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ईसीएचएस पॉलीक्लिनिक में टकराव: नीति से ज्यादा संवाद और मनोविज्ञान की बड़ी चुनौती

ईसीएचएस पॉलीक्लिनिक में टकराव: नीति से ज्यादा संवाद और मनोविज्ञान की बड़ी चुनौती

देश के लिए अपनी जवानी खपाने वाले पूर्व सैनिकों और उनके आश्रितों के लिए ईसीएचएस (ECHS) पॉलीक्लिनिक केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि जीवन की दूसरी पारी का एक बड़ा मानसिक सहारा होते हैं। लेकिन जब इन्हीं स्वास्थ्य केंद्रों के गलियारों में बहस, तीखी आवाजें और असंतोष की खबरें सामने आती हैं, तो यह सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि उससे कहीं गहरी मनोवैज्ञानिक समस्या बन जाती है। कोटद्वार से पूर्व सैनिक महेंद्रपाल सिंह रावत द्वारा उठाए गए इस गंभीर मुद्दे पर गहराई से विचार करना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है।

नीति नहीं, बल्कि संवादहीनता और मानसिकता का संघर्ष

अक्सर जब कभी पॉलीक्लिनिक में किसी बात को लेकर बवाल होता है, तो फौरी तौर पर नियमों और नीतियों को इसका जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। कागजी दस्तावेजों और सरकारी फरमानों में कमियां ढूंढी जाती हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहती है। अधिकांश मामलों में समस्या नियमों की जटिलता से ज्यादा दोनों पक्षों के बीच संवाद की कमी, एक-दूसरे की परिस्थितियों को न समझ पाना और अलग-अलग मानसिक परिवेश से आने के कारण पैदा होने वाला वैचारिक टकराव होती है। गलती किसी एक पक्ष की नहीं होती, बल्कि पूरी व्यवस्था के उस गैप में छिपी होती है जहां इंसानियत और मनोविज्ञान गौण हो जाते हैं।

पूर्व सैनिक (PBOR) की मानसिक संरचना को समझना क्यों जरूरी है?

सेना की नौकरी आम कॉर्पोरेट नौकरी या नागरिक जीवन से कोसों दूर होती है। कठोर अनुशासन, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, जान जोखिम में डालकर काम करना और त्वरित निर्णय लेने की संस्कृति में ढले सैनिक का जीवन एक अलग ढांचे में चलता है। जब वही जवान या जेसीओ सेवानिवृत्ति के बाद ईसीएचएस व्यवस्था के तहत नागरिक प्रशासनिक परिवेश में कदम रखता है, तो उसकी अपेक्षाएं बिल्कुल सीधी और स्पष्ट होती हैं।

  • स्पष्टता की चाह: सेना में गोल-मोल बातें या अनिश्चितता के लिए कोई जगह नहीं होती। ईसीएचएस काउंटर पर बार-बार अलग-अलग बाबूओं के चक्कर काटना या दस्तावेजों के लिए भटकाया जाना पूर्व सैनिक के लिए मानसिक तनाव का सबब बन जाता है।
  • अधिकार और आत्मसम्मान का भाव: देश की रक्षा में दो दशक या उससे अधिक का समय बिताने वाला व्यक्ति यह मानता है कि स्वास्थ्य लाभ उसका कोई एहसान नहीं बल्कि उसका वैधानिक अधिकार है। इस भावना को दरकिनार नहीं किया जा सकता। हालांकि, इस अधिकार के साथ शालीनता की लक्ष्मण रेखा का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है।
  • नागरिक प्रक्रियाओं से तालमेल: ऑनलाइन पोर्टल, टोकन सिस्टम, लंबी कतारें, दवाओं की उपलब्धता के नियम और रेफरल के चक्कर में पड़ना एक पूर्व सैनिक के लिए असहज हो सकता है। व्यवस्था को यह समझना होगा कि हर सवाल को बगावत या अनुशासनहीनता नहीं माना जा सकता।

दूसरी तरफ की कहानी: पॉलीक्लिनिक स्टाफ और OIC की सीमाएं

सिक्के का दूसरा पहलू ईसीएचएस पॉलीक्लिनिक के प्रभारी अधिकारी (OIC) और वहां काम करने वाले कर्मचारियों की मजबूरियां हैं। वे कोई स्वतंत्र अस्पताल नहीं चला रहे हैं, बल्कि एक तयशुदा सरकारी बजट, खरीद नीति और प्रशासनिक दिशा-निर्देशों के पाबंद हैं।

यदि कोई विशेष दवा स्टॉक में नहीं है या किसी महंगे रेफरल में प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण वक्त लग रहा है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि डॉक्टर या अधिकारी जानबूझकर पूर्व सैनिक को परेशान कर रहे हैं। अधिकारी के पास प्रशासनिक जिम्मेदारियां तो होती हैं, लेकिन हर मेडिकल या वित्तीय फैसले का अंतिम अधिकार उसके अपने विवेक पर निर्भर नहीं करता। यहीं से गलतफहमियों का दौर शुरू होता है।

"मैंने अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा सरहद पर देश के नाम कर दिया, इसलिए मेरी समस्या का समाधान चुटकी बजाते होना चाहिए।" — पूर्व सैनिक की सोच
"मैं भी नियमों और बंधे हुए संसाधनों के दायरे में ही काम करने के लिए मजबूर हूं, बाहर नहीं जा सकता।" — अधिकारी की दलील

जब इन दोनों विपरीत धाराओं के बीच संवाद के पुल टूट जाते हैं, तो एक छोटी सी प्रशासनिक असुविधा भी बड़े विवाद का रूप धारण कर लेती है।

