राजस्थान के पाली जिले की राजनीति में इन दिनों एक ऐसी सियासी पटकथा चर्चा का विषय बनी हुई है, जो किसी राजनीतिक फिल्म की कहानी से कम नहीं है। साल 2026 के इस राजनीतिक घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि बाहरी ताकतों से लड़ने से ज्यादा खतरनाक घर के भीतर बैठे अपने ही लोगों की महत्वाकांक्षाएं होती हैं। जनता ने अपना जनादेश पूरी स्पष्टता के साथ कांग्रेस के पक्ष में दिया था, आंकड़े गवाह थे और जीत की इबारत लगभग लिखी जा चुकी थी। लेकिन जिस शानदार तरीके से कांग्रेस को बोर्ड बनाना चाहिए था, वह जीत महज कुछ ही घंटों में ताश के पत्तों की तरह बिखर गई और सत्ता की चाबी सीधे प्रतिद्वंद्वी पार्टी के हाथों में चली गई।
पाली निकाय चुनाव: जनता का फैसला और कागजी आंकड़े
स्थानीय निकाय चुनावों के परिणाम जब सामने आए, तो राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई। पाली की कुल 65 वार्ड सीटों पर हुए मतदान में जनता ने जो verdicts सुनाया, वह कांग्रेस के लिए बेहद उत्साहजनक था। चुनावी गणित के मुताबिक, कांग्रेस के पाले में सीधे तौर पर 29 पार्षद जीतकर आए थे, जबकि एक अन्य निर्दलीय पार्षद को भी कांग्रेस समर्थित माना जा रहा था। इस तरह कुल 30 पार्षदों का मजबूत जादुई आंकड़ा कांग्रेस के पास था। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के खाते में 20 सीटें आई थीं, जबकि 15 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी।
अंकगणित साफ कह रहा था कि बोर्ड बनाने के लिए आवश्यक बहुमत से कांग्रेस बस कुछ ही कदम दूर थी और थोड़ी सी सूझबूझ से आसानी से अपना चेयरमैन बना सकती थी। लेकिन कहानी यहीं से दिलचस्प और पेचीदा मोड़ लेती है। जनादेश मिलने के बाद भी पार्टी के भीतर की आपसी फूट और वर्चस्व की लड़ाई ने ऐसा भूचाल लाया कि पूरी बाजी ही पलट गई।
तीन किरदार और पर्दे के पीछे की सियासत
पाली की इस राजनीतिक उठापटक में तीन नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहे- वरिष्ठ नेता प्रदीप हिंगड, चर्चित सियासी चेहरे हकीम भाई और स्थानीय विधायक भीमराज भाटी। चुनाव के ठीक पहले जब कांग्रेस पार्टी ने हेमसिंह शेखावत को पर्यवेक्षक बनाकर पाली भेजा, तो स्थानीय राजनीति का समीकरण तेजी से बदलने लगा। सूत्रों के अनुसार, पर्यवेक्षक महोदय पर स्थानीय संगठन की पकड़ ढीली पड़ी और ये तीनों नेता उन पर हावी होते चले गए।
इसी दौरान एक और बड़ा घटनाक्रम हुआ। भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व चेयरमैन राकेश भाटी की पार्टी से अनबन हो गई और वे भाजपा छोड़कर बाहर आ गए। उन्होंने कांग्रेस में अपना भविष्य तलाशना शुरू किया। पाली के स्थानीय संगठन और जिलाध्यक्ष का राकेश भाटी की एंट्री पर कड़ा विरोध था, क्योंकि लंबे समय से स्थानीय कांग्रेस पार्टी राकेश भाटी के प्रभाव और शासन के खिलाफ ही संघर्ष करती आई थी।नेतृत्व को दरकिनार कर जयपुर में ज्वाइनिंग
स्थानीय नेतृत्व की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए एक चौंकाने वाला कदम उठाया गया। जिलाध्यक्ष को पूरी तरह अंधेरे में रखकर राकेश भाटी को सीधे जयपुर बुलाया गया और कांग्रेस पार्टी की सदस्यता दिला दी गई। हालात ऐसे बने कि आनन-फानन में जिलाध्यक्ष को भी पीसीसी पहुंचना पड़ा ताकि औपचारिकताएं पूरी की जा सकें। यहीं से पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय दिग्गजों के बीच अविश्वास की दीवारें खड़ी होनी शुरू हो गईं।
असली विवाद तब और गहराया जब 65 वार्डों के लिए पार्टी के आधिकारिक टिकटों का बंटवारा होना था। आरोप है कि जिलाध्यक्ष को विश्वास में लिए बिना ही पर्यवेक्षक हेमसिंह शेखावत, हकीम भाई, प्रदीप हिंगड और विधायक भीमराज भाटी ने अपने स्तर पर टिकट तय कर दिए। इस पूरी प्रक्रिया में प्रदीप हिंगड की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा भी खुलकर सामने आने लगी, जो अपनी पत्नी को बोर्ड अध्यक्ष की रेस में सबसे आगे देखना चाहते थे।
बाड़ेबंदी और चेयरमैन पद की आंतरिक जंग
पार्षदों की खरीद-फरोख्त और तोड़फोड़ से बचाने के लिए कांग्रेस ने अपने पार्षदों को पाली से दूर ब्यावर के आगे विजयनगर के एक सुरक्षित ठिकाने पर बाड़ेबंदी में भेजा। इस पूरी बाड़ेबंदी की कमान भी प्रदीप हिंगड, हकीम भाई और विधायक भीमराज भाटी के हाथों में ही थी। लेकिन सवाल अब सिर्फ पार्षदों को सुरक्षित रखने का नहीं, बल्कि यह था कि आखिर इस जीत का ताज किसके सिर पर सजेगा यानी अगला महापौर कौन बनेगा?
