वाराणसी के प्रतिष्ठित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के चिकित्सा संस्थान से एक बेहद चौंकाने वाली और शर्मनाक खबर सामने आ रही है। चिकित्सा जगत में अपने असाधारण योगदान के लिए देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्मश्री' से नवाजे जा चुके वरिष्ठ कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. टीके लाहिड़ी के साथ कथित तौर पर मारपीट का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। घटना को बीते हुए एक सप्ताह से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन अब तक इस मामले में एफआईआर (FIR) दर्ज न किए जाने से यूनिवर्सिटी प्रशासन और स्थानीय पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, यह पूरी घटना बीएचयू अस्पताल परिसर के भीतर ही घटी। डॉ. टीके लाहिड़ी चिकित्सा क्षेत्र का एक ऐसा नाम हैं, जिनकी उंगलियों के जादू ने अनगिनत जिंदगी बचाई है। अपनी उम्र के इस पड़ाव पर भी वे चिकित्सा सेवा और मेडिकल छात्रों के मार्गदर्शन से जुड़े रहे हैं। आरोप है कि अस्पताल परिसर में ही उनके विभाग से जुड़े एक अन्य चिकित्सक के साथ किसी बात को लेकर विवाद हुआ, जो बढ़कर कथित हाथापाई और मारपीट तक जा पहुंचा।
इस घटना के सामने आने के बाद से ही बीएचयू के डॉक्टर परिसरों, फैकल्टी और मेडिकल छात्रों के बीच भारी सुगबुगाहट और आक्रोश का माहौल है। एक वरिष्ठ और सम्मानित चिकित्सक के साथ इस तरह के बर्ताव ने संस्थान की आंतरिक सुरक्षा और अनुशासन की पोल खोलकर रख दी है।
एक सप्ताह बीतने के बाद भी FIR क्यों नहीं?
इस पूरे प्रकरण का सबसे विवादित पहलू यह है कि घटना की लिखित या मौखिक शिकायत संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाए जाने के बावजूद, एक हफ्ते का लंबा समय गुजर जाने के बाद भी पुलिस ने प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की है। आखिर किस दबाव या प्रक्रिया के तहत इस मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है? यह सवाल अब हर किसी की जुबान पर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी संस्थान के परिसर में इस तरह की हिंसक घटनाएं होती हैं, तो बिना किसी देरी के कानूनी प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। घटनास्थल पर लगे सीसीटीवी फुटेज खंगाले जाने चाहिए और वहां मौजूद अन्य कर्मचारियों व चिकित्सकों के बयान दर्ज किए जाने चाहिए ताकि सच सामने आ सके। लेकिन हफ्ते भर बाद भी पुलिसिया सुस्ती कई तरह के संदेहों को जन्म दे रही है।
BHU प्रशासन की भूमिका पर उठ रहे गंभीर सवाल
केवल पुलिस ही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर बीएचयू विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली भी इस समय कटघरे में खड़ी है। पीड़ित पक्ष और उनके समर्थकों का आरोप है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन आरोपी चिकित्सक को बचाने का प्रयास कर रहा है या फिर मामले को रफा-दफा करने की जुगत में लगा हुआ है।
हालांकि, विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अभी तक इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई भी विस्तृत या आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। प्रशासन ने इस मामले में आंतरिक स्तर पर क्या कदम उठाए हैं और पुलिस को क्या आधिकारिक सूचना दी गई है, इस पर सन्नाटा पसरा हुआ है। जब तक प्रशासन का पक्ष सामने नहीं आता, तब तक तरह-तरह की अटकलों का बाजार गर्म रहना स्वाभाविक है।
चिकित्सक समुदाय में रोष और निष्पक्ष जांच की मांग
इस घटना के बाद से मेडिकल बिरादरी में गहरी नाराजगी है। देश-विदेश में अपनी सेवाओं का लोहा मनवा चुके एक पद्मश्री सम्मानित चिकित्सक के साथ इस तरह का सुलूक पूरे डॉक्टर समाज का अपमान माना जा रहा है। विभिन्न स्तरों पर यह मांग जोर पकड़ रही है कि:
- घटना की तुरंत उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए।
- दोषी पाए जाने वाले चिकित्सक के खिलाफ बिना किसी देरी के कठोर कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई हो।
- अस्पताल परिसर में वरिष्ठ और जूनियर चिकित्सकों की सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम किए जाएं।
- भविष्य में इस तरह की शर्मनाक घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कड़े नियम बनाए जाएं।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पुलिस इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए या किसी की तहरीर पर गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज करती है या नहीं। साथ ही, बीएचयू प्रशासन पर बढ़ते दबाव को देखते हुए यह देखना भी दिलचस्प होगा कि विश्वविद्यालय के उच्च अधिकारी इस मामले में क्या आधिकारिक रुख अपनाते हैं।
यह घटना सिर्फ दो व्यक्तियों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह एक प्रतिष्ठित संस्थान की गरिमा, वहां की सुरक्षा व्यवस्था और न्याय मिलने की उम्मीद से जुड़ा एक बड़ा मोड़ बन चुका है। अब यह देखना लाजिमी होगा कि क्या देश के इस शीर्ष संस्थान में पद्मश्री डॉ. टीके लाहिड़ी को न्याय मिल पाता है या यह मामला भी फाइलों के बीच दबकर रह जाता है।