प्रकृति का तांडव जब अपने चरम पर होता है, तो वह इंसानी बस्तियों के साथ-साथ भविष्य की नींव यानी बच्चों की शिक्षा को भी मलबे में दबा देता है। नेपाल में पिछले दिनों आई भीषण और विनाशकारी बाढ़ के निशान अभी धुंधले भी नहीं पड़े हैं कि एक बेहद डरावनी और चिंताजनक सच्चाई सामने आई है। देश के विभिन्न हिस्सों में जलप्रलय के इतने हफ्तों बाद भी करीब 500 से अधिक विद्यार्थी पूरी तरह संपर्कविहीन बने हुए हैं। इस आंकड़े ने प्रशासनिक महकमों से लेकर अभिभावकों की रातों की नींद उड़ा दी है।
रसुवा और नुवाकोट में सबसे गंभीर हालात
प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, नेपाल के रसुवा और नुवाकोट जिलों में तबाही का असर सबसे ज्यादा देखने को मिला है। अकेले रसुवा जिले में 285 और नुवाकोट जिले में 224 छात्र-छात्राएं अभी तक अपने परिवारों और स्कूलों के संपर्क में नहीं आ सके हैं। शिक्षा विकास तथा समन्वय इकाई, रसुवा से मिली जानकारी के अनुसार, आपदा के इस दौर में जिले के भीतर 39 ऐसे बच्चे भी सामने आए हैं जिनके माता-पिता दोनों ही इस विपदा के बाद से संपर्कविहीन हैं।
रसुवा इकाई के प्रमुख दुर्गाप्रसाद सिलवाल ने बताया कि जिन मासूमों के सिर से माता-पिता का साया या उनका संपर्क फिलहाल टूट गया है, उन्हें उनके दूर-ದुराज़ के रिश्तेदारों के साथ सुरक्षित स्थानों पर भेज दिया गया है। इस आपदा ने केवल जिंदगियों को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि शैक्षणिक बुनियादी ढांचे को भी तहस-नहस कर दिया है।
तबाह हुए स्कूल और वैकल्पिक व्यवस्थाओं की चुनौती
रसुवा जिले में ही बाढ़ और भूस्खलन की वजह से कुल चार स्कूल पूरी तरह मलबे में तब्दील हो चुके हैं, जिनमें तीन सामुदायिक और एक संस्थागत विद्यालय शामिल हैं। हालांकि, जिन शैक्षणिक संस्थानों को इस प्राकृतिक आपदा से कोई नुकसान नहीं पहुंचा है, वहां धीरे-धीरे शैक्षणिक गतिविधियों को पटरी पर लाने का प्रयास शुरू कर दिया गया है।
- नौकुण्ड गांवपालिका में 27 अगस्त से कक्षाएं शुरू हो चुकी हैं।
- कालिका गांवपालिका में 7 सितंबर से पढ़ाई बहाल कर दी गई है।
- उत्तरगया और आमाछोदिङ्मो में 9 सितंबर से स्कूल खुल चुके हैं।
- गोसाइंकुंड गांवपालिका में 11 सितंबर से कक्षाएं शुरू करने की व्यापक तैयारियां चल रही हैं।
प्रशासन की योजना है कि जो विद्यालय पूरी तरह नेस्तनाबूद हो चुके हैं, वहां के विद्यार्थियों को दूसरे सुरक्षित स्कूलों में स्थानांतरित किया जाए। इसके लिए आवासीय व्यवस्था के तहत शिक्षा जारी रखने का खाका तैयार किया जा रहा है।
नुवाकोट और धादिङ में भी संकट गहराया
बाढ़ प्रभावित नुवाकोट जिले की स्थिति भी कम डरावनी नहीं है। यहां शिक्षा विकास तथा समन्वय इकाई के प्रमुख सूर्यबहादुर खत्री के अनुसार, 224 विद्यार्थी और 11 शिक्षक अब भी लापता या संपर्क से बाहर हैं। जिले के 10 स्कूलों को भारी क्षति पहुंची है, जिनमें दो निजी यानी संस्थागत विद्यालय भी शामिल हैं। इन क्षतिग्रस्त परिसरों को फिलहाल 'होल्डिंग सेंटर' के रूप में तब्दील कर दिया गया है, जहां आधे हिस्से में विस्थापित लोग शरण लिए हुए हैं और आधे हिस्से में वैकल्पिक व्यवस्था की रूपरेखा बन रही है।
दूसरी ओर, धादिङ जिले से भी दुखद खबरें लगातार आ रही हैं। वहां शिक्षा विकास इकाई के प्रमुख कृष्ण कुमार श्रेष्ठ ने पुष्टि की है कि जिले में तीन शिक्षक संपर्कविहीन थे, जिनमें से एक का शव बरामद किया जा चुका है। इसके अलावा चार पूर्व शिक्षकों के शव भी मिले हैं और दो अन्य पूर्व शिक्षक अभी भी लापता हैं। धादिङ में कुल 10 स्कूलों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है।
मानसिक आघात से उबारने के लिए मनो-सामाजिक परामर्श
इस पूरी आपदा के बीच शिक्षा मंत्रालय और संबंधित विभागों ने एक बेहद संवेदनशील और जरूरी कदम उठाया है। सरकार और शिक्षा विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि किसी भी स्कूल में नियमित पढ़ाई शुरू करने से पहले बच्चों को 'मनो-सामाजिक परामर्श' (Psycho-social Counseling) देना अनिवार्य होगा।
विनाशकारी बाढ़, अपने दोस्तों और शिक्षकों के बिछड़ जाने तथा घरों के उजड़ने का बच्चों के कोमल मन पर गहरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ा है। इस भय, तनाव और मानसिक अवसाद से विद्यार्थियों को बाहर निकालने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों और विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है।
"आपदा का जख्म सिर्फ शारीरिक नहीं होता, बल्कि बच्चों के मानसिक पटल पर भी गहरा असर छोड़ता है। जब तक विद्यार्थी मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार नहीं होते, तब तक नियमित कक्षाओं का संचालन शुरू करना उचित नहीं है।"
युद्ध स्तर पर बहाلی के प्रयास
स्थानीय निकायों, प्रदेश सरकारों और विभिन्न गैर-सरकारी संस्थाओं के सहयोग से स्कूलों के पुनर्निर्माण का काम तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। स्थानीय लोगों ने भी आगे बढ़कर सामुदायिक भवन और जमीन उपलब्ध कराने की पेशकश की है, ताकि बच्चों की शिक्षा का नुकसान लंबे समय तक न खिंचे। शिक्षा मंत्रालय ने आवासीय विद्यालयों के संचालन के लिए विशेष बजट प्रस्ताव भी मांगे हैं।
प्रशासन का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी बच्चा शिक्षा की मुख्यधारा से न छूटे, लेकिन यह सब तभी संभव होगा जब ये नौनिहाल इस भीषण मानसिक आघात से सुरक्षित बाहर आ सकेंगे। नेपाल की यह आपदा न केवल प्रशासनिक क्षमता की परीक्षा है, बल्कि संपूर्ण समाज की मानवीय संवेदनाओं की भी एक बड़ी कसौटी बन चुकी है।