पूर्वोत्तर के सांस्कृतिक पुरोधा को याद कर नम हुईं आंखें
संगीत की दुनिया में अपनी अनूठी आवाज और जन-सरोकार वाले गीतों से अमिट छाप छोड़ने वाले भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका की जयंती इस बार बेहद खास अंदाज में मनाई गई। असम के फकीराग्राम इलाके में आयोजित एक भव्य सांस्कृतिक समारोह के दौरान महान संगीतकार, गायक और फिल्मकार को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस आयोजन में स्थानीय नागरिकों के साथ-साथ क्षेत्र के कई गणमान्य लोग, युवा कलाकार और साहित्य प्रेमी बड़ी संख्या में शामिल हुए।
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. भूपेन हजारिका के तैलचित्र पर दीप प्रज्वलन और माल्यार्पण के साथ हुई। उपस्थित वक्ताओं ने उनके जीवन और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भूपेन दा केवल एक कलाकार नहीं थे, बल्कि वह पूर्वोत्तर भारत की आत्मा और उसकी सांस्कृतिक विविधता के सबसे मजबूत प्रतीक थे। उनके गीतों में ब्रह्मपुत्र की लहरों का संगीत और आम आदमी के संघर्ष की सच्ची दास्तां साफ सुनाई देती है।
संगीत और सुरों के जरिए दी गई अनूठी श्रद्धांजलि
फकीराग्राम में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण स्थानीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए गए डॉ. हजारिका के लोकप्रिय गीत रहे। बच्चों और युवाओं ने उनके प्रसिद्ध गीतों 'विस्तीर्ण पार्परे', 'दिल हुं हुं करे' और 'गांय मोर गांय' पर आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देकर उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से न केवल उनकी कला को याद किया गया, बल्कि नई पीढ़ी को उनके विचारों से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास भी किया गया।
स्थानीय आयोजकों ने बताया कि इस प्रकार के आयोजनों का मुख्य उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से अवगत कराना है। डॉ. हजारिका के गीत हमेशा से समाज को जोड़ने का काम करते आए हैं। उन्होंने अपने संगीत के जरिए सरहदों और भाषाओं की दीवारों को गिराकर इंसानी रिश्तों को सबसे ऊपर रखा।सांस्कृतिक एकता के दूत थे भूपेन दा
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि डॉ. भूपेन हजारिका ने अपने कलात्मक सफर के दौरान हमेशा शोषित और वंचित वर्ग की आवाज को बुलंद किया। असम से लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी कला का परचम लहराने वाले भूपेन दा ने कभी भी अपनी मिट्टी की खुशबू को खुद से अलग नहीं होने दिया।
- पूर्वोत्तर की पहचान: डॉ. हजारिका ने असमिया संस्कृति को वैश्विक पटल पर एक नई पहचान दिलाई।
- सामाजिक सद्भाव: उनके गीतों में हमेशा भाईचारे, प्रेम और राष्ट्रीय एकता का संदेश झलकता था।
- युवा प्रेरणा: आज भी युवा कलाकारों के लिए उनका जीवन संघर्ष और कला साधना एक मिसाल है।
फकीराग्राम के इस आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि महान कलाकारों की भौतिक विदाई के बाद भी उनके विचार और उनका संगीत पीढ़ियों तक जीवित रहता है। कार्यक्रम के अंत में सभी ने संकल्प लिया कि वे डॉ. भूपेन हजारिका के विचारों को जन-जन तक पहुंचाएंगे और उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलेंगे। इस सफल आयोजन ने स्थानीय सांस्कृतिक गलियारों में एक नई ऊर्जा का संचार किया है।