नब्बे का दशक भारतीय टेलीविजन का वह स्वर्णिम काल था जब लिविंग रूम के टेलीविजन सेट के सामने पूरा परिवार इकट्ठा होता था। उस दौर में दूरदर्शन (Doordarshan) केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि संस्कृति और संवाद का एक जीवंत माध्यम था। आज के दौर में जब हर हफ्ते ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर थ्रिलर और मिस्ट्री सीरीज़ की बाढ़ आई हुई है, तब उस दौर के एक ऐसे मास्टरपीस को याद करना जरूरी हो जाता है जिसने आज से 32 साल पहले ही देश के दर्शकों को सस्पेंस और इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म के रोमांच से रूबरू करा दिया था। हम बात कर रहे हैं साल 1994 में आए बहुचर्चित धारावाहिक 'रिपोर्टर' (Reporter) की, जिसने छोटे पर्दे पर तहलका मचा दिया था।
जब पारिवारिक सीरियलों के बीच छा गया एक बेबाक थ्रिलर
वर्ष 1994 का वह दौर था जब दूरदर्शन के पर्दे पर सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने वाले शोज का दबदबा हुआ करता था। लोग शाम ढलते ही अपने पसंदीदा नाटकों के इंतजार में बैठ जाते थे। ऐसे समय में एक ऐसा शो आया जिसने पारिवारिक सीरियलों के प्राइम टाइम के सिंहासन को हिलाकर रख दिया। इस शो का नाम 'रिपोर्टर' था, जिसका निर्देशन विनोद पांडे ने किया था। यह कोई साधारण फिक्शन ड्रामा नहीं था, बल्कि भारतीय टेलीविजन इतिहास का पहला ऐसा गंभीर इन्वेस्टिगेटिव ड्रामा था जिसने न्यूजरूम की चकाचौंध और उसके पीछे छिपे स्याह सच को बेहद करीब से दिखाया था।
इस धारावाहिक की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह लीक से हटकर था। उस दौर में जब टेलीविजन पर केवल भावनाएं और रिश्ते परोसे जा रहे थे, 'रिपोर्टर' ने भ्रष्टाचार, सिस्टम की खामियों और अपराध की दुनिया के रहस्यों को उजागर करना शुरू किया। दर्शक हर सोमवार की रात को अपने टीवी सेट के सामने टकटकी बांधे बैठ जाते थे, क्योंकि हर एपिसोड एक नई पहेली और एक नए रहस्य के साथ सामने आता था।
शेखर सुमन का वह दौर जब हर तरफ था उनका जलवा
नब्बे के दशक के मध्य यानी 1993 से 1997 के बीच अभिनेता शेखर सुमन (Shekhar Suman) भारतीय टेलीविजन के निर्विवादित सुपरस्टार बन चुके थे। उनकी लोकप्रियता का यह आलम था कि उनके हाथ में एक साथ कई बड़े और सफल प्रोजेक्ट्स थे। डीडी मेट्रो पर प्रसारित होने वाला कॉमेडी शो 'देख भाई देख', ज़ी टीवी का लोकप्रिय धारावाहिक 'अंदाज', और बाद में सोनी टीवी पर उनका आइकॉनिक टॉक शो 'मूवर्स एंड शेखर'—हर तरफ शेखर सुमन का ही सिक्का चल रहा था।
लेकिन इन सबके बीच दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला 'रिपोर्टर' उनके करियर का सबसे अलग और मील का पत्थर साबित हुआ। इस शो में शेखर सुमन ने एक निडर, जुझारू और हर परिस्थिति से लड़ने वाले पत्रकार की मुख्य भूमिका निभाई थी। उनके किरदार का नाम और उनका अभिनय इस कदर लोकप्रिय हुआ कि लोग असल जिंदगी में भी उन्हें एक सच्चे पत्रकार के रूप में देखने लगे थे। अपनी दमदार डायलॉग डिलीवरी और बेहतरीन एक्सप्रेशंस के जरिए उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे केवल कॉमेडी या रोमांस ही नहीं, बल्कि गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में भी बेजोड़ हैं।
क्या था 'रिपोर्टर' का फॉर्मेट और उसकी यूनीक शैली?
