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रेल यात्रा हुई बेपटरी: कुशीनगर 14 और पाटलिपुत्र एक्सप्रेस 4 घंटे लेट, यात्री बेहाल

रेल यात्रा हुई बेपटरी: कुशीनगर 14 और पाटलिपुत्र एक्सप्रेस 4 घंटे लेट, यात्री बेहाल

भारतीय रेलवे को देश की जीवन रेखा कहा जाता है, लेकिन पिछले कुछ समय से यह जीवन रेखा ही यात्रियों के लिए सबसे बड़ी परेशानी का सबब बनती जा रही है। सफर को सुगम और आरामदायक बनाने के दावे हर दिन कागजों पर दम तोड़ते नजर आते हैं। ताजा मामला पटरियों पर पसरती उस व्यवस्था का है, जहां समय की पाबंदी अब एक बीता हुआ सपना बन चुकी है। आलम यह है कि देश की महत्वपूर्ण ट्रेनें घंटों नहीं, बल्कि आधे-आधे दिन की देरी से चल रही हैं, जिससे आम जनता का भारी नुकसान हो रहा है।

कुशीनगर एक्सप्रेस की भयंकर लेटलतीफी

यात्रियों की परेशानियों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोकप्रिय कुशीनगर एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से पूरे 14 घंटे की देरी से चल रही है। 14 घंटे का मतलब है कि एक पूरा दिन यात्रियों का केवल स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर या फिर ट्रेन के डिब्बों में इंतजार करते हुए ही बीत गया। इस भारी-भरकम देरी के कारण न सिर्फ यात्रियों का पूरा शेड्यूल खराब हो गया, बल्कि उन्हें स्टेशन पर भारी मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सामना भी करना पड़ा।

छोटे बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं के साथ सफर कर रहे परिवारों के लिए यह स्थिति किसी टॉर्चर से कम नहीं है। रेलवे स्टेशनों पर लगे इंक्वायरी काउंटर और डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड यात्रियों के सवालों के जवाब देते-देते थक चुके हैं, लेकिन ट्रेन के आने का सटीक समय कोई नहीं बता पा रहा है।

पाटलिपुत्र एक्सप्रेस भी चार घंटे लेट

सिर्फ कुशीनगर एक्सप्रेस ही नहीं, बल्कि पाटलिपुत्र एक्सप्रेस का हाल भी कुछ ऐसा ही है। यह ट्रेन भी अपने तय समय से करीब 4 घंटे की देरी से गंतव्य की ओर बढ़ रही है। हालांकि 14 घंटे के मुकाबले 4 घंटे की देरी रेलवे के लिए आम बात हो सकती है, लेकिन एक कामकाजी पेशेवर या जरूरी मीटिंग में जा रहे व्यक्ति के लिए यह चार घंटे भी बहुत मायने रखते हैं।

ट्रेनों के इस तरह बेतरतीब संचालन से यात्रियों में रेलवे प्रशासन के प्रति गहरा रोष व्याप्त है। लोगों का कहना है कि वे समय बचाने के लिए ट्रेन का चुनाव करते हैं, लेकिन अब तो फ्लाइट से भी ज्यादा अनिश्चितता ट्रेनों के सफर में देखने को मिल रही है।

क्यों हो रही है इतनी देरी?

रेलवे सूत्रों और जानकारों की मानें तो ट्रेनों के लेट होने के पीछे कई वजहें हैं:

  • कोहरे और मौसम का असर: साल के इस दौर में मौसम का मिजाज भी पटरियों की रफ्तार पर ब्रेक लगा रहा है।
  • रखरखाव के काम (Maintenance Blocks): पटरियों की मरम्मत और आधुनिकीकरण के नाम पर कई रूटों पर मेगा ब्लॉक लिए जा रहे हैं, जिससे ट्रेनों को बीच रास्ते में लंबे समय तक रोकना पड़ रहा है।
  • ओवर-कंजेशन (Over-congestion): व्यस्त मार्गों पर ट्रेनों का अत्यधिक दबाव होना भी एक बड़ी वजह है। एक ट्रेन के लेट होने से पीछे आ रही दर्जनों ट्रेनें प्रभावित होती हैं।

यात्रियों का छलका दर्द

स्टेशनों पर फंसे यात्रियों का गुस्सा फूट पड़ा है। कई यात्रियों का कहना है कि वे जरूरी काम या त्योहारों के सिलसिले में अपने घर और दफ्तर जा रहे थे, लेकिन इस लेटलतीफी ने उनकी सारी योजना पर पानी फेर दिया। खान-पान की समस्या, पीने के पानी की किल्लत और शौचालय की खराब स्थिति ने इस सफर को और भी ज्यादा कष्टदायक बना दिया है।

एक यात्री ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "हमने कई घंटे पहले स्टेशन पर कदम रखा था। ट्रेन का समय बार-बार बदला जा रहा है। न तो कोई सही अधिकारी जानकारी देने वाला है और न ही खाने-पीने की उचित व्यवस्था। रेलवे सिर्फ किराए बढ़ाना जानता है, सुविधाएं देना नहीं।"

रेलवे की जवाबदेही पर उठ रहे बड़े सवाल

आए दिन पटरियों पर ट्रेनों के इस तरह घंटों विलंब से चलने पर अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। जब देश हाई-स्पीड वंदे भारत और बुलेट ट्रेन के सपनों की ओर बढ़ रहा है, तब पारंपरिक एक्सप्रेस ट्रेनों का ऐसा हाल बुनियादी ढांचे की पोल खोल रहा है। यात्रियों की मांग है कि रेलवे प्रशासन को लेटलतीफी के कारणों की पारदर्शी जांच करनी चाहिए और यात्रियों को होने वाली असुविधा के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।

फिलहाल, कुशीनगर और पाटलिपुत्र एक्सप्रेस के हजारों यात्री अभी भी अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए पटरियों पर नजरें गड़ाए बैठे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि रेलवे बोर्ड इस लचर व्यवस्था को सुधारने के लिए क्या नए निर्देश जारी करता है।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

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रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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