महाराष्ट्र के ठाणे जिले के भिवंडी शहर से एक बेहद गंभीर और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक मामला सामने आया है। यहां पीने के पानी की पाइपलाइन में सीवेज (गंदा पानी) मिलने के आरोपों को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने बेहद गंभीरता से लिया है। NGT की पुणे स्थित पश्चिमी क्षेत्र खंडपीठ ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और जिला कलेक्टर के प्रतिनिधियों की एक संयुक्त समिति गठित करने के आदेश दिए हैं। अधिकरण ने इस समिति को निर्देश दिया है कि वह पूरे मामले की बारीकी से जांच करे और ठीक एक महीने के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश करे।
क्या है पूरा मामला और कैसे शुरू हुआ विवाद?
यह पूरा मामला भिवंडी निजामपुर शहर महानगरपालिका (BNCMC) की जलापूर्ति व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। शहर के शांतिसागर कॉम्प्लेक्स 'एफ' विंग को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड की तरफ से एक मूल आवेदन दाखिल किया गया था। इस मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता आर.आर. त्रिपाठी ने अधिकरण के सामने स्थानीय नागरिकों के दर्द और गंभीर हालात को बयां किया।
सोसाइटी की ओर से आरोप लगाया गया है कि इमारत के ठीक पीछे से गुजरने वाली मुख्य पेयजल पाइपलाइन बेहद जर्जर और सड़ चुकी है। स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि सीवेज का गंदा पानी रिस-रिसकर सीधे पीने के पानी की पाइपलाइन में मिल रहा है। इस दूषित और जहरीले पानी की आपूर्ति के कारण इमारत में रहने वाले 32 परिवारों के सामने स्वास्थ्य का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे रोजाना मजबूरी में ऐसा पानी पीने को विचलित हैं जो किसी भी इंसान की जान ले सकता है।
प्रशासन की उदासीनता और अधिकारियों की चुप्पी
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि स्थानीय प्रशासन और नगर पालिका की ओर से किस हद तक लापरवाही बरती गई। सुनवाई के दौरान एडवोकेट आर.आर. त्रिपाठी ने भिवंडी मनपा के जल आपूर्ति विभाग के एक उप अभियंता द्वारा 13 मई 2026 को सोसाइटी को भेजे गए आधिकारिक पत्र का विशेष हवाला दिया।
उस पत्र में इस बात का साफ-साफ जिक्र किया गया था कि इमारत की ड्रेनेज लाइन और वर्षा जल निकासी (स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज) व्यवस्था में भारी खामियां हैं। इसके कारण सीवेज का पानी लगातार ओवरफ्लो हो रहा है, आसपास भयंकर दुर्गंध फैल रही है और मनपा की जलापूर्ति पाइपलाइन भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी है। इसके बावजूद, लिखित शिकायतों का अंबार लगने के बाद भी भिवंडी मनपा के संबंधित विभागों ने इस पर कोई ठोस कार्रवाई करने की जहमत नहीं उठाई। अधिकारी आंखें मूंदकर बैठे रहे और जनता बीमारियों के मुहाने पर पहुंच गई.
NGT का सख्त एक्शन: संयुक्त समिति का गठन
मामले की गंभीरता को देखते हुए NGT की बेंच, जिसमें न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. सुजीत कुमार वाजपेयी शामिल हैं, ने कड़े निर्देश जारी किए। अधिकरण ने स्पष्ट किया कि विवाद के मूल कारणों का पता लगाने और जमीनी सच्चाई सामने लाने के लिए एक स्वतंत्र संयुक्त जांच बेहद जरूरी है।
अधिकरण के आदेश के अनुसार, इस संयुक्त समिति में निम्नलिखित विभागों के प्रतिनिधि शामिल होंगे:
- महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) का एक प्रतिनिधि
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) का एक प्रतिनिधि
- जिला कलेक्टर कार्यालय का एक प्रतिनिधि
इनमें से MPCB को इस पूरी समिति की 'नोडल एजेंसी' नियुक्त किया गया है। नोडल एजेंसी होने के नाते MPCB पर यह जिम्मेदारी होगी कि वह समिति के सभी सदस्यों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करे और जांच के दौरान सभी प्रकार की लॉजिस्टिक सहायता सुनिश्चित करे।
समिति को दिए गए विशेष निर्देश
गठित की गई यह संयुक्त समिति मौके पर यानी घटनास्थल (शांतिसागर कॉम्प्लेक्स) पर जाएगी। वहां पहुंचकर समिति के सदस्य वास्तविक स्थिति का मुआयना करेंगे, पानी के नमूनों की जांच कर सकते हैं और यह पता लगाएंगे कि आखिर पाइपलाइन में सीवेज कैसे मिल रहा है। NGT ने कड़े शब्दों में निर्देश दिया है कि पूरी जांच प्रक्रिया को पूरी पारदर्शिता के साथ पूरा किया जाए और ठीक एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश की जाए।
आवेदक और अन्य पक्षों को दिए गए निर्देश
अधिकरण ने केवल प्रशासनिक निकायों को ही नहीं, बल्कि मामले के आवेदक (सोसाइटी के वकील) को भी कुछ जरूरी निर्देश दिए हैं। आवेदक को यह कहा गया है कि वह आदेश के तीन दिनों के भीतर समिति के सभी सदस्यों को मूल आवेदन की प्रति और उससे जुड़े सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराए। इसके साथ ही, 13 मई को मनपा द्वारा भेजे गए पत्र पर सोसाइटी की तरफ से जो जवाब दिया गया था, उसे भी रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है।
इस बहुप्रतीक्षित और संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई अब 15 अक्टूबर 2026 को तय की गई है। NGT ने यह भी निर्देश दिया है कि इस आदेश की एक कॉपी तुरंत संबंधित समिति को भेजी जाए ताकि बिना किसी देरी के अनुपालन शुरू किया जा सके।
आम जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ पर उठे बड़े सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर शहरी निकायों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या नागरिकों को साफ पानी देना प्रशासन की बुनियादी जिम्मेदारी नहीं है? बार-बार लिखित शिकायतें देने के बाद भी अगर अधिकारी महीनों तक फाइलों को दबाए रखें, तो इसे क्या माना जाए? भिवंडी के इस मामले में NGT की सख्ती से यह उम्मीद जरूर जगी है कि अब दोषियों पर गाज गिरेगी और स्थानीय लोगों को दूषित पानी के अभिशाप से मुक्ति मिलेगी। हालांकि, आने वाले दिनों में MPCB और CPCB की संयुक्त जांच रिपोर्ट क्या खुलासे करती है, इस पर पूरे शहर की नजरें टिकी हुई हैं।