भारत के ये 4 अनोखे गांव, जहां रावण और ताड़का के नाम पर जलाए जाते हैं दीये
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भारत के ये 4 अनोखे गांव, जहां रावण और ताड़का के नाम पर जलाए जाते हैं दीये

भारत के ये 4 अनोखे गांव, जहां रावण और ताड़का के नाम पर जलाए जाते हैं दीये

भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, अनूठी परंपराओं और प्राचीन मान्यताओं के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहां कदम-कदम पर इतिहास के अलग-अलग रंग और हैरान करने वाली कहानियां देखने को मिलती हैं। देश के अधिकांश हिस्सों में जब भी विजयदशमी यानी दशहरे का पर्व आता है, तो बुराई के प्रतीक के रूप में रावण, कुंभकरण और मेघनाद के विशाल पुतले जलाए जाते हैं। यह नजारा हर साल भारत के हर कोने में देखने को मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी भारत में कुछ ऐसे भी गांव और शहर हैं, जहां रावण दहन जैसी परंपरा दूर-दूर तक नजर नहीं आती?

जी हां, यह सुनने में थोड़ा अजीब जरूर लग सकता है, लेकिन यह बिल्कुल सच है। इन खास जगहों पर रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है, उसके सम्मान में दीये जलाए जाते हैं और कई जगहों पर तो उसे भगवान शिव के परम भक्त या अपने क्षेत्र का दामाद मानकर बाकायदा मान-सम्मान दिया जाता है। साल 2026 के इस दौर में भी इन गांवों ने अपनी सदियों पुरानी और लीक से हटकर चलने वाली परंपराओं को पूरी निष्ठा के साथ जीवित रखा है। आइए आज आपको विस्तार से ले चलते हैं भारत के ऐसे ही 4 अनोखे गांवों और कस्बों की यात्रा पर, जहां दानव या खलनायक माने जाने वाले पात्रों की पूजा होती है।

1. बैजनाथ, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) - शिव भक्त रावण की आराधना

हिमाचल प्रदेश की हसीन वादियों में स्थित कांगड़ा जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ अपने धार्मिक महत्व के लिए भी प्रसिद्ध है। यहीं पर स्थित है बैजनाथ धाम, जो देश के सबसे प्राचीन और पवित्र शिव मंदिरों में से एक माना जाता है। इस स्थान से जुड़ी पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेतायुग में लंकापति रावण ने यहीं पर कठोर और घोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था।

मान्यताओं के मुताबिक, अपनी अटूट भक्ति का परिचय देते हुए रावण ने इसी भूमि पर अपने दसों सिर एक-एक करके भगवान शिव को अर्पित कर दिए थे, जिसके बाद भोलेनाथ ने उसे अमरता और अजेय होने का वरदान दिया था। स्थानीय लोग और यहां के पुजारी रावण को कोई दानव नहीं, बल्कि भगवान शिव का सबसे बड़ा और परम भक्त मानते हैं। यही कारण है कि दशहरे के दिन बैजनाथ में आपको रावण का पुतला जलता हुआ नहीं दिखेगा। इसके विपरीत, यहां के लोग रावण की महिमा और शिव भक्ति को याद करते हुए दीये जलाते हैं और विशेष आरती का आयोजन करते हैं।

2. बिसरख गांव (उत्तर प्रदेश) - जहां रावण को माना जाता है बेटा

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के पास स्थित बिसरख गांव का इतिहास सीधे तौर पर रावण के परिवार से जुड़ा हुआ है। इस गांव का नाम रावण के पिता महर्षि विश्रवा के नाम पर रखा गया था। किंवदंतियों के अनुसार, रावण का जन्म इसी पावन भूमि पर हुआ था और उसका बचपन यहीं बीता था।

बिसरख गांव के लोगों की आस्था रावण के साथ इतनी गहरी जुड़ी हुई है कि वे उसे अपने गांव का बेटा मानते हैं। यही वजह है कि इस गांव में आज तक कभी भी रामलीला का मंचन नहीं किया गया है और न ही कभी दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन हुआ है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि ऐसा करने से गांव पर कोई बड़ी आपदा आ सकती है। इसके विपरीत, जब पूरा देश दशहरे का जश्न मना रहा होता है, तब बिसरख गांव में एक अजीब सा सन्नाटा और शोक का माहौल रहता है। यहां के लोग रावण की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान करते हैं।