'रिपोर्टर' धारावाहिक का फॉर्मेट बेहद आधुनिक और उस समय के हिसाब से काफी क्रांतिकारी था। शो के हर एक एपिसोड में एक अलग मामला या गुत्थी दिखाई जाती थी। शेखर सुमन यानी पत्रकार का किरदार उस मामले की तह तक पहुंचने के लिए शहर की खाक छानता था, स्टिंग ऑपरेशन जैसे हालात पैदा करता था और आखिरकार सच्चाई को जनता के सामने ले आता था। अमेरिकी टेलीविज़न सीरीज 'द न्यूजरूम' से प्रेरित इस भारतीय रूपांतरण ने यह दिखाया कि एक पत्रकार को अपने पेशेवर जीवन में किन-किन मानसिक और शारीरिक संघर्षों से गुजरना पड़ता है।
हर एपिसोड एक नए सस्पेंस के साथ शुरू होता और क्लाइमेक्स तक पहुंचते-पहुंचते दर्शकों की धड़कनें तेज हो जाती थीं। उस समय के तकनीकी संसाधनों के सीमित होने के बावजूद, निर्देशन और पटकथा ने इसे एक इंटरनेशनल थ्रिलर जैसा अहसास कराया था।
हर्षद मेहता स्कैम और विनोद पांडे की बेबाक हिम्मत
साल 1994 में इस तरह के विषय पर खुलकर बात करना और उसे पर्दे पर उतारना अपने आप में एक बहुत बड़ा जोखिम था। निर्देशक विनोद पांडे ने इस शो के जरिए जो साहस दिखाया, उसकी तारीफ उस समय के मीडिया गलियारों में भी खूब हुई थी। 'रिपोर्टर' के कई एपिसोड्स सीधे तौर पर साल 1992 के कुख्यात हर्षद मेहता शेयर बाजार घोटाले (Harshad Mehta Scam) पर आधारित थे। देश में जब उस वित्तीय महाघोटाले के घाव हरे थे, तब इस शो ने फिक्शन के माध्यम से उसकी कार्यप्रणाली और अंदरूनी साजिशों को जिस बेबाकी से पर्दे पर उकेरा, उसने दर्शकों को हैरान कर दिया था।
इस शो में केवल शेखर सुमन ही नहीं, बल्कि उनके साथ राज किरण और नताशा सिन्हा जैसे मंझे हुए कलाकारों ने भी अपनी अदायगी से चार चांद लगा दिए थे। इन कलाकारों की उम्दा जुगबंदी ने शो की पटकथा को और अधिक मजबूत बना दिया था।
क्यों आज भी प्रासंगिक है 'रिपोर्टर' जैसी कहानियां?
आज के दौर में जब मीडिया और पत्रकारिता का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है, 32 साल पहले आए 'रिपोर्टर' जैसे शोज को याद करना यह बताता है कि हमारे देश में अच्छे कंटेंट की नींव बहुत पहले ही रखी जा चुकी थी। आज भले ही दर्शक ओटीटी पर एक से बढ़कर एक इन्वेस्टिगेटिव सीरीज देख रहे हों, लेकिन दूरदर्शन के उस दौर के संस्कारी और बौद्धिक थ्रिलर्स की बात ही कुछ और थी।
'रिपोर्टर' ने न केवल टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़े, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि अगर नीयत साफ हो और कहानी में दम हो, तो दर्शक किसी भी लीक से हटकर बनाए गए प्रयोग को सिर आंखों पर बिठा लेते हैं। शेखर सुमन और विनोद पांडे की यह जोड़ी आज भी टेलीविजन इतिहास के पन्नों में अमर है और यह शो इस बात की मिसाल है कि भारतीय टीवी ने अपने शुरुआती दौर में ही किस स्तर का बेहतरीन और बौद्धिक मनोरंजन देश की जनता को परोसा था।