उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के प्रतिष्ठित डीएवी पीजी कॉलेज छात्रसंघ चुनावों के परिणाम आने के बाद से ही सूबे की सियासत गरमा गई है। चुनावों के दौरान प्रशासनिक अमले और पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई), युवा कांग्रेस और कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने एसएसपी परमेंद्र डोबाल से मुलाकात की है। प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और सत्ता के दबाव में काम करने का आरोप लगाते हुए एक ज्ञापन सौंपा और पूरे घटनाक्रम की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है।
छात्रसंघ चुनाव और पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर बड़े सवाल
लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षण संस्थानों के चुनाव युवाओं की राजनीतिक और सामाजिक चेतना का पहला पाठ होते हैं। लेकिन जब इन चुनावों में सत्ता और प्रशासन के दखल के आरोप लगने लगें, तो व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है। डीएवी पीजी कॉलेज के हालिया छात्रसंघ चुनावों में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। मतदान और मतगणना के दौरान जिस प्रकार की स्थितियां बनीं, उसने छात्र संगठनों और पुलिस-प्रशासन आमने-सामने ला दिया है।
कांग्रेस और एनएसयूआई के नेताओं का आरोप है कि चुनाव के दौरान पुलिस ने न्यूट्रल होकर काम करने के बजाय किसी विशेष राजनीतिक दल के एजेंट की तरह व्यवहार किया। उनका दावा है कि सत्तापक्ष के दबाव में आकर उनके कार्यकर्ताओं को बेवजह परेशान किया गया, जबकि विरोधी गुट को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। इन गंभीर आरोपों के बाद से ही शैक्षणिक परिसर का माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है.
क्या हैं मुख्य आरोप?
- सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग: एनएसयूआई और युवा कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) को फायदा पहुंचाने के लिए प्रशासनिक मशीनरी का खुलकर दुरुपयोग किया गया।
- निशाने पर छात्र नेता: विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा चुनिंदा छात्र नेताओं को निशाना बनाने और उन पर एकतरफा कार्रवाई करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
- राजनीतिक हस्तक्षेप: छात्र संघ जैसे गैर-राजनीतिक और विशुद्ध रूप से शैक्षणिक मंचों पर सत्ता का दखल लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया गया है।
एसएसपी से मुलाकात और स्वतंत्र जांच की मांग
मामले की गंभीरता को देखते हुए कांग्रेस के प्रदेश सचिव विनीत प्रसाद भट्ट, नगर निगम पार्षद रोबिन त्यागी और आयुष गुप्ता के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) परमेंद्र डोबाल से उनके कार्यालय में मुलाकात की। मुलाकात के दौरान नेताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी, तो युवा पीढ़ी का लोकतांत्रिक व्यवस्था से भरोसा उठ जाएगा।
युवा कांग्रेस के जिलाध्यक्ष तेजस्वी राणा और जिला उपाध्यक्ष प्रियांशु गौड़ ने कहा कि पुलिस का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना है, न कि किसी चुनाव को प्रभावित करना। उन्होंने एसएसपी से मांग की है कि चुनाव के दिन के सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की मदद से एक स्वतंत्र जांच बैठाई जाए। यदि जांच में कोई भी अधिकारी या कर्मचारी दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए।
लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी
प्रतिनिधिमंडल में शामिल नेताओं ने मीडिया से बातचीत में दोहराया कि उनका यह विरोध किसी व्यक्ति विशेष या संस्था के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह लड़ाई पूरी तरह से एक पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के अधिकार के लिए है। डीएवी कॉलेज के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष सिद्धार्थ अग्रवाल और छात्रनेता सौरभ सेमवाल ने कहा कि छात्रहित के मुद्दों पर आवाज उठाने वालों को दबाने की कोशिश सफल नहीं होने दी जाएगी।
एनएसयूआई के जिला उपाध्यक्ष नितिन नेगी, अभिषेक डोबरियाल और दक्ष रावत समेत अन्य छात्र नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इस मामले में संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच शुरू नहीं की गई, तो उग्र आंदोलन किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए उनका यह शांतिपूर्ण संघर्ष आगे भी जारी रहेगा।
प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद से देहरादून के राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। आगामी चुनावों के मद्देनजर डीएवी कॉलेज के छात्रसंघ चुनाव को काफी अहम माना जा रहा था, और अब इस पर उपजा विवाद आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है। पुलिस प्रशासन की ओर से अभी तक इस मामले में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन एसएसपी स्तर पर मुलाकात के बाद यह माना जा रहा है कि इस प्रकरण की आंतरिक समीक्षा की जा सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शैक्षणिक संस्थानों में राजनीतिक दखलअंदाजी हमेशा से ही छात्र राजनीति के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रही है। जब चुनाव निष्पक्षता के दायरे से बाहर होकर ताकत का प्रदर्शन बन जाते हैं, तो उसका खामियाजा आम छात्रों को भुगतना पड़ता है। अब देखना यह होगा कि पुलिस प्रशासन इन गंभीर आरोपों पर क्या रुख अपनाता है और क्या छात्र संगठनों को संतुष्ट करने के लिए कोई ठोस जांच बैठाई जाती है या नहीं।