जिंदगी और मौत के बीच का फासला बहुत बारीक होता है, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दुनिया से जाते-जाते भी दूसरों के जीवन में रोशनी भर जाते हैं। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से एक ऐसा ही झकझोर देने वाला और साथ ही मानवता की मिसाल पेश करने वाला मामला सामने आया है। यहां 53 वर्षीय विकास चौधरी भले ही इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनके शरीर के अंगों ने चार अन्य जरूरतमंदों को नई जिंदगी दे दी है। उनके सीने में धड़कने वाला दिल अब चेन्नई के एक अस्पताल में धड़केगा, तो वहीं उनकी किडनी और अन्य अंगों ने भोपाल और इंदौर के मरीजों के जीवन को बचा लिया है।
अस्पताल में पांच दिन चली जंग, फिर आया वह कठिन पल
घटना भोपाल के बागसेवनिया इलाके की है। विकास चौधरी को गंभीर हालत में एक स्थानीय अस्पताल से एम्स (AIIMS) रेफर किया गया था। डॉक्टरों की विशेषज्ञ टीम ने उन्हें बचाने के लिए अपनी तरफ से पूरी ताकत झोंक दी। लगातार पांच दिनों तक वेंटिलेटर और तमाम आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के सहारे उनकी जान बचाने की कोशिशें चलती रहीं।
तमाम जद्दोजहद और मेडिकल कोशिशों के बाद भी जब विकास की सेहत में कोई सुधार नहीं हुआ और उनके मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया, तब डॉक्टरों ने सख्त चिकित्सीय प्रोटोकॉल के तहत उन्हें 'ब्रेनडेड' (Brain Dead) घोषित कर दिया। किसी भी परिवार के लिए यह सबसे मुश्किल वक्त होता है, जब वह अपने किसी अपने को हमेशा के लिए खोने की कगार पर होता है। लेकिन विकास के परिजनों ने इस गहरे सदमे और दुख को ताकत में बदला और एक ऐसा फैसला लिया जो समाज के लिए प्रेरणा बन गया।
गम के आंसुओं के बीच लिया गया एक महान फैसला
एम्स के डॉक्टरों ने जब परिजनों को विकास के ब्रेनडेड होने की जानकारी दी, तो साथ ही उन्हें 'अंगदान' (Organ Donation) के महत्व के बारे में भी समझाया। इस असहनीय दुख के दौर में विकास के बेटे मासूम चौधरी, बड़े भाई राजेश चौधरी और उनकी बहनों बीना चौधरी, करुणा साखरे व वंदना पाटिल ने जो परिपक्वता दिखाई, वह काबिल-ए-तारीफ थी।
परिवार ने बिना एक पल गंवाए स्वेच्छा से अंगदान करने की सहमति दे दी। विकास के बहनोई अशोक पाटिल ने इस बारे में बात करते हुए कहा, "यह हमारे पूरे परिवार के लिए बेहद कठिन और वज्रपात जैसा समय है। लेकिन हमें इस बात पर गर्व है कि हमारा विकास जाते-जाते चार अन्य परिवारों के जीवन में खुशियों की उम्मीद छोड़ गया है। हमारा यह दुख अगर किसी की जान बचा सकता है, तो इससे बड़ा पुण्य और कुछ नहीं हो सकता।" परिवार ने समाज के अन्य लोगों से भी अपील की है कि वे ब्रेनडेड मरीजों के अंगों को दान करने के लिए आगे आएं।
चार घंटे तक चली जटिल सर्जिकल प्रक्रिया
परिवार की रजामंदी मिलने के बाद एम्स के सर्जन्स और मेडिकल स्टाफ की टीम हरकत में आई। अंगों को सुरक्षित निकालने के लिए एक लंबी और बेहद जटिल प्रक्रिया शुरू हुई जो करीब चार घंटे तक चली। डॉक्टरों की इस कठिन मेहनत के बाद विकास के हृदय, लीवर और दोनों किडनियों को पूरी सावधानी के साथ शरीर से अलग किया गया।
प्रोटोकॉल के अनुसार इन अंगों का जरूरतमंद मरीजों के बीच आवंटन किया गया:
- हृदय (Heart): चेन्नई के एमजीएम हेल्थकेयर अस्पताल में भर्ती एक मरीज के लिए भेजा गया।
- लीवर (Liver): इंदौर के सीएचएल अस्पताल में इलाज करा रहे मरीज को आवंटित किया गया।
- किडनियां (Kidneys): भोपाल के ही स्थानीय जरूरतमंद मरीजों को जीवनदान देने के लिए सुरक्षित रखी गईं।
ग्रीन कॉरिडोर: जब यातायात थमा ताकि एक जिंदगी बच सके
अंगदान की इस प्रक्रिया में समय सबसे बड़ा कारक था। शरीर से अलग किए गए अंगों को तय समय सीमा के भीतर संबंधित अस्पतालों तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती थी। इसके लिए प्रशासन और पुलिस विभाग ने मिलकर अभूतपूर्व तत्परता दिखाई।
विकास के हृदय को एम्स से सीधे राजा भोज एयरपोर्ट तक पहुंचाने के लिए एक विशेष 'ग्रीन कॉरिडोर' (Green Corridor) का निर्माण किया गया। ट्रैफिक पुलिस ने पूरे रास्ते के सिग्नल्स को ग्रीन कर दिया और रूट को पूरी तरह खाली रखा ताकि एम्बुलेंस बिना किसी बाधा के तेजी से निकल सके। दिल को समय रहते एयरपोर्ट पहुंचाया गया, जहां से एक विशेष विमान के जरिए उसे तुरंत चेन्नई रवाना किया गया। इसी तरह, लीवर को भी ग्रीन कॉरिडोर की मदद से सड़क मार्ग द्वारा भोपाल से इंदौर सुरक्षित पहुंचाया गया।
गार्ड ऑफ ऑनर के साथ दी गई अंतिम विदाई
अंगदान जैसे महान कार्य को अंजाम देने वाले विकास चौधरी को प्रशासन और अस्पताल प्रबंधन की ओर से विशेष सम्मान दिया गया। अंगदाता विकास को 'गार्ड ऑफ ऑनर' (Guard of Honour) से सम्मानित किया गया। यह सम्मान इस बात का प्रतीक था कि एक व्यक्ति ने मरणोपरांत भी समाज के लिए जो योगदान दिया है, वह इतिहास के पन्नों में अमर रहेगा।
सम्मान और तमाम विधिक प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद, विकास का पार्थिव शरीर पूरी गरिमा और सम्मान के साथ उनके परिजनों को सौंप दिया गया।
अंगदान: आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत
भारत में आज भी अंगदान को लेकर कई तरह की भ्रांतियां और सामाजिक संकोच मौजूद हैं, जिसके कारण हर साल हजारों लोग समय पर अंग न मिलने के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। भोपाल के विकास चौधरी और उनके परिवार ने जिस अदम्य साहस का परिचय दिया है, वह समाज की सोच को बदलने का काम कर रहा है। एक व्यक्ति का यूं चले जाना भले ही उसके परिवार के लिए कभी न भरने वाला शून्य छोड़ गया हो, लेकिन चार अन्य घरों में चूल्हे का जलना और सांसों का चलना इस बात की गवाही देता है कि विकास शारीरिक रूप से भले ही दुनिया में न हों, लेकिन वे उन चार लोगों के भीतर हमेशा धड़कते रहेंगे।