महाराष्ट्र की राजनीति में इस समय भूचाल आया हुआ है, और इसकी वजह कोई सियासी भाषण या चुनावी रैली नहीं, बल्कि मतदाता सूची (Voter List) से जुड़े गंभीर खुलासे हैं। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की कद्दावर नेता और सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने चुनाव आयोग और एसआईआर (SIR) प्रक्रिया पर ऐसा बड़ा सवालिया निशान लगाया है, जिसने प्रशासनिक गलियारों से लेकर राजनीतिक हलकों तक खलबली मचा दी है। उनका दावा है कि तमाम जरूरी और वैध दस्तावेज समय पर जमा करने के बावजूद, उनका और उनके परिवार का नाम वोटर लिस्ट से गायब कर दिया गया है।
दस्तावेज जमा करने के बाद भी सूची से नाम गायब
यह पूरा मामला तब सामने आया जब प्रियंका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी भड़ास निकाली। उन्होंने अपनी पोस्ट के जरिए बताया कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान उनके परिवार ने हर एक नियम का पालन किया। सभी मांगे गए जरूरी दस्तावेज तय समय सीमा के भीतर संबंधित अधिकारियों के पास जमा कराए गए थे। शुरुआत में जब ड्राफ्ट लिस्ट आई थी, तो उसमें उनका, उनके पति और उनके बेटे का नाम विधिवत शामिल था।
लेकिन, जैसे ही प्रक्रिया आगे बढ़ी और अंतिम चरण की बातें सामने आईं, तो उन्हें जो जानकारी मिली उसने उन्हें हैरान कर दिया। प्रियंका चतुर्वेदी के अनुसार, उन्हें अब यह बताया जा रहा है कि उनके परिवार के तीनों सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। अब मुंबई की फाइनल वोटर लिस्ट में अपना नाम दोबारा दर्ज करवाने के लिए उन्हें एक बार फिर से तमाम कागजात जमा करने होंगे और व्यक्तिगत रूप से चुनाव कार्यालय के चक्कर काटने पड़ेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम पर तंज कसते हुए उन्होंने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के अंत में लिखा, "चलिए, मुंबई के चुनाव कार्यालय की लाइन में मिलते हैं।" यह बयान न केवल उनकी नाराजगी को जाहिर करता है, बल्कि आम जनता द्वारा प्रशासनिक तंत्र के सामने झेली जाने वाली दिक्कतों को भी बखूबी उजागर करता है।
चुनाव आयोग के भीतर मचे घमासान का बड़ा खुलासा
मामला सिर्फ एक नेता के परिवार का नाम कटने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार बहुत गहरे और संस्थागत गड़बड़ियों से जुड़े हैं। प्रियंका चतुर्वेदी ने इस विवाद के बीच चुनाव आयोग (Election Commission) के भीतर चल रही अंदरूनी कलह और मतभेदों को भी जगजाहिर कर दिया है। उन्होंने उन मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला दिया जिनमें चुनाव आयोग के ही शीर्ष अधिकारियों के बीच असंतोष की बात सामने आई थी।
उपलब्ध जानकारियों के मुताबिक, आयोग के तीन आयुक्तों में से दो चुनाव आयुक्त—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों के दौरान एसआईआर प्रक्रिया के रोलआउट को लेकर कई बार आपत्ति जताई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज के तौर-तरीकों पर इन दोनों आयुक्तों ने आधिकारिक तौर पर लगभग 14 बार अपनी असहमति दर्ज कराई है।
क्या हैं चुनाव आयुक्तों की मुख्य आपत्तियां?
- अंधेरे में रखना: दोनों चुनाव आयुक्तों का यह गंभीर आरोप रहा है कि उन्हें मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने और उन्हें बहाल करने जैसी बेहद महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं से पूरी तरह दूर रखा गया और अंधेरे में रखा गया।अनधिकृत और गैरकानूनी कदम: एसआईआर प्रक्रिया के तहत नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए उठाए गए कई कदमों को इन आयुक्तों ने 'अनधिकृत और गैरकानूनी' करार दिया है।डेटाबेस का केंद्रीकरण: चेतावनी दी गई है कि मतदाता डेटाबेस के एक्सेस को दिल्ली में सेंट्रलाइज किया जा रहा है, जिससे जमीनी स्तर पर काम करने वाले स्थानीय अधिकारियों की भूमिका को नजरअंदाज किया जा रहा है।
"चुनाव आयोग किसी की जागीर नहीं है"
इन तमाम आंतरिक आपत्तियों और खुद के साथ हुए वाकये के बाद प्रियंका चतुर्वेदी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के ऊपर सीधा हमला बोला है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि अब मुख्य चुनाव आयुक्त के पद छोड़ने का समय आ गया है। उनके मुताबिक, जिस तरह के खुलासे सामने आए हैं, उसने देश की इस प्रतिष्ठित संस्था के कामकाज पर बहुत बड़ा धब्बा लगा दिया है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग जैसी संस्था किसी भी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं है जिसे अपनी मर्जी से चलाया जाए। यह एक संवैधानिक और नियमों पर आधारित वैधानिक संस्था है, जिसका एकमात्र और पवित्र उद्देश्य चुनावी रोल की शुद्धता और चुनावों की निष्पक्षता को बनाए रखना है। लेकिन, बाकी दो चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाई गई आपत्तियां इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि धरातल पर ऐसा कुछ भी निष्पक्ष रूप से नहीं हो रहा था।
आम जनता के अधिकारों पर बड़ा सवाल
यह घटनाक्रम केवल एक हाई-प्रोफाइल नेता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस आम नागरिक के अधिकारों से जुड़ा है जो लोकतंत्र के इस महापर्व में अपने मताधिकार का प्रयोग करता है। जब एक संसद सदस्य और जिम्मेदार जनप्रतिनिधि को इस प्रकार की प्रशासनिक लापरवाही और दस्तावेजों की भूलभुलैया का सामना करना पड़ रहा है, तो आम आदमी की क्या स्थिति होगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एसआईआर और मतदाता पुनरीक्षण जैसी प्रक्रियाओं में इस तरह की पारदर्शिता की कमी और तकनीकी या मानवीय त्रुटियां बनी रहीं, तो चुनाव की निष्पक्षता पर से जनता का भरोसा डगमगा सकता है। फिलहाल, प्रियंका चतुर्वेदी के इस खुलासे के बाद महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में तापमान काफी बढ़ गया है और आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर विपक्ष और मुखर हो सकता है।