यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज के 55वें स्थापना दिवस समारोह में पूर्व सीजेआई ने चिकित्सा जगत में करुणा और मानवता पर दिया जोर
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने दिल्ली के यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज (UCMS) के 55वें स्थापना दिवस समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों से संवाद करते हुए मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का विशेष आग्रह किया। उन्होंने कहा कि चिकित्सा पेशा केवल तकनीकी महारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं से भी जुड़ा हुआ है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पूर्व सीजेआई ने चिकित्सा जगत से जुड़े उन योगदानों को याद किया, जो अक्सर समाज की नजरों से ओझल रहते हैं। उन्होंने डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों से कहा कि वे अपने काम के वास्तविक महत्व को पहचानें। उनके अनुसार, जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य अक्सर वह होता है जिसे कोई नहीं देखता, लेकिन उसका प्रभाव मरीज और उसके परिवार पर गहरा होता है। उन्होंने चिकित्सा संस्थानों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इन परिसरों से निकलने वाला हर चिकित्सक समाज में अपनी अमिट छाप छोड़ता है।
महात्मा गांधी की सर्जरी का किया जिक्र
अपने संबोधन के दौरान पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने इतिहास के पन्नों से एक महत्वपूर्ण प्रसंग साझा किया। उन्होंने जनवरी 1924 की एक घटना को याद किया जब महात्मा गांधी पुणे की यरवदा जेल में कैद थे और उन्हें तीव्र अपेंडिसाइटिस की शिकायत के बाद सर्जरी से गुजरना पड़ा था। उस समय उनकी सर्जरी करने वाले सर्जन एक ब्रिटिश अधिकारी थे।
पूर्व सीजेआई ने इस ऐतिहासिक प्रसंग का हवाला देते हुए बताया कि जब एक तरफ देश ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ स्वतंत्रता संघर्ष लड़ रहा था, वहीं दूसरी ओर वही राष्ट्रीय नायक एक ब्रिटिश सर्जन के ऑपरेशन टेबल पर था। उस ऑपरेशन कक्ष में दोनों की राष्ट्रीयताओं या राजनीतिक परिस्थितियों का कोई महत्व नहीं था। गांधीजी ने पूरी सहमति से सर्जरी कराई और ठीक होने के बाद उस डॉक्टर के प्रति आभार व्यक्त किया जिन्होंने उनकी जान बचाई थी।
ऑपरेशन थिएटर में केवल इंसान की पहचान
इस घटना से सीख लेते हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने डॉक्टरों को निष्पक्ष और मानवीय सेवा का पाठ पढ़ाया। उन्होंने कहा कि चिकित्सा पेशे से जुड़े लोगों को बिना किसी भेदभाव के मरीजों की सेवा करनी चाहिए, चाहे उनकी सामाजिक स्थिति, राजनीतिक विश्वास या परिस्थितियां कुछ भी हों।
छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि चिकित्सक के सामने आने वाला मरीज कोई कैदी भी हो सकता है और मंत्री भी, वह कोई संत भी हो सकता है या साधारण व्यक्ति। इलाज के दौरान मरीज की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग हो सकती हैं, वे अधीर हो सकते हैं या अपनी नाराजगी भी जता सकते हैं, लेकिन एक डॉक्टर के लिए ऑपरेशन थिएटर या अस्पताल में केवल एक ही पहचान मायने रखती है, और वह है एक ऐसा इंसान जिसे तत्काल चिकित्सा सहायता और मानवीय संवेदना की आवश्यकता है।