ली है। आयोग अच्छी तरह जानता है कि सामान्य प्रशासनिक मशीनरी के भरोसे यदि इन 37 लाख से अधिक अपीलों का निपटारा कराने की कोशिश की गई, तो इसमें सालों बीत जाएंगे और न्याय मिलने में बहुत देर हो जाएगी। इसी पृष्ठभूमि में, चुनाव आयोग ने राज्य और केंद्र स्तर के संबंधित विभागों के समक्ष विशेष ट्रिब्यूनल (Tribunal) के गठन की पुरजोर मांग रखी है।
ट्रिब्यूनल के गठन के पीछे मुख्य उद्देश्य मामलों की सुनवाई में तेजी लाना और उनका पारदर्शी तरीके से त्वरित निस्तारण करना है। आयोग का मानना है कि यदि विशेष अदालतों या ट्रिब्यूनल्स का गठन नहीं किया गया, तो चुनावी शुचिता और समयबद्धता के लक्ष्य को प्राप्त करना नामुमकिन हो जाएगा।
क्यों पड़ी ट्रिब्यूनल की जरूरत?
- समय की बचत: सामान्य अदालतों या अधिकारियों के पास पहले से ही कार्यभार बहुत अधिक होता है, ऐसे में SIR के मामलों के लिए अलग से ट्रिब्यूनल होने से काम तेजी से होगा।
- पारदर्शिता: विशेष ट्रिब्यूनल होने से हर एक अपील की सुनवाई निष्पक्ष और तय समय सीमा के भीतर सुनिश्चित की जा सकेगी।
- मतदाताओं का विश्वास: समय पर मामलों का निपटारा होने से आम नागरिकों का प्रशासनिक और चुनावी व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होगा।
- 12 साल का संकट टलेगा: यदि विशेष इकाइयां काम करेंगी, तो 12 साल लगने वाली प्रक्रिया को कुछ ही महीनों या वर्षों में समेटा जा सकता है।
चुनावी राजनीति और प्रशासनिक चुनौतियां
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची का यह विशेष गहन पुनरीक्षण हमेशा से राजनीतिक दलों के बीच चर्चा और बहस का केंद्र रहा है। राज्य में हर एक चुनावी सरगर्मी के दौरान मतदाता सूची की शुद्धता को लेकर बड़े पैमाने पर सवाल उठाए जाते हैं। ऐसे में 37 लाख से ज्यादा अपीलों का लंबित होना यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर दस्तावेजों के सत्यापन और दावों-आपत्तियों के निस्तारण में कितनी बड़ी प्रशासनिक अड़चनें आई हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा पश्चिम बंगाल की राजनीति में और अधिक तूल पकड़ सकता है। विपक्षी दल जहां प्रशासन की सुस्ती पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं निर्वाचन आयोग की कोशिश किसी भी तरह से निष्पक्ष और त्रुटिहीन मतदाता सूची तैयार करने की है ताकि भविष्य के चुनावों पर कोई सवालिया निशान न लगे।
आगे की राह: क्या है चुनाव आयोग का अगला कदम?
मौजूदा स्थिति से निपटने के लिए चुनाव आयोग ने अपनी कार्ययोजना को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है। ट्रिब्यूनल के गठन के प्रस्ताव पर संबंधित उच्च स्तरों पर मंथन जारी है। यदि इन ट्रिब्यूनल्स को जल्द ही मंजूरी मिल जाती है और वे काम करना शुरू कर देते हैं, तो पश्चिम बंगाल के लाखों मतदाताओं को बड़ी राहत मिल सकती है।
देश के सबसे बड़े लोकतंत्र में हर एक नागरिक का वोट बहुमूल्य होता है। ऐसे में 37 लाख लंबित अपीलों का जल्द से जल्द समाधान निकाला जाना न केवल चुनाव आयोग की साख के लिए, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की सेहत के लिए भी बेहद जरूरी है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस चुनौती से पार पाने के लिए कितनी जल्दी और प्रभावी कदम उठाता है।