नेतृत्व का असली इम्तहान: अधिकार प्रदर्शन नहीं, समाधान

कुर्सी और पद के साथ अधिकार तो आते हैं, लेकिन असली लीडरशिप वही है जो संकट के समय आग में घी डालने के बजाय पानी डालने का काम करे। यदि पॉलीक्लिनिक में कोई बुजुर्ग पूर्व सैनिक अपनी बीमारी के दर्द और खीझ के चलते ऊंचे स्वर में बात कर रहा है, तो वहां बैठे अधिकारी का पहला फर्ज स्थिति को संभालना होना चाहिए।

अधिकारी को यह समझना चाहिए कि सामने बैठा व्यक्ति केवल एक 'फाइल' या 'रोगी संख्या' नहीं है, बल्कि वह मानसिक और शारीरिक रूप से टूट चुका एक ऐसा इंसान है जिसने अपना यौवन देश की हिफाजत में बिताया है। इसी तरह लाभार्थी को भी यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि सामने बैठा कर्मचारी हर बीमारी की दवा का व्यक्तिगत निर्माता नहीं है।

सम्मान की सड़क हमेशा दोतरफा होनी चाहिए

सम्मान की मांग करना हर किसी का हक है, लेकिन सम्मान केवल एकतरफा नहीं चल सकता।

  • अपनी समस्या को पुरजोर तरीके से रखना हक है।
  • समय पर इलाज और दवा की मांग करना अधिकार है।
  • प्रक्रिया पर वाजिब सवाल उठाना भी जायज है।
  • लेकिन किसी डॉक्टर, ओआईसी या क्लर्क के साथ अभद्र भाषा, गाली-गलौज या व्यक्तिगत छींटाकशी करना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

ठीक इसी प्रकार, अस्पताल के स्टाफ को भी यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वे किसी पूर्व सैनिक के उग्र व्यवहार को आधार बनाकर उसकी जेन्युइन मेडिकल फाइल को ही कोने में पटक दें। समस्या पर वैचारिक बहस हो सकती है, लेकिन व्यक्ति पर व्यक्तिगत आक्षेप लगाना पूरी मानवता को शर्मसार करता है।

व्यावहारिक समाधान: कैसे सुधरेगी ईसीएचएस की व्यवस्था?

सिर्फ नीतियों की समीक्षा करने से इस बीमारी का इलाज नहीं होने वाला। इसके लिए धरातल पर कुछ ठोस और व्यावहारिक कदम उठाने होंगे:

  1. मजबूत हेल्प डेस्क (Help Desk): पॉलीक्लिनिक के मुख्य द्वार पर एक ऐसा स्वागत और सहायता केंद्र होना चाहिए जहां प्रवेश करते ही पूर्व सैनिक को यह बता दिया जाए कि उसका काम किस काउंटर पर और कितनी देर में होगा।
  2. पारदर्शी शिकायत प्रणाली: यदि दवा उपलब्ध नहीं है या रेफरल में देरी हो रही है, तो इसके कारणों और समाधान की समय-सीमा लिखित या डिजिटल रूप में स्पष्ट होनी चाहिए।
  3. स्टाफ के लिए सॉफ्ट स्किल्स ट्रेनिंग: पॉलीक्लिनिक के कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए नियमित अंतराल पर 'साइकोलॉजिकल और कम्युनिकेबल ट्रेनिंग' होनी सिखाई जानी चाहिए, ताकि वे तनावग्रस्त पूर्व सैनिकों की मनोदशा को समझ सकें।
  4. जागि्रकता अभियान: पूर्व सैनिकों के सम्मेलनों में ईसीएचएस की कार्यप्रणाली, टेंडर प्रक्रिया और दवाओं के स्टॉक से जुड़े नियमों की जानकारी दी जानी ताकि भ्रम की स्थिति पैदा न हो।
  5. वरिष्ठ अधिकारियों के दौरे: उच्चाधिकारियों और क्षेत्रीय कमांड के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को समय-समय पर पॉलीक्लिनिकों का औचक और नियमित दौरा करना चाहिए। इससे जमीनी हकीकत का सही अंदाजा मिलता है।

निष्कर्ष

ईसीएचएस व्यवस्था महज़ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि उन लाखों सैनिकों के प्रति राष्ट्र का कृतज्ञता ज्ञापन है जिन्होंने अपनी जिंदगी के सुनहरे साल बर्फीली चोटियों और तपते रेगिस्तानों में बिताए हैं। इस व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए केवल बजट या कागजी नियमों की जरूरत नहीं है, बल्कि संवेदनशीलता, पारदर्शिता और आपसी विश्वास की दरकार है।

कारोबार या दफ्तरशाही की तर्ज पर चलने वाली इस चिकित्सा प्रणाली में जब तक मानवीय संवेदनाओं का तड़का नहीं लगेगा, तब तक टकराव की यह चिंगारी सुलगती रहेगी। अधिकारी यह गांठ बांध लें कि पद का अहंकार सेवा के लिए नहीं बल्कि जनता के कल्याण के लिए होता है, और पूर्व सैनिक यह याद रखें कि उनकी गरिमा और मान-मर्यादा का आभूषण उनका अपना अनुशासन और शालीनता है।

याद रखिए, टकराव से केवल व्यवस्था कमजोर होती है, और मजबूत संवाद से हर चट्टान को भी पिघलाया जा सकता है। जय हिंद!

About the Author

रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

Writer (स्थानीय खबरें)

रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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