भक्ति और कला की नगरी वाराणसी (काशी) में इन दिनों एक अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। यहां की संकरी गलियों से लेकर प्रमुख चौराहों तक विघ्नहर्ता भगवान गणेश के जयकारे गूंज रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अस्सी क्षेत्र के रहने वाले प्रसिद्ध मूर्तिकार और चित्रकार विजय कुमार अपनी अनोखी कला साधना से हर किसी को अचंभित कर रहे हैं। विजय कुमार की खासियत यह है कि वे अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर महज 20 से 30 सेकंड के भीतर कागज या कैनवास पर भगवान गणेश की मनमोहक आकृति उकेर देते हैं। उनकी इस कला को देखने वाले बस देखते ही रह जाते हैं और इसे किसी चमत्कार से कम नहीं मानते।
आंखें बंद, हाथों में कूची और मन में सिर्फ बप्पा का वास
सितंबर 2026 के इस पावन गणेश महोत्सव के अवसर पर जब पूरा देश विघ्नहर्ता की भक्ति में सराबोर है, तब विजय कुमार का कमरा किसी मंदिर से कम नहीं लगता। उनकी कार्यशैली बेहद अनूठी है। वे सबसे पहले अपनी आंखों पर मजबूत पट्टी बांधते हैं, जिससे रोशनी का कोई सवाल ही नहीं रहता। इसके बाद वे पूरी एकाग्रता के साथ मन ही मन गणेश मंत्र का जाप शुरू करते हैं। ध्यान की इसी अवस्था में वे अपने आराध्य की छवि को अपने मन में उतारते हैं और उनके हाथ बिना रुके, बेहद सधे हुए अंदाज में कैनवास पर चलने लगते हैं।
हैरानी की बात यह है कि बिना एक सेकंड गंवाए, कुछ ही पलों में बप्पा का एक बेहतरीन चित्र बनकर तैयार हो जाता है। उनके लिए यह केवल हाथ की सफाई नहीं है, बल्कि एक गहरी साधना है। विजय कुमार का मानना है कि उनकी यह कला उनकी अपनी कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि सीधे तौर पर भगवान गणेश की असीम कृपा है, जो उनके हाथों से इस रूप में साकार होती है।
बचपन की जिज्ञासा से शुरू हुआ सफर, परिवार की पुरानी परंपरा
किसी भी कला के पीछे बरसों की मेहनत और कड़ा संघर्ष छिपा होता है। विजय कुमार के साथ भी ऐसा ही है। उनके परिवार में पीढ़ियों से मूर्ति निर्माण और शिल्प कला की परंपरा चली आ रही है। उनके पूर्वज पत्थरों को तराशकर अद्भुत मूर्तियां बनाया करते थे। यही वजह है कि कला के संस्कार विजय को विरासत में मिले। बचपन से ही उनका झुकाव मूर्तिकला और चित्रकारी की ओर हो गया था।
शुरुआती दौर में वे अन्य कलाकारों की तरह सामान्य रूप से खुली आंखों से ही चित्र बनाया करते थे। लेकिन जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उनकी कला को पूरी तरह से एक नया आयाम दे दिया। उनके एक भतीजे ने उन्हें मजाक-मजाक में या एक चुनौती के रूप में आंखों पर पट्टी बांधकर चित्र बनाने की बात कही। विजय ने इस चुनौती को सहजता से स्वीकार किया और इसे अपनी साधना का हिस्सा बना लिया। इसके बाद उन्होंने जो निरंतर अभ्यास किया, उसी का परिणाम है कि आज वे बिना देखे केवल अपनी कला के दम पर पलक झपकते ही गणेश जी का चित्र बना लेते हैं।
108 चित्रों के संकल्प के साथ शुरू होता है गणेश महोत्सव
गणेश उत्सव के पावन पर्व पर विजय कुमार का नियम बेहद कड़ा और अनुशासित होता है। वे महोत्सव के पहले दिन ही 108 चित्रों को बनाने का विशेष संकल्प लेते हैं। जैसे हिंदू सनातन परंपरा में भक्त 108 मनकों वाली माला से भगवान का निरंतर स्मरण और जाप करते हैं, ठीक उसी प्रकार विजय कुमार 108 अलग-अलग चित्रों के माध्यम से बप्पा का ध्यान करते हैं।
इन चित्रों को बनाते समय उनके मुख से लगातार गणेश मंत्रों का उच्चारण होता रहता है और प्रत्येक चित्र पूरा होने के बाद वे उसे अपने आराध्य को समर्पित करते जाते हैं। यह दृश्य देखने वालों के लिए सिर्फ एक पेंटिंग का निर्माण नहीं होता, बल्कि साक्षात भक्ति और समर्पण का जीवंत उदाहरण बन जाता है।
लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज है नाम, मिल चुके हैं कई प्रतिष्ठित सम्मान
विजय कुमार की यह अनूठी कला अब किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उनकी इस असाधारण प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल चुकी है। उनका नाम प्रतिष्ठित ‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में भी दर्ज हो चुका है। इसके अलावा उन्होंने काशी के प्रसिद्ध 56 विनायकों के चित्रों को भी अपनी कला के माध्यम से जीवंत किया है, जिन्हें देखने के लिए दूर-दूर से कला प्रेमी और शोधकर्ता आते हैं।
देश के विभिन्न महानगरों और सांस्कृतिक मंचों पर उनकी पेंटिंग की प्रदर्शनियां लगाई जा चुकी हैं, जहाँ उनकी कला की जमकर सराहना हुई है। उनकी इस साधना और काशी की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने के लिए उन्हें ‘काशी रत्न’ जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।
35 वर्षों की लंबी तपस्या और आगे का संकल्प
अपने जीवन के करीब 35 साल पूरी तरह से चित्रकला और मूर्ति कला को समर्पित करने वाले विजय कुमार का मानना है कि कला एक ऐसी साधना है जिसका कोई अंत नहीं होता। अपने अब तक के सफर में वे बंद आंखों से लाखों की संख्या में भगवान गणेश की पेंटिंग्स बना चुके हैं। उनका कहना है कि जब तक उनके आराध्य बप्पा की इच्छा होगी और उनके शरीर में ऊर्जा बनी रहेगी, तब तक यह कला-साधना रुकने वाली नहीं है।
आधुनिकता की अंधी दौड़ में जहां लोग कला को केवल व्यापार और मुनाफे का जरिया मान रहे हैं, वहीं विजय कुमार जैसे कलाकार यह साबित करते हैं कि सच्ची कला वही है जो मनुष्य को ईश्वर के करीब ले जाए। उनके लिए रंग, कूची और कैनवास केवल माध्यम मात्र हैं, असली मंजिल तो भगवान गणेश के चरणों में अर्पित होने वाली वह कला-अंजलि है जो हर देखने वाले के मन में भक्ति का दीप प्रज्वलित कर देती है।