देवभूमि हिमाचल प्रदेश की माटी से उठकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का परचम लहराने वाली एशियन गेम्स की गोल्ड मेडलिस्ट बेटियों ने अब अपनी ही सरकार के सामने हक की एक बड़ी लड़ाई छेड़ दी है। एशियाई खेलों की स्वर्ण पदक विजेता भारतीय महिला कबड्डी टीम का हिस्सा रहीं हिमाचल की चार जांबाज खिलाड़ियों ने राज्य सरकार द्वारा घोषित 33 लाख रुपये की पुरस्कार राशि को नाकाफी बताते हुए कड़ा एਤراض जताया है। इन खिलाड़ियों का साफ तौर पर कहना है कि यह राशि उनके वर्षों के कड़े संघर्ष, पसीने और ऐतिहासिक उपलब्धि के साथ बिल्कुल न्याय नहीं करती है।
वर्तमान समय में जब देश के युवा खेल के मैदानों में नया इतिहास रच रहे हैं, ऐसे में हिमाचल की इन बेटियों का यह दर्द खेल नीति और प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर कई बड़े सवाल खड़े करता है। आइए जानते हैं कि आखिर पूरा मामला क्या है और इन स्टार खिलाड़ियों की असल मांगें क्या हैं।
इन खिलाड़ियों ने उठाई आवाज और रखी अपनी बात
एशियाई खेलों में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली हिमाचल प्रदेश की चार स्टार खिलाड़ी—पुष्पा राणा, ज्योति ठाकुर, भावना ठाकुर और रितू नेगी ने मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू और खेल विभाग के सामने गुहार लगाई है। इन चारों खिलाड़ियों ने अपनी मेहनत के बल पर अंतरराष्ट्रीय फलक पर न केवल हिमाचल बल्कि पूरे भारत का सिर गर्व से ऊंचा किया है।
खिलाड़ियों का कहना है कि उन्होंने देश के लिए गोल्ड मेडल जीतने के लिए जो रास्ता तय किया है, वह फूलों की सेज नहीं बल्कि कांटों भरा सफर रहा है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और आज जब देश उनकी जीत का जश्न मना रहा है, तो राज्य सरकार की ओर से मिला यह सम्मान उनकी उम्मीदों से काफी कम है।
सीमित संसाधनों के बीच गढ़ी स्वर्णिम इबारत
पहाड़ी राज्यों में खेल बुनियादी ढांचे की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इन चारों खिलाड़ियों ने इस बात को पुरजोर तरीके से उठाया है कि उनके पास प्रैक्टिस के लिए न तो उच्च स्तरीय आधुनिक खेल मैदान थे और न ही विश्व स्तर के स्पोर्ट्स उपकरण। इसके बावजूद, उन्होंने अपनी व्यक्तिगत क्षमता, अटूट दृढ़ संकल्प और खून-पसीने की मेहनत के दम पर यह स्वर्णिम सफलता हासिल की।
"हमने बिना किसी आधुनिक सुविधा और संसाधनों के संघर्ष करते हुए देश को स्वर्ण पदक दिलाया है। सरकार द्वारा घोषित 33-33 लाख रुपये की संयुक्त या व्यक्तिगत घोषणा हमारी इस ऐतिहासिक उपलब्धि और संघर्ष के अनुपात में बेहद कम है।" - खिलाड़ियों का बयान
खिलाड़ियों का तर्क है कि एक अंतरराष्ट्रीय एथलीट को तैयार होने में और अपनी सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में आने में दशकों का समर्पण लगता है। ऐसे में जब प्रोत्साहन राशि की बात आती है, तो वह उनके त्याग को झलकानी चाहिए।
अन्य राज्यों की नीतियों से हो रही है तुलना
देश के कई अन्य राज्य अपने यहां के पदक विजेता खिलाड़ियों को करोड़-करोड़ रुपये और सरकारी पदों से नवाज रहे हैं। हालांकि, हिमाचल की इन खिलाड़ियों ने स्पष्ट किया है कि वे अन्य राज्यों की तरह व्यक्तिगत रूप से तीन-तीन करोड़ रुपये की भारी-भरकम मांग नहीं कर रही हैं। उनकी मांग बेहद व्यावहारिक और स्पष्ट है।
उनका आग्रह है कि स्वर्ण पदक के लिए राज्य सरकार द्वारा पहले से ही जो कुल चार करोड़ रुपये की राशि निर्धारित की गई है, उसे इन चारों खिलाड़ियों के बीच समान रूप से यानी एक-एक करोड़ रुपये के हिसाब से वितरित किया जाए। उनका मानना है कि टीम गेम में हर खिलाड़ी का योगदान बराबर होता है, इसलिए सम्मान भी उसी अनुपात में मिलना चाहिए।
पुरस्कार राशि के गणित पर उठ रहे सवाल
इस पूरे विवाद के बीच राज्य सरकार द्वारा अन्य खेलों के पदक विजेताओं को दी जा रही राशि की भी चर्चा तेज हो गई है। प्रदेश सरकार ने मैराथन में सिल्वर मेडल जीतने वाले खिलाड़ी सावन बरवाल को 2.50 करोड़ रुपये और 10 हजार मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतने वाली सीमा कुमारी को 1.50 करोड़ रुपये देने की घोषणा की है।
इसके विपरीत, जब एक पूरी टीम एशियाई खेलों में देश के लिए गोल्ड मेडल जीतकर लाती है, तो टीम की प्रत्येक खिलाड़ी के हिस्से में आने वाली राशि को कम कर देना खेल प्रेमियों और खुद खिलाड़ियों को अखर रहा है। इसी असमानता को दूर करने के लिए इन बेटियों ने मुख्यमंत्री से इस नीति पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है।
खेल और खिलाड़ियों के भविष्य के लिए संदेश
यह मामला केवल कुछ रुपयों या पुरस्कार राशि का नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ी के उन हजारों युवाओं के विश्वास का है जो पहाड़ों के रास्तों से निकलकर बड़े मंचों पर देश का नाम रोशन करना चाहते हैं। यदि देश और प्रदेश के लिए पदक जीतने वाले खिलाड़ियों को अपने हक के लिए इस तरह गुहार लगानी पड़े, तो यह खेल संस्कृति के लिए एक चिंता का विषय बन सकता है।
अब देखना यह होगा कि हिमाचल प्रदेश सरकार इन चारों स्वर्ण पदक विजेता बेटियों की इस जायज और तार्किक मांग पर क्या रुख अपनाती है। क्या मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू इस मामले में हस्तक्षेप कर इन खिलाड़ियों को उनका बनता हुआ मान-सम्मान दिलाएंगे? इस पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं।