खेती किसानी की रीढ़ माने जाने वाले और सालभर खेतों में दिन-रात पसीना बहाने वाले मूक पशुओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का महापर्व आज यानी 10 September 2026 को गड़चिरोली समेत पूरे ग्रामीण अंचल में पूरी आस्था और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस साल खरीफ सीजन के दौरान मंडरा रहे सूखे के काले बादलों और कृषि संकट के बावजूद अन्नदाताओं के उत्साह में जरा भी कमी नहीं आई है। गड़चिरोली जिले के किसानों ने यह साबित कर दिया है कि विपरीत परिस्थितियां चाहें जितनी भी विकट क्यों न हों, संस्कृति और परंपराओं की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें कोई सूखा या संकट हिला नहीं सकता।
सूखे की चिंता को पीछे छोड़ जीवंत हुई संस्कृति
इस बार मानसून की बेरुखी और बारिश की कमी के कारण गड़चिरोली जिले के कई हिस्सों में सूखे का गंभीर संकट मंडरा रहा है। खेतों में खड़ी फसलें पानी के अभाव में दम तोड़ रही हैं, जिसे लेकर किसान गहरी चिंता में डूबे हुए हैं। इसके बावजूद, जब पोला पर्व मनाने की बात आई, तो अन्नदाताओं ने अपनी सारी चिंताओं को एक तरफ रख दिया। सालभर खेतों में कंधा से कंधا मिलाकर काम करने वाले अपने सच्चे साथियों यानी बैलों के प्रति सम्मान प्रकट करने में किसी भी प्रकार की कंजूसी नहीं बरती गई।
कृषि क्षेत्र में आधुनिकता और यांत्रिकीकरण (Mechanization) का दौर कितना भी आगे क्यों न बढ़ जाए, लेकिन ट्रैक्टर और अन्य मशीनों के आने के बावजूद बैलजोड़ियों के साथ पोला पर्व मनाने की परंपरा आज भी ग्रामीण भारत की आत्मा में जीवित है। यह पर्व केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह इंसान और जानवर के बीच के उस अटूट रिश्ते का दस्तावेज है, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।
बाजारों में छाई रौनक, खूब हुई श्रृंगार सामग्री की बिक्री
पोला पर्व की पूर्वसंध्या पर गड़चिरोली शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों के बाजारों में जो नजारा देखने को मिला, उसने तमाम आर्थिक और मौसमी निराशाओं को धो डाला। बाजारों में भारी भीड़ उमड़ी और किसानों ने दिल खोलकर खरीदारी की। बैलों के श्रृंगार से जुड़ी हर एक वस्तु की दुकानों पर खरीदारों का तांता लगा रहा।
- बैलों की पीठ पर डाले जाने वाले रंगबिरंगे और आकर्षक झूल।
- सींगों को सजाने के लिए विशेष बेगड़ और रंग।
- माथे पर सजाए जाने वाले पारंपरिक बासिंग।
- गले की शोभा बढ़ाने वाली कौड़ियों और झनझनाते घुंघरुओं की मालाएं।
दुकानदारों का कहना है कि सूखे की आहट के बावजूद किसानों ने पारंपरिक उत्साह में कोई कमी नहीं आने दी। सजावटी सामानों की मांग इस बात का स्पष्ट प्रमाण थी कि गड़चिरोली का किसान अपनी संस्कृति को बचाने के लिए हर परिस्थिति से लड़ने को तैयार है।
कांधे की मलनी से लेकर विशेष पूजन तक के विधान
पोला पर्व से जुड़ी कई प्राचीन और वैज्ञानिक मान्यताएं हैं, जिनका निर्वहन आज के दिन पूरी निष्ठा के साथ किया जाता है। पर्व की पूर्वसंध्या पर बैलों के कांधों की 'मलनी' की जाती है, जिसका अर्थ है सालभर खेतों का भारी बोझ उठाने वाले बैलों के कांधों की विशेष मालिश और देखभाल करना, ताकि उन्हें राहत मिल सके।
पोला के दिन सुबह से ही ग्रामीण इलाकों में उत्सव जैसा माहौल बन जाता है। इस दिन बैलों को खेतों के काम से पूरी तरह से मुक्त रखा जाता है। सुबह तड़के उन्हें पास के नदी या तालाब पर ले जाकर नहलाया जाता है, जिसके बाद उनके शरीर की तेल मालिश कर उनका भव्य श्रृंगार किया जाता है। सजे-धजे बैलों की पीठ पर सुंदर झूल डाली जाती है, सींगों में तेल और रंग लगाया जाता है, और अंत में विधि-विधान के साथ उनकी पूजा की जाती है।
परणपोली का नैवेद्य और अनूठा सह-भोजन
इस पर्व का सबसे खूबसूरत और भावनात्मक पल वह होता है जब किसान अपने बैलों को अपने हाथों से मीठी और स्वादिष्ट 'परणपोली' का नैवेद्य अर्पित करते हैं। कई किसान इस पावन अवसर पर उपवास भी रखते हैं। परंपरा के अनुसार, शाम के समय किसान अपने बैलों के साथ बैठकर भोजन करने का नियम निभाते हैं। यह दृश्य किसी भी आधुनिक इंसान की आंखें नम करने के लिए काफी है, क्योंकि यह अन्नदाता की उस महानता को दर्शाता है जो अपनी सफलता और असफलता दोनों में अपने मूक साथियों को बराबर का हिस्सेदार मानता है।
आधुनिकता के दौर में परंपराओं की प्रासंगिकता
आज के इस आधुनिक और रफ्तार भरे युग में, जहां इंसान अपनी ही संस्कृति से दूर होता जा रहा है, गड़चिरोली के किसानों द्वारा सूखे जैसे गंभीर संकट के बीच भी पोला पर्व को इतने भव्य तरीके से मनाना एक बहुत बड़ा संदेश देता है। यह इस बात का प्रतीक है कि हमारी जड़ें कितनी मजबूत हैं। भले ही आसमान से पानी न बरसा हो, लेकिन किसानों के दिलों में अपनी संस्कृति के प्रति जो प्यास और सम्मान है, उसने इस पर्व को अमर बना दिया है।
गड़चिरोली का यह पोला पर्व पूरे राज्य और देश के लिए एक प्रेरणा है कि विषम परिस्थितियां चाहे जितनी भी आंधी बनकर आएं, यदि अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं का दामन मजबूती से थामे रखा जाए, तो हर संकट का मुकाबला हंसते हुए किया जा सकता है। आज जब पूरा जिला बैलों की घंटियों की टिनटिनाहट और 'जय पोला' के नारों से गूंज रहा है, तो यह साफ महसूस किया जा सकता है कि भारत की ग्रामीण संस्कृति आज भी पूरीान और जीवंत है।