पुरानी कहावत है कि 'युद्ध और प्रेम में सब कुछ जायज है।' इस कहावत को गढ़ने वाले वे लोग थे जो अपने धर्म और न्याय-विरुद्ध तरीकों को सामाजिक मान्यता दिलाना चाहते थे। लेकिन हमारे सत्तालोलुप राजनेताओं ने इस पुरानी कहावत को और भी विकृत रूप दे दिया है। वे अब यह मानकर चलते हैं कि 'युद्ध और राजनीति में सब कुछ जायज है।' इसका सीधा और सरल अर्थ यह निकाला जाने लगा है कि यदि आपको सत्ता के सिंहासन पर बैठना है, तो आप किसी भी रास्ते का चुनाव कर सकते हैं, चाहे वह रास्ता कितना भी अनैतिक, अधर्मपूर्ण, अन्यायपूर्ण और नाजायज क्यों न हो। राजनीति में नैतिकता का पतन किस स्तर तक पहुंच चुका है, यह आज किसी से छिपा नहीं है।
लोकतंत्र की पहली पाठशाला और गिरता स्तर
लोकतंत्र के इस नापाक 'पाठ' में अब राजनीति के नए प्रशिक्षु और छोटे स्तर के नेता भी वार्ड और ग्राम पंचायत जैसे स्थानीय चुनावों में पूरी तरह पारंगत होने लगे हैं। राजस्थान सहित देश के विभिन्न हिस्सों में चल रही स्थानीय निकाय चुनाव प्रक्रियाओं के दौरान ऐसे सैकड़ों उदाहरण सामने आ चुके हैं, जो लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहे हैं। मतदाता अपने पार्षद उम्मीदवार को किसी खास पार्टी या विचारधारा के विरोध में वोट देकर जिताता है, लेकिन चुनाव के नतीजे आते ही वही जीता हुआ प्रत्याशी पलटी मारकर विरोधी पार्टी के चरणों में लौटता हुआ दिखाई देता है। अपने मतदाताओं के अटूट विश्वास को नीलाम करने में ऐसे नेताओं को दस दिन का समय भी नहीं लगता।
देश के अस्सी साल के लंबे लोकतांत्रिक इतिहास में संसद और विधानसभाओं के चुनावों के दौरान हम पचासों बार अपने जनप्रतिनिधियों की ऐसी ही अवसरवादी उछल-कूद और पाला बदलने के साक्षी रहे हैं। इसी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने और लोकतंत्र की गरिमा बनाए रखने के लिए देश में 'दल-बदल विरोधी कानून' बनाया गया था। हालांकि, इसके बावजूद येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करने के नए-नए रास्ते निकाले जाते रहे हैं। विडंबना यह है कि स्थानीय निकायों और पंचायतों के स्तर पर ऐसा कोई कड़ा कानूनी अंकुश मौजूद ही नहीं है, जिसके कारण इन छोटे चुनावों में मतदाताओं के साथ विश्वासघात करने की पूरी और खुली छूट मिल जाती है।
आंकड़े बयां करते हैं खरीद-फरोख्त की सच्चाई
राजस्थान के हालिया स्थानीय निकाय चुनावों में बोर्ड निर्माण की प्रक्रिया और उसके चौंकाने वाले परिणामों पर नजर डाली जाए तो स्थिति पूरी तरह साफ हो जाती है। राज्य में कई ऐसी जगहें थीं जहां एक पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था, लेकिन जोड़-तोड़ की राजनीति के दम पर बोर्ड किसी और ने ही बना लिया। आंकड़े गवाही देते हैं कि किस तरह से पार्टियों के पास सीमित बहुमत होने के बावजूद उन्होंने अपनी संख्या बल को जादुई तरीके से बढ़ा लिया। दूसरी ओर, स्थानीय चुनावों में बड़ी संख्या में जीतने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों में से कितनों को अंततः किसी पार्टी की गोद में बैठना पड़ा, यह किसी से छिपा नहीं है।
इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि आखिर कितने प्रत्याशियों ने रातों-रात 'पलटी' मार ली। हमारी राजनीतिक पार्टियां वैसे ही 'साम, दाम, दंड, भेद' की नीति में पूरी तरह माहिर रही हैं, लेकिन अब उनके शब्दकोश में 'हॉर्स ट्रेडिंग', 'खरीद-फरोख्त', 'बाड़ेबंदी' और 'अपहरण' जैसे शर्मनाक शब्द स्थायी रूप से जुड़ते जा रहे हैं। चुनाव जीतने के बाद विधायकों या पार्षदों को रिसॉर्ट्स में छिपाकर रखना और उन्हें पहरे के बीच रखना आज के चुनावी लोकतंत्र की एक आम बानगी बन चुकी है, जो सीधे तौर पर जनता के जनादेश का खुला अपमान है।
बागी तेवर और गद्दारी का खेल
चुनावों के दौरान यह एक आम परिपाटी बन चुकी है कि जब किसी को टिकट नहीं मिलता, तो बहुत से बागी प्रत्याशी बगावत का झंडा बुलंद कर निर्दलीय तौर पर चुनावी मैदान में उतर जाते हैं। उस समय राजनीतिक पार्टियों की ओर से उन्हें 'गद्दार' और 'अवसरवादी' जैसी उपाधियों से नवाजा जाता है। उनके खिलाफ तीखे बयान दिए जाते हैं और जनता को उनके खिलाफ भड़काया जाता है। लेकिन जैसे ही वे चुनाव जीतकर पार्टी के सामने आते हैं, उनकी सारी 'गद्दारी' माफ कर दी जाती है और उनकी ससम्मान घर वापसी करवा ली जाती है।
इस पूरे खेल में यदि कोई सबसे ज्यादा ठगा जाता है, तो वह है आम और सीधा-साधा मतदाता, जो हाथ मलता रह जाता है। चुनाव जीतने वाले इन बागी प्रत्याशियों को राजनीतिक दलों से मुंहमांगी कीमतें मिल जाती हैं, और फिर जनता जाए भाड़ में—इस सिद्धांत पर राजनीति शुरू हो जाती है। ऐसा ही खेल बहुत से निर्दलीय प्रत्याशी भी खेलते हैं। पार्टियों के अधिकृत प्रत्याशियों को हराकर जनता उन्हें इसलिए जिताती है कि वे स्वतंत्र रूप से जनता की आवाज उठाएंगे, लेकिन उसी जनता को धोखा देने और अपनी राजनीतिक कीमत वसूलने में ये लोग तनिक भी देरी नहीं करते।
कानून की सीमाएं और जनता की ताकत
यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या दल-बदल विरोधी कानून का दायरा बढ़ाकर इसे स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों तक नहीं लाया जाना चाहिए? क्या देश के इन छोटे और बुनियादी चुनावों में जनता की पवित्र भावनाओं और उनके वोटों के साथ खिलवाड़ करने की खुली छूट दी जानी चाहिए? हालांकि कानून बनने और उसमें संशोधन होने में वक्त लगता है, लेकिन क्या जनता को तब तक चुपचाप बैठना चाहिए?
कानून बने या न बने, यदि शासन-प्रशासन और न्यायव्यवस्था इस पर सख्त रोक नहीं लगा पा रही है, तो जनता चाहे तो खुद अपना एक कड़ा 'कानून' बना सकती है। जनता का भरोसा तोड़ने वाले और पैसों या पदों के लालच में पाला बदलने वाले ऐसे अवसरवादी पार्षदों और नेताओं का अब पुरजोर तरीके से 'सामाजिक बहिष्कार' करना होगा। जब तक ऐसे नेताओं को समाज में तिरस्कृत नहीं किया जाएगा, तब तक राजनीति की इस पहली कक्षा में शुचिता, चरित्र और विश्वास जैसे मूल लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रतिष्ठा नहीं हो सकती।
दीमक की तरह खोखला हो रहा लोकतंत्र
राजनीति में घुस चुकी यह अवसरवादिता और दल-बदल की प्रवृत्ति आज एक दीमक की तरह हमारे लोकतांत्रिक ताने-बाने को अंदर से खोखला कर रही है। यदि इस दीमक का समय रहते पूरी तरह सफाया नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब देश के महान लोकतांत्रिक मूल्यों को पूरी तरह ढहने में जरा भी देर नहीं लगेगी। आज जरूरत इस बात की है कि आम नागरिक अपनी राजनीतिक जागरूकता का परिचय दें और चुनाव जीतने के बाद पलटी मारने वाले ऐसे चेहरों को भविष्य में कभी भी सत्ता के करीब न आने दें। जनता की एकजुटता ही इस राजनीतिक भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा और अचूक इलाज है।