भारतीय राजनीति में एक बार फिर मतदाता सूचियों (वोटर लिस्ट) की पारदर्शिता को लेकर संग्राम छिड़ गया है। समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने एसआईआर (SIR) प्रक्रिया और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों को लेकर तीखे सवाल उठाए हैं। मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश की कई विपक्षी पार्टियां चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ खुलकर सड़कों पर उतर चुकी हैं।
शुरू से कहती रही है समाजवादी पार्टी: डिंपल यादव
मैनपुरी में पत्रकारों से बातचीत के दौरान डिंपल यादव ने कहा कि समाजवादी पार्टी लगातार इस बात को मजबूती के साथ उठाती रही है कि वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर धांधली की जा रही है और सोची-समझी रणनीति के तहत मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं। उन्होंने एक हालिया मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि जब देश के दो चुनाव आयुक्तों ने इस पूरी प्रक्रिया पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी, तो इससे साफ जाहिर होता है कि दाल में कुछ काला है।
सांसद डिंपल यादव ने दो टूक शब्दों में कहा कि एसआईआर प्रक्रिया के संचालन में जो भी अधिकारी शामिल रहे हैं, उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए और उनके खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि इसके लिए केवल नीचे स्तर के अधिकारी ही नहीं, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त समेत पूरा आयोग जिम्मेदार है।
2022 के चुनावों का किया जिक्र, आयोग पर ईमेल का जवाब न देने का आरोप
अपनी बात को पुख्ता करते हुए सपा सांसद ने साल 2022 के विधानसभा चुनावों के दिनों को याद किया। उन्होंने बताया कि उस दौरान चुनाव आयोग ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को वोटर लिस्ट से जुड़ी शिकायतों को लेकर एक हलफनामा दाखिल करने का नोटिस भेजा था। पार्टी ने पूरी गंभीरता दिखाते हुए लगभग 4,000 मतदाताओं के समर्थन में पुख्ता हलफनामे जमा भी किए।
लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इसके बाद चुनाव आयोग या उसके संबंधित विभागों की ओर से ईमेल के माध्यम से भी कोई संतोषजनक जवाब या प्रतिक्रिया नहीं दी गई। डिंपल यादव ने सवाल उठाया कि जब राजनीतिक दल नियमों का पालन करते हुए सबूत पेश करते हैं, तो चुनाव आयोग खामोश क्यों बैठ जाता है?
एसआईआर प्रक्रिया पर क्यों मचा है सियासी बवाल?
यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब एक प्रतिष्ठित मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान एसआईआर (SIR) प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार अपनी कड़ी आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इन खुलासों के बाद से ही विपक्षी दलों को बैठे-बिठाये एक बड़ा हथियार मिल गया है।
इस मुद्दे को लेकर देश भर का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और शिवसेना समेत तमाम प्रमुख विपक्षी दल अब सीधे तौर पर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगा रहे हैं।
सड़कों पर उतरा विपक्ष, देश भर में हो रहे हैं प्रदर्शन
महज बयानों तक सीमित न रहते हुए, अब इस मामले पर जमीनी स्तर पर विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो चुके हैं। कांग्रेस पार्टी के देशव्यापी आह्वान के तहत देश के कई राज्यों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए जा रहे हैं।
- जम्मू-कश्मीर और असम: उत्तर से लेकर पूर्वोत्तर तक चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध मार्च निकाले गए।
- उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल: पार्टी कार्यकर्ताओं ने एसआईआर प्रक्रिया को तुरंत रोकने और इसकी जांच की मांग की।
- उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश: समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर अपनी नाराजगी जाहिर की।
- मणिपुर: पूर्वोत्तर राज्य में भी इस मुद्दे पर राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई है।
इन प्रदर्शनों के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि इस पूरे प्रकरण में पर्याप्त सबूत मौजूद हैं और इसे केवल राजनीतिक बयानबाजी कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि देश के लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया की शुचिता को बनाए रखने के लिए इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच होना बेहद जरूरी है।
लोकतंत्र की बुनियाद पर खड़े हो रहे हैं सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वोटर लिस्ट जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं पर यदि इस तरह के गंभीर सवाल खड़े होते हैं, तो यह सीधे तौर पर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सेहत के लिए अच्छा संकेत नहीं है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे हर एक शिकायत का पारदर्शी तरीके से समाधान करें ताकि जनता का भरोसा बना रहे।
आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक और अधिक तूल पकड़ सकता है। विपक्षी दल इस मामले को आसानी से छोड़ने के मूड में नहीं दिख रहे हैं, वहीं चुनाव आयोग और सरकार के अगले रुख पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।