3. मंदसौर (मध्य प्रदेश) - जहां रावण को माना जाता है क्षेत्र का दामाद

मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले की कहानी और परंपरा बाकी जगहों से बिल्कुल अलग और बेहद दिलचस्प है। मंदसौर का प्राचीन नाम 'दशपुर' हुआ करता था। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, मंदसौर को रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका यानी जन्मस्थान माना जाता है। इस रिश्ते के आधार पर मंदसौर के स्थानीय लोग रावण को अपने क्षेत्र का दामाद मानते हैं।

मंदसौर के खानपुरा इलाके में रावण की एक विशाल प्रतिमा भी स्थापित है। यहां के लोगों की परंपरा के अनुसार, दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाने का कोई प्रावधान नहीं है। बल्कि, इस दिन इलाके के लोग और विशेषकर महिलाएं जब भी उस प्रतिमा के सामने से गुजरती हैं, तो वे दामाद के सम्मान में अपना घूंघट निकाल लेती हैं और सिर झुकाकर उनका आदर करती हैं। स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि अपने दामाद का अपमान करना उनके क्षेत्र की संस्कृति के खिलाफ है।

4. बस्तर और दक्षिण भारत के कुछ हिस्से - ताड़का की शक्तियों का सम्मान

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों वाले बस्तर क्षेत्र में आदिवासियों की अपनी अलग ही संस्कृति है। यहां गोंड और बैगा आदिवासी समुदाय के लोग रावण के साथ-साथ ताड़का जैसी पौराणिक पात्र को अपनी कुलदेवी और क्षेत्र की रक्षक के रूप में पूजते हैं। आदिवासियों का मानना है कि ताड़का ने प्रकृति और वनों की रक्षा के लिए संघर्ष किया था।

इसके अलावा, दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के कोलार और मांड्या जिलों में भी ऐसे कई गांव मिल जाएंगे, जहां रावण के प्रकांड ज्ञान, उसकी विद्वत्ता और उसकी महान शक्तियों का आदर किया जाता है। इन इलाकों में लोग दीये जलाकर रावण और ताड़का की मूर्तियों के सामने अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं, जो मुख्यधारा की संस्कृति से बिल्कुल अलग एक अनूठा उदाहरण पेश करता है।

इन अनोखे गांवों तक कैसे पहुंचें?

यदि आप भारत की इन छिपी हुई और रहस्यमयी परंपराओं को अपनी आंखों से देखना चाहती हैं, तो इन जगहों पर पहुंचना बहुत आसान है:

  • हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ जाने के लिए: आप गगल एयरपोर्ट (धर्मशाला) या पठानकोट रेलवे स्टेशन का सहारा ले सकती हैं, जहां से टैक्सी आसानी से मिल जाती है।
  • बिसरख गांव (उत्तर प्रदेश) के लिए: यह दिल्ली-एनसीआर के बिल्कुल पास ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में स्थित है, जहां सड़क मार्ग से मेट्रो या कैब के जरिए आसानी से पहुंचा जा सकता है।
  • मंदसौर (मध्य प्रदेश) के लिए: यहां का अपना रेलवे स्टेशन है और इंदौर एयरपोर्ट सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है, जो देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है।
  • बस्तर और दक्षिण भारत के गांवों के लिए: आप रायपुर या बेंगलुरु के लिए फ्लाइट लेकर आगे स्थानीय परिवहन या कैब की मदद से इन आदिवासी और ग्रामीण इलाकों तक पहुंच सकती हैं।

भारत की यह विविधता ही इसकी असली खूबसूरती है, जहां हर गली, हर गांव और हर कस्बे की अपनी एक अलग कहानी और मान्यता है। मुख्यधारा से हटकर बनी ये परंपराएं हमें यह सिखाती हैं कि इतिहास को देखने और समझने के दृष्टिकोण अलग-अलग हो सकते हैं।

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नसीम अहमद

नसीम अहमद

Writer (स्थानीय खबरें)

नसीम अहमद जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं। उन...

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