कोलकाता स्थित ऐतिहासिक भारतीय संग्रहालय में अपने 212 साल के सफर में पहली बार एक अनूठा आयोजन देखने को मिला है। यहां मां दुर्गा के बेशकीमती पुरातात्विक स्वर्ण आभूषणों को आम जनता के अवलोकन के लिए प्रदर्शित किया गया है। महालया के अवसर पर शुरू हुई इस प्रदर्शनी ने इतिहास प्रेमियों और कला प्रेमियों का विशेष ध्यान खींचा है, जिसमें प्राचीन कला और परंपरा का अनूठा संगम नजर आया।
इस विशेष आयोजन के तहत कोलकाता के प्रसिद्ध कुम्हारटोली क्षेत्र के कुशल मूर्तिकार नव पाल द्वारा तैयार की गई मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा को इन प्राचीन आभूषणों की शैली के अनुरूप बनाए गए करोड़ों रुपये के स्वर्ण आभूषणों से सजाया गया था। प्रदर्शनी में चंद्रहार, सीताहार, बाजूबंद, खूबसूरत झुमके और हाथों के पारंपरिक कंगन जैसे दुर्लभ आभूषण मुख्य आकर्षण का केंद्र रहे।
प्राचीन विरासत और पारंपरिक कला का संगम
संग्रहालय प्रशासन और कांथा कढ़ाई के क्षेत्र में सक्रिय एक निजी संस्थान की संयुक्त पहल पर इस प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। पूरे प्रदर्शनी परिसर को पारंपरिक कांथा कढ़ाई के बारीक और आकर्षक नमूनों से सजाया गया था, जो बंगाल की लोक कला को दर्शाता है।
आभूषणों के अलावा प्रदर्शनी में मां दुर्गा से जुड़ी कई अन्य ऐतिहासिक और पारंपरिक वस्तुओं को भी स्थान दिया गया। इनमें गुप्तकाल के दुर्लभ स्वर्ण सिक्के और ताड़पत्र पर उकेरी गई 19वीं सदी की पवित्र 'श्रीश्री दुर्गा स्तोत्र' पांडुलिपि शामिल है। इसके साथ ही, उत्तर 24 परगना जिले की पारंपरिक 'दुर्गा सरा चित्रकला' को भी प्रदर्शित किया गया, और इस दौरान देवी दुर्गा से जुड़े विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया।
देवी का सोलह शृंगार और आभूषणों का इतिहास
प्रदर्शनी में देवी के सोलह शृंगार के लिए पूरी तरह से शुद्ध सोने के आभूषणों का उपयोग किया गया। इन आभूषणों में नवरात्र के नौ स्वरूपों को दर्शाने वाला विशेष दुर्गा हार, धन और समृद्धि की प्रतीक महालक्ष्मी के आभूषण तथा ज्ञान एवं विवेक की प्रतीक मां सरस्वती के वाहन हंस की आकृति वाले विशेष आभूषण प्रमुख रूप से शामिल थे।
संग्रहालय के अधिकारियों के अनुसार, प्रदर्शनी में प्रदर्शित किए गए सोने के आभूषणों के दोनों सेटों के सटीक इतिहास और मूल दस्तावेजों के बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालांकि, पुरातात्विक संकेतों से यह स्पष्ट होता है कि इन्हें 17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान अविभाजित बंगाल के विभिन्न प्राचीन मंदिरों से संग्रहित किया गया था।
मूर्तिकार की कृति को संरक्षित करने पर विचार
यह प्रदर्शनी अपने निर्धारित समय के तहत रविवार को समाप्त होने वाली थी, लेकिन मूर्तिकार नव पाल द्वारा गढ़ी गई मां दुर्गा की कलात्मक प्रतिमा को लेकर लोगों में विशेष उत्साह देखा गया। आगंतुकों का इस प्रतिमा से गहरा भावनात्मक जुड़ाव बन गया है। इसे देखते हुए भारतीय संग्रहालय के निदेशक एवं प्रसिद्ध पुरातत्वविद डॉ. सायन भट्टाचार्य ने जानकारी दी है कि इस भव्य प्रतिमा को हमेशा के लिए संरक्षित करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस कलाकृति का दीदार कर सकें।