दुनियाभर में अपनी सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली दवाओं के लिए 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' के रूप में अपनी पहचान बनाने वाला भारत अब एक नए और बड़े मुकाम की ओर कदम बढ़ा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने एक बड़ा विजन सामने रखते हुए कहा है कि देश को अब केवल दवाएं बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि रिसर्च, डेवलपमेंट और नए मेडिकल इनोवेशन के मामले में ग्लोबल लीडर बनते हुए 'लैबोरेटरी ऑफ द वर्ल्ड' (Laboratory of the World) का दर्जा हासिल करना होगा।जेनरिक दवाओं से आगे की छलांग
भारत ने पिछले कुछ दशकों में वैश्विक स्वास्थ्य बाजार में अपनी एक मजबूत और अमिट छाप छोड़ी है। आज दुनिया के एक बड़े हिस्से में इस्तेमाल होने वाली जेनरिक दवाएं भारत से ही सप्लाई होती हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान भी भारत ने 'वैश्विक मानवता' की मिसाल पेश करते हुए दुनिया के कई देशों को समय पर वैक्सीन और दवाएं उपलब्ध कराई थीं। इसी वजह से देश को 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' की उपाधि मिली।
हालांकि, केंद्रीय मंत्री का मानना है कि अब समय बदल चुका है। केवल जेनेरिक मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित रहने से हम आने वाले ग्लोबल हेल्थ ट्रेंड्स में पीछे छूट सकते हैं। भारत के पास विशाल टैलेंट पूल, दुनिया के बेहतरीन वैज्ञानिक और मजबूत युवा शक्ति है, जिनका सही इस्तेमाल करके हम रिसर्च और क्लिनिकल ट्रायल्स के क्षेत्र में भी दुनिया का नेतृत्व कर सकते हैं।
क्यों जरूरी है 'लैबोरेटरी ऑफ द वर्ल्ड' बनना?
भविष्य की महामारियों और गंभीर बीमारियों से निपटने के लिए केवल पुरानी दवाओं के उत्पादन से काम नहीं चलेगा। इसके लिए नए मॉलिक्यूल्स की खोज, अत्याधुनिक बायोटेक लैब्स और मेडिकल रिसर्च में भारी निवेश की आवश्यकता है। अनुप्रिया पटेल के इस विजन के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण छिपे हैं:
- स्वदेशी अनुसंधान (Indigenous Research): आयातित तकनीकों पर निर्भरता कम करके भारत को खुद नई जीवन रक्षक दवाएं और मेडिकल उपकरण तैयार करने होंगे।
- लागत प्रभावी क्लिनिकल ट्रायल्स: भारत में क्लिनिकल ट्रायल्स की लागत पश्चिमी देशों की तुलना में काफी कम है, जिससे यह ग्लोबल रिसर्च कंपनियों के लिए एक बेहतरीन डेस्टिनेशन बन सकता है।
- युवा वैज्ञानिकों को अवसर: देश के आईआईटी, आईआईएससी और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से निकलने वाले युवा प्रतिभाओं को अब देश के भीतर ही रिसर्च के बेहतरीन अवसर मिल सकेंगे।
- आर्थिक मजबूती: फार्मा सेक्टर में आरएंडडी (R&D) बढ़ने से देश की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार मिलेगी और लाखों हाई-स्किल्ड नौकरियां पैदा होंगी।
सरकार और इंडस्ट्री का साझा प्रयास
विशेषज्ञों का मानना है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार और निजी फार्मा कंपनियों को मिलकर काम करना होगा। वर्तमान में भारत का फार्मास्युटिकल सेक्टर लगभग 50 अरब डॉलर से अधिक का है, और इसके आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। यदि इस ग्रोथ का एक बड़ा हिस्सा रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में लगाया जाए, तो भारत वैश्विक स्तर पर एक बड़ी रिसर्च पावरहाउस के रूप में उभर सकता है।
हाल के वर्षों में सरकार ने 'नेशनल फार्मास्युटिकल पॉलिसी' और विभिन्न रिसर्च लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाओं के जरिए इस दिशा में कई कदम उठाए हैं। हालांकि, अभी भी रेड टेपिज्म (लाल फीताशाही) को कम करने और पेटेंट कानूनों को और अधिक मजबूत करने की जरूरत है ताकि ग्लोबल इन्वेस्टर्स और वैज्ञानिक भारत में खुलकर निवेश कर सकें।
चुनौतियां और आगे की राह
हालांकि यह विजन सुनने में बेहद आकर्षक और भविष्य की जरूरतों के अनुकूल है, लेकिन इसे जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा। भारत को इसके लिए कई मोर्चों पर कड़ी मेहनत करनी होगी:
- बुनियादी ढांचा (Infrastructure): देश के टियर-2 और टियर-3 शहरों तक अत्याधुनिक लैब्स और रिसर्च सेंटर स्थापित करने होंगे।
- फंडिंग: स्टार्टअप्स और वैज्ञानिकों को शुरुआती चरण में मिलने वाली फंडिंग (Seed Funding) को आसान बनाना होगा।
- एजुकेशन सिस्टम: मेडिकल और साइंस की पढ़ाई को केवल थ्योरेटिकल रखने के बजाय प्रैक्टिकल और रिसर्च ओरिएंटेड बनाना होगा।
अनुप्रिया पटेल का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरी दुनिया भारत की ओर एक भरोसेमंद साझीदार के रूप में देख रही है। चीन पर ग्लोबल सप्लाई चेन की निर्भरता कम होने के बाद, पश्चिमी देश अब भारत को एक सुरक्षित और लोकतांत्रिक विकल्प मानते हैं। यदि भारत 'फार्मेसी' से 'लैबोरेटरी' तक के इस सफर को तय करने में सफल होता है, तो 21वीं सदी सचमुच स्वास्थ्य और विज्ञान के क्षेत्र में भारत के नाम होगी।
