रामगढ़ के औद्योगिक गलियारे में सुरक्षा और सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल
रामगढ़ जिले में औद्योगिक सुरक्षा मानकों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक सरगर्मी अचानक तेज हो गई है। जिले के औद्योगिक प्रतिष्ठानों में हाल ही में हुई दुर्घटनाओं और उसके बाद की गई प्रशासनिक जांच की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। स्थानीय स्तर पर इन मुद्दों ने तूल पकड़ लिया है, जिससे जिला प्रशासन और कारखाना प्रबंधन दोनों की मुश्किलें बढ़ती हुई नजर आ रही हैं।
पूर्व विधायक शंकर चौधरी ने इस पूरे घटनाक्रम में कड़ा रुख अपनाते हुए सीधे तौर पर जिला प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने इस संबंध में जिला उपायुक्त (डीसी) ऋतुराज को एक औपचारिक पत्र प्रेषित किया है, जिसमें कारखाने की सुरक्षा व्यवस्था से लेकर शहर में चल रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान तक कई तीखे सवाल पूछे गए हैं। इस पत्र के सामने आने के बाद से प्रशासनिक गलियारों में भी सुगबुगाहट तेज हो गई है।
कारखाने की जांच रिपोर्ट और प्रबंधन को क्लीन चिट पर सवाल
पूर्व विधायक का सबसे बड़ा और प्रमुख आरोप हाल ही में एक कारखाने में हुए हादसे की जांच रिपोर्ट को लेकर है। उनका कहना है कि जिस अधिकारी को इस दुर्घटना की निष्पक्ष जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उसने कथित तौर पर कारखाना प्रबंधन को पूरी तरह से दोषमुक्त करार दे दिया। यह अपने आप में कई बड़े सवाल खड़े करता है कि आखिर किन परिस्थितियों में प्रबंधन को इतनी आसानी से क्लीन चिट दे दी गई?
पत्र के माध्यम से यह मांग की गई है कि इस पूरी जांच के दायरे और निष्कर्षों को सार्वजनिक किया जाए ताकि आम जनता और पीड़ित परिवारों को यह पता चल सके कि असलियत क्या थी। क्या जांच के दौरान उन तमाम तकनीकी पहलुओं को नजरअंदाज किया गया, जिनकी वजह से यह हादसा हुआ था? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब हर कोई जानना चाहता है।
फायर सेफ्टी और प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों की असलियत
औद्योगिक इकाइयों में सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है या नहीं, इसे लेकर भी कड़े सवाल उठाए गए हैं। पत्र में निम्नलिखित बिन्दुओं पर स्पष्टीकरण मांगा गया है:
- जिले के तमाम कारखानों में अग्नि सुरक्षा उपकरण (Fire Safety Equipments) की वर्तमान स्थिति क्या है?
- क्या इन सभी प्रतिष्ठानों के पास वैध फायर एनओसी (Fire NOC) उपलब्ध है?
- कारखानों में प्रदूषण नियंत्रण उपकरण (Pollution Control Devices) लगाए गए हैं या नहीं?
- यदि उपकरण लगे हैं, तो क्या उनका नियमित और सही तरीके से उपयोग किया जा रहा है या वे सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
इन तमाम बिंदुओं पर पारदर्शी तरीके से रिपोर्ट सामने आने के बाद ही जिले के उद्योगों की असल तस्वीर साफ हो सकेगी। पर्यावरण और मानव जीवन से खिलवाड़ करने वाले ऐसे प्रतिष्ठानों पर सख्त कार्रवाई की मांग लगातार जोर पकड़ रही है।
मृत मजदूरों के पीएफ, मुआवजे और घायलों के बयानों पर चुप्पी क्यों?
हादसों में जान गंवाने वाले और घायल होने वाले मजदूरों का मुद्दा इस पत्र का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। पूर्व विधायक ने याद दिलाया है कि पिछले दिनों विभिन्न हादसों में कुल 11 मजदूरों की जान चली गई थी। इन मजदूरों के भविष्य निधि (PF) खातों, उनके आश्रितों को मिलने वाले मुआवजे और कानूनी रूप से देय सहायता राशि की स्थिति क्या है, इस पर से पर्दा उठाया जाना चाहिए।
इसके साथ ही, हादसों में घायल हुए मजदूरों के बयान दर्ज किए गए या नहीं और उन्हें अस्पताल में किस तरह की चिकित्सीय व आर्थिक सहायता मुहैया कराई गई, इसका पूरा लेखा-जोखा मांगा गया है। इसके अलावा, कारखानों के भीतर और बाहर चलने वाले भारी ट्रकों की ओवरलोडिंग के मुद्दे को भी उठाया गया है, जिससे आए दिन सड़कों पर खतरे की स्थिति बनी रहती है।
अतिक्रमण हटाओ अभियान: दोहरी नीति का आरोप
केवल कारखाने ही नहीं, बल्कि शहर में इन दिनों चल रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान को लेकर भी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाए गए हैं। आरोप लगाया गया है कि जिला प्रशासन इस अभियान के नाम पर केवल गरीब और बेसहारा लोगों की झोपड़ियों को निशाना बना रहा है।
पत्र में यह भी रेखांकित किया गया है कि शहर में पिछले कई वर्षों से सरकारी जमीन पर बड़े-बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और बड़ी संरचनाओं द्वारा कब्जा किया गया है, लेकिन उनके खिलाफ किसी भी तरह की प्रभावी या बुलडोजर कार्रवाई देखने को नहीं मिली है। इस दोहरे मापदंड को लेकर जनता के बीच भी नाराजगी का माहौल है, जिसे जनप्रतिनिधियों ने अब खुलकर प्रशासनिक पटल पर रखना शुरू कर दिया है।
आगे क्या कदम उठाएगा प्रशासन?
सोमवार को डीसी को सौंपे गए इस पत्र के बाद अब सबकी नजरें जिला प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या प्रशासन इन सभी बिंदुओं पर एक विस्तृत जांच कमेटी का गठन करेगा या फिर इन सवालों के जवाब गोलमोल तरीके से दिए जाएंगे? यह आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि इस पत्र के जरिए मजदूरों के अधिकारों और औद्योगिक सुरक्षा के मुद्दों को एक बार फिर से केंद्र में ला दिया गया है, जिससे लापरवाह तत्वों की मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है।