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तिहाड़ जेल की वो खौफनाक रातें, एक्ट्रेस संदीपा विर्क ने बयां किया टॉर्चर

तिहाड़ जेल की वो खौफनाक रातें, एक्ट्रेस संदीपा विर्क ने बयां किया टॉर्चर

जिंदगी में कुछ प ऐसे होते हैं जो इंसान की रूह को झकझोर कर रख देते हैं। ग्लैमर और चकाचौंध की दुनिया से कोसों दूर, जब किसी को कानून के शिकंजे में फंसकर सलाखों के पीछे जाना पड़ता है, तो उसकी असलियत सामने आती है। हाल ही में एक ऐसा ही हैरान करने वाला और सिहरन पैदा करने वाला मामला सामने आया है, जिसने सुरक्षा व्यवस्था और जेलों के अंदर के सिस्टम पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह दास्तान किसी फिल्मी कहानी की नहीं, बल्कि एक जानी-मानी सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर और एक्ट्रेस की असल जिंदगी की कड़वी सच्चाई है।

तिहाड़ जेल की काल कोठरी का खौफनाक सच

मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े एक मामले में कानूनी पेचीदगियों के चलते साढ़े चार महीने तक दिल्ली की कुख्यात तिहाड़ जेल की चार दीवारों के बीच वक्त गुजारने वाली संदीपा विर्क ने हाल ही में अपनी जिंदगी के सबसे काले और डरावने दौर से पर्दा उठाया है। हाल ही में एक वायरल पॉडकास्ट में शिरकत करते हुए संदीपा ने उस वक्त को याद किया, जिसे वह अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा नाइटमेयर मानती हैं। उनके मुताबिक, जेल के अंदर का वह दौर ऐसा था, जिसने उनकी इंसानियत और आत्मसम्मान को अंदर तक झकझोर दिया था।

जब भी संदीपा उस दौर को याद करती हैं, उनकी आंखें नम हो जाती हैं और गला रुंध जाता है। तिहाड़ जेल की उन साढ़े चार महीनों की हर एक सुबह और शाम उनके लिए किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं थी। उन्होंने बताया कि कैसे एक आम इंसान जब सलाखों के पीछे पहुंचता है, तो वहां उसकी पहचान और गरिमा को धीरे-धीरे कुचल दिया जाता है।तलाशी के नाम पर अमानवीयता और बेइज्जती

पॉडकास्ट के दौरान संदीपा ने जेल की चेकिंग प्रक्रिया पर बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए। उन्होंने बताया कि जेल में प्रवेश करने के साथ ही इंसान की इज्जत को तार-तार करने का सिलसिला शुरू हो जाता है। कैदियों की सुरक्षा जांच (Security Check) के नाम पर जो तरीका अपनाया जाता है, वह बेहद अपमानजनक और शर्मनाक है।

संदीपा ने दर्द बयां करते हुए कहा, "जेल में जाते ही वे लोग आपकी इज्जत उछालते हैं। आपको पूरी तरह नंगा किया जाता है और प्राइवेट पार्ट्स पर टॉर्च मारकर चेकिंग की जाती है। सबसे हैरानी की बात यह है कि सर्दियों के कड़ाके की ठंड में भी वे सारे कपड़े उतरवा देते हैं। उन्हें इस बात की कोई शर्म या लिहाज नहीं होता कि मौसम कैसा है।"

उन्होंने सवाल उठाया कि इस तरह की अपमानजनक प्रक्रिया के पीछे का तर्क समझ से परे है। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति अपने शरीर के भीतर क्या छिपा सकता है, और अगर वहां की चेकिंग इतनी ही अचूक और स्ट्रॉन्ग है, तो फिर तिहाड़ जैसी हाई-सिक्योरिटी जेलों के अंदर मोबाइल फोन और ड्रग्स जैसी अवैध चीजें कैसे पहुंच जाती हैं?

