वाराणसी के प्रतिष्ठित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) परिसर से एक बेहद संवेदनशील और हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। चिकित्सा जगत में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले पद्मश्री डॉ. टीके लाहिड़ी के साथ कथित मारपीट की घटना ने पूरे शैक्षणिक और चिकित्सीय जगत में हलचल मचा दी है। इस घटना से न सिर्फ विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं, बल्कि वरिष्ठ नागरिकों और प्रतिष्ठित हस्तियों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं।
घटना सामने आने के बाद से ही बीएचयू प्रशासन की भूमिका संदेह के घेरे में है। पीड़ित पक्ष और उनके समर्थकों का सीधा आरोप है कि इतनी बड़ी घटना घटने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने पुलिस में एफआईआर (प्राथमिकी) दर्ज कराने में अनावश्यक देरी की। आखिर एक पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ चिकित्सक के साथ हुई इस तरह की घटना पर प्रशासनिक अमला तुरंत सक्रिय क्यों नहीं हुआ, यह सवाल अब हर किसी की जुबान पर है।
क्या है पूरा मामला और कैसे शुरू हुआ विवाद?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पद्मश्री डॉ. टीके लाहिड़ी बीएचयू के सर सुंदरलाल अस्पताल से लंबे समय तक जुड़े रहे हैं और देश के जाने-माने कार्डियोथोरेसिक सर्जन हैं। उनके योगदान को पूरा देश जानता है। ऐसे सम्मानित और बुजुर्ग व्यक्ति के साथ परिसर के भीतर कथित तौर पर दुर्व्यवहार और मारपीट की घटना होना अपने आप में कई बड़े सिस्टम्स की विफलता को दर्शाता है।
शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, विवाद किसी स्थानीय मुद्दे या परिसर के भीतर के किसी मनमुटाव से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। हालांकि, घटना के विस्तृत विवरण अभी पुलिस जांच के दायरे में हैं। जैसे ही यह खबर बाहर आई, अकादमिक गलियारों और सोशल मीडिया पर उबाल आ गया। लोगों का कहना है कि जब देश के इतने बड़े और प्रतिष्ठित संस्थान में पद्मश्री सम्मानित सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिकों और छात्रों की सुरक्षा का क्या हाल होगा?
प्रशासन पर लग रहे हैं लीपापोती के गंभीर आरोप
इस पूरे प्रकरण का सबसे विवादित पहलू पुलिस में शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी है। आमतौर पर किसी भी विश्वविद्यालय परिसर में इस तरह की गंभीर घटना होने पर प्रॉक्टर कार्यालय तुरंत हरकत में आता है और पुलिस को सूचना दी जाती है। लेकिन इस मामले में आरोप है कि मामले को दबाने या रफा-दफा करने का प्रयास किया गया।
- घटना की सूचना छिपाने का प्रयास: आरोप है कि घटना के तुरंत बाद इसे उच्चाधिकारियों तक पहुंचने से रोकने की कोशिश की गई।
- एफआईआर में हील-हवाला: समय पर पुलिस को तहरीर न देकर मामले को थाने तक पहुंचने में जानबूझकर विलंब किया गया।
- दबाव की राजनीति: पीड़ित पक्ष पर मामले को सामाजिक स्तर पर ही सुलझाने का दबाव बनाए जाने की भी चर्चाएं जोरों पर हैं।
इन तमाम आरोपों के बाद बीएचयू प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठना लाजिमी है। विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों में भी इस बात को लेकर भारी रोष है कि प्रशासन अपराधियों पर सख्त कार्रवाई करने के बजाय मामले की गंभीरता को कम करने में क्यों जुटा हुआ है।
चिकित्सक समुदाय और बुद्धिजीवियों में भारी आक्रोश
पद्मश्री डॉ. टीके लाहिड़ी के साथ हुई इस कथित घटना के बाद देश भर के डॉक्टर और मेडिकल फ्रेटरनिटी में गहरा गुस्सा है। आईएमए (IMA) और अन्य चिकित्सा संगठनों से जुड़े लोगों ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की है। उनका कहना है कि एक उम्रदराज और देश को अपनी बहुमूल्य सेवाएं दे चुके चिकित्सक के साथ ऐसा बर्ताव कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
चिकित्सकों का एक प्रतिनिधिमंडल इस मामले में जल्द ही प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात कर सकता है और दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग उठा सकता है। उनकी मांग है कि न सिर्फ मारपीट करने वालों पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो, बल्कि एफआईआर दर्ज करने में देरी करने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की जाए।
पुलिस और प्रशासन का पक्ष
बढ़ते दबाव और मीडिया की सुर्खियों के बाद अब स्थानीय पुलिस प्रशासन हरकत में आ गया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उन्हें इस संबंध में तहरीर मिल चुकी है और वे सभी पहलुओं की बारीकी से जांच कर रहे हैं। सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि घटना के समय असल में वहां क्या कुछ घटा था।
पुलिस का यह भी दावा है कि जांच के आधार पर जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके मुताबिक सख्त कानूनी कदम उठाए जाएंगे। हालांकि, देरी से एफआईआर दर्ज होने के सवालों पर पुलिस अभी भी बचती नजर आ रही है और गेंद बीएचयू प्रॉक्टर कार्यालय के पाले में डाल रही है.
आगे क्या हो सकता है?
यह मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। आने वाले दिनों में बीएचयू प्रशासन और पुलिस के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है क्योंकि विभिन्न छात्र संगठन और राजनीतिक दल भी इस मुद्दे पर कूद पड़े हैं। वे सड़क से लेकर सदन तक इस मामले को उठाने की चेतावनी दे रहे हैं।
जरूरत इस बात की है कि इस पूरे प्रकरण में बिना किसी पक्षपात के निष्पक्ष जांच हो, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों को सजा मिल सके। साथ ही, शिक्षण संस्थानों के भीतर इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए एक मजबूत और पारदर्शी सुरक्षा तंत्र विकसित किया जाना अत्यंत आवश्यक है ताकि भविष्य में किसी भी प्रतिष्ठित व्यक्ति या छात्र को इस तरह की प्रताड़ना का सामना न करना पड़े।