यहीं पर कांग्रेस की अंतर्कलह सतह पर आ गई। विधायक भीमराज भाटी ने अपनी पसंद के रूप में सुमित्रा जैन का नाम चेयरमैन पद के लिए आगे बढ़ा दिया। यह फैसला प्रदीप हिंगड खेमे को नागवार गुजरा। मतभेद इतने बढ़े कि बात केवल वैचारिक असहमति तक सीमित नहीं रही, बल्कि नेताओं के घरों तक पहुंच गई। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम हो गई कि विधायक भाटी के करीबी और प्रदीप हिंगड के परिजनों के बीच तीखी झड़प और मारपीट तक की नौबत आ गई।
बगावत और निर्दलीय नामांकन का खेल
टिकट और कुर्सी की इस आपसी रस्साकशी के बीच प्रदीप हिंगड ने अपनी पत्नी राजबाला को महापौर पद के लिए निर्दलीय के रूप में मैदान में उतारने का फैसला किया और उनका पर्चा भरवा दिया। अब मुकाबला केवल कांग्रेस बनाम विपक्ष का नहीं रह गया था, बल्कि कांग्रेस पार्टी खुद अपने ही खिलाफ खड़ी हो चुकी थी।
सूत्रों का दावा है कि इस उठापटक के दौरान पार्षदों को अपने पाле में बनाए रखने के लिए प्रलोभनों का दौर भी चला। दुबई ट्रिप, भारी-भरकम नकद राशि और शॉपिंग जैसे ऑफर्स की चर्चाओं ने हवा पकड़ी। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है, लेकिन इसका असर यह हुआ कि कांग्रेस का अनुशासित दिखने वाला कुनबा अंदर से पूरी तरह खोखला हो चुका था।
वोटिंग का दिन: जब तीन वोटों पर सिमट गई पार्टी उम्मीदवार
मतदान का दिन आया तो स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी। कांग्रेस पार्टी की ओर से आधिकारिक प्रत्याशी के रूप में सुमित्रा जैन मैदान में थीं। जब मतपेटी खुली और परिणाम सामने आए, तो सब हैरान रह गए। पार्टी की आधिकारिक उम्मीदवार सुमित्रा जैन को महज 3 वोट मिले!
दूसरी तरफ, बगावत कर मैदान में उतरीं निर्दलीय उम्मीदवार राजबाला के पक्ष में कुल 29 वोट डल गए। इसकी मुख्य वजह यह थी कि कांग्रेस के अधिकांश पार्षदों को यह अहसास हो चुका था कि आपसी फूट के कारण यदि पार्टी एकजुट नहीं रही, तो भाजपा इस मौके का पूरा फायदा उठाकर बोर्ड बना लेगी। भाजपा को रोकने की मजबूरी में कांग्रेस पार्षदों ने अपनी पार्टी की उम्मीदवार को छोड़कर बागी राजबाला के पक्ष में मतदान करना सुरक्षित समझा।
भाजपा ने मारी बाजी, उपमहापौर पद पर बची लाज
इस पूरे सियासी ड्रामे का अंत बेहद नाटकीय रहा। 65 सदस्यीय सदन में भाजपा के पास अपने 20 पार्षद थे। बहुमत के जादुई आंकड़े (33) तक पहुंचने के लिए उसे निर्दलीय और क्रॉस वोटिंग का सहारा मिला। भाजपा उम्मीदवार नमिता बुबकिया को कुल 33 वोट मिले और वे पाली की नई महापौर चुन ली गईं। जनता ने जिस कांग्रेस पार्टी को सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में चुना था, वह अपनी ही अंतर्कलह और रणनीतिक भूलों के कारण सत्ता की दहलीज पर आकर हार गई।
हालांकि, इस पूरी सियासत के बीच उपमहापौर के चुनाव ने कांग्रेस के लिए थोड़ी राहत जरूर लाई। लॉटरी सिस्टम के जरिए निर्दलीय महबूब टी को उपमहापौर चुन लिया गया, जिससे पार्टी अपनी कुछ साख बचाने में कामयाब रही। यदि यह पद भी हाथ से निकल जाता, तो पाली में कांग्रेस के लिए स्थिति और भी ज्यादा शर्मनाक हो सकती थी।
निष्कर्ष: सबक जो भविष्य के लिए जरूरी हैं
पाली निकाय चुनाव का यह घटनाक्रम राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ा केस स्टडी है। यह साबित करता है कि जब किसी संगठन में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं पार्टी हित से ऊपर हो जाती हैं, और जब रणनीतिकार खुद गुटबाजी का शिकार हो जाते हैं, तब जनता का मिला हुआ स्पष्ट जनादेश भी विपक्ष की झोली में चला जाता है। प्रदीप हिंगड, हकीम भाई और विधायक भीमराज भाटी के बीच की इस सियासी खींचतान ने कांग्रेस को एक सुनहरी जीत के मुहाने पर आकर ला खड़ा किया था, जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं बचा था।