पैसे का खेल और कैदियों की लाचारी

जेल के अंदर की आंतरिक व्यवस्था पर रोशनी डालते हुए संदीपा ने एक बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि अगर आपके पास पैसा है, तो जेल की दुनिया में आपके लिए हर दरवाजा खुल जाता है। वहां कानून और कायदों से ज्यादा पैसा बोलता है।

संदीपा के अनुसार, "अगर जेल के अंदर चेकिंग इतनी ही सख्त है, तो फिर अंदर फोन कहां से आ जाते हैं? साफ है कि अगर आपके पास पर्याप्त पैसा है, तो आप जेल के अंदर भी हर वो चीज हासिल कर सकते हैं जो सामान्य तौर पर प्रतिबंधित होती है।"

उन्होंने आगे बताया कि महिलाओं के लिए चेकिंग प्रक्रिया बेहद असहज करने वाली थी। हालांकि चेकिंग करने वाली महिलाएं ही होती थीं, लेकिन दिन में कई-कई बार कपड़े उतारने के लिए कहा जाना मानसिक रूप से झकझोर देने वाला होता था। कैदियों के बाल खुलवाए जाते हैं, मुंह की तलाशी ली जाती है। संदीपा का कहना है कि एक दिन में तीन-तीन बार उन्हें इन अपमानजनक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता था। जब कई लोग यह कहते हैं कि 'चेक करने वाली लड़की ही तो है, कपड़े उतर जाने से क्या हो गया?', तो ऐसे संकीर्ण नजरिए को देखकर उनका खून खौल उठता है।

गंदा खाना, बदबूदार टॉयलेट और पहली रात का डर

शारीरिक प्रताड़ना के अलावा जेल का बुनियादी माहौल भी कैदियों की मानसिक स्थिति को बिगाड़ने के लिए काफी होता है। संदीपा ने बताया कि तिहाड़ का खाना और वहां के शौचालय बेहद गंदे और अस्वच्छ हैं, जहां रहना किसी नर्क से कम नहीं है।

अपनी पहली रात को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जेल में कदम रखते ही उन्हें एक ऐसी सेल में धकेल दिया गया जहां पहले से ही 25 से 26 महिला कैदी बंद थीं। उस पहली रात घुटन और डर के मारे उनकी आंखें बंद नहीं हुईं। अनजान लोगों के बीच, जेल की उस अजीब सी गंध और माहौल में उन्होंने डरते-सहमतें अपनी पहली रात बिताई थी।सुसाइड करने तक का आ गया था ख्याल

लगातार मिलने वाले मानसिक और शारीरिक टॉर्चर ने संदीपा को इस हद तक तोड़ दिया था कि उनका अपने गुस्से पर से नियंत्रण छूटने लगा था। उन्होंने स्वीकार किया कि जेल के अंदर उनकी अन्य लोगों के साथ हाथापाई भी हुई थी, क्योंकि वह अपनी भावनाओं और गुस्से को काबू में नहीं रख पा रही थीं।

हालात इतने बदतर हो चुके थे कि प्रताड़ना से तंग आकर उनके मन में अपनी जान देने यानी सुसाइड करने तक के विचार आने लगे थे। उन्हें लगने लगा था कि इस काली दुनिया से बाहर निकलने का अब शायद यही एक आखिरी रास्ता बचा है।

सुरक्षा व्यवस्था और मानवाधिकार पर बड़े सवाल

संदीपा विर्क के इन बयानों ने एक बार फिर देश की जेलों में बंद कैदियों के मानवाधिकारों और सुरक्षा व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि जेल प्रशासन की तरफ से सुरक्षा और तलाशी को लेकर अपने सख्त नियम और प्रोटोकॉल होते हैं, लेकिन इस तरह के खुलासे यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या सुधारगृह कहे जाने वाले इन संस्थानों में सुधार के नाम पर मानवीय गरिमा का हनन हो रहा है?

यह मामला न केवल एक सेलिब्रिटी या इंफ्लुएंसर का दर्द है, बल्कि यह उन हजारों बेनाम कैदियों की कहानी भी हो सकता है जो रोज इस व्यवस्था की चक्की में पिसते हैं। बहरहाल, इस वायरल पॉडकास्ट के सामने आने के बाद से सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है और लोग इस संवेदनशील मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रख रहे हैं।


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तनु उपाध्याय

तनु उपाध्याय

Senior Sub Editor

तनु उपाध्याय एंटरटेनमेंट जगत की हलचल को करीब से समझती हैं और उसे दर्शकों के सामने आकर्षक अंदाज में पेश करती हैं। फिल्मों, टीवी, ओटीटी और वायरल ट्रे...

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