धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी काशी में शनिवार को एक ऐसा अनोखा नजारा देखने को मिला, जिसने देश भर के पशुपालकों और कृषि विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के प्रांगण में नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) के तत्वावधान में आयोजित 'रंगीलो काशी' कार्यक्रम के दौरान पहली बार 'नंदी कैटवॉक' का आयोजन किया गया। इस अनूठी पहल का मुख्य उद्देश्य भारतीय देशी गोवंश की नस्लों का संरक्षण करने के साथ-साथ किसानों को वैज्ञानिक पशुपालन के प्रति जागरूक करना था।
रैंप पर उतरे साहीवाल और गिर, दिखाई गई नस्लीय विशेषताएं
आमतौर पर फैशन शो के लिए जाने वाले कैटवॉक शब्द को जब पहली बार गोवंश से जोड़ा गया, तो देखने वालों में भारी उत्साह दिखा। इस कार्यक्रम में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात से लाई गई प्रतिष्ठित देशी नस्लों के गोवंश की भव्य प्रदर्शनी लगाई गई। साठ-गांठ और शान के साथ जब साहीवाल सांड के साथ उसकी बछिया, गिर सांड के साथ उसकी बछिया और भदावरी नस्ल की भैंस के साथ उसकी पड़िया ने रैंप पर वॉक किया, तो पूरा परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
इस कैटवॉक का मुख्य मकसद पशुपालकों और आम जनता को यह समझाना था कि शुद्ध देशी नस्ल के पशुओं की पहचान क्या होती है और उनकी संतानों में वे गुण किस प्रकार ट्रांसफर होते हैं। इस दौरान उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले पशुपालकों को सम्मानित भी किया गया ताकि ग्रामीण आंचल में आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों से पशुपालन को बढ़ावा मिल सके।
कृत्रिम गर्भाधान और नस्ल सुधार से बदली तस्वीर
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे उत्तर प्रदेश के कृषि, पशुधन एवं दुग्ध विकास मंत्री धर्मपाल सिंह ने गोवंश की पूजा-अर्चना कर बछड़े की आरती उतारी। उन्होंने इस दौरान कहा कि राज्य सरकार किसानों की आय को दोगुना करने के लिए पशुधन क्षेत्र में लगातार नए आयाम स्थापित कर रही है।
मंत्री ने अपने संबोधन में कहा, 'एक समय था जब हमारे प्रदेश की कई देशी नस्ल की गायें अपनी कम दूध देने की क्षमता के कारण पशुपालकों के लिए आर्थिक बोझ बनती जा रही थीं। ये गायें बमुश्किल एक से दो लीटर दूध देती थीं। लेकिन, कृत्रिम गर्भाधान और आधुनिक नस्ल सुधार तकनीकों ने इस पूरी तस्वीर को बदलकर रख दिया है।' उन्होंने गर्व के साथ साझा किया कि आज वैज्ञानिक पद्धतियों और बेहतर जेनेटिक्स के इस्तेमाल से कई देशी गायों का दुग्ध उत्पादन बढ़कर 10 से 12 लीटर प्रति दिन तक पहुंच गया है।

काशी की अपनी 'गंगा-गिरि' गाय को विकसित करने की कवायद
क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय नस्लों को बढ़ावा देने के सिलसिले में सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है। मंत्री धर्मपाल सिंह ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि काशी क्षेत्र की अपनी 'गंगा-गिरि' गाय की नस्ल को विकसित करने के लिए तेजी से प्रयास चल रहे हैं। एनडीडीबी के सहयोग से इस दिशा में वैज्ञानिक रिसर्च और ब्रीडिंग प्रोग्राम को आगे बढ़ाया जा रहा है, ताकि पूर्वांचल के किसानों को एक ऐसी देशी नस्ल मिल सके जो कम लागत में बंपर दूध उत्पादन दे सके।
अब मात्र 100 रुपये में मिलेगा सेक्स-ॉर्टेड सीमेन (विशेष वीर्य)
पशुपालकों के लिए आर्थिक राहत का ऐलान करते हुए सरकार ने बछिया पैदा कराने वाले विशेष वीर्य (सेक्स-ॉर्टेड सीमेन) की कीमतों में भारी कटौती की घोषणा की है। पहले यह विशेष वीर्य किसानों को 300 रुपये प्रति डोज की दर से मिलता था, जिसे अब घटाकर मात्र 100 रुपये कर दिया गया है।
इस फैसले के पीछे का मुख्य तर्क यह है कि पशुपालकों को नर बछड़ों के बजाय अधिक संख्या में उच्च नस्ल की बछिया प्राप्त हों, जिससे भविष्य में दुग्ध उत्पादन का दायरा तेजी से बढ़ सके। सरकार का मानना है कि इस कदम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई मजबूती मिलेगी और युवा किसान भी डेयरी फार्मिंग की तरफ आकर्षित होंगे।
राजनीतिक बयानबाजी और अन्य पशुधन क्षेत्रों पर जोर
कार्यक्रम के दौरान गोवंश संरक्षण को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी देखने को मिली। गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा दिए जाने से जुड़े एक सवाल के जवाब में मंत्री धर्मपाल सिंह ने पिछली सपा और बसपा सरकारों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए गाय का गोबर पवित्र चंदन के समान है, जबकि पिछली सरकारों में इसे लेकर अलग ही सोच थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गोवंश का संरक्षण और संवर्द्धन इस सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शुमार है।
इसके साथ ही, उत्तर प्रदेश में मांस और बीफ निर्यात से जुड़े एक अन्य सवाल पर स्पष्टीकरण देते हुए मंत्री ने कहा कि पशुधन विभाग के दायरे में केवल गाय ही नहीं आती है। मुर्गी पालन (पोल्ट्री), बकरी पालन (गोट फार्मिंग) और भेड़ पालन भी इसी विभाग का अभिन्न हिस्सा हैं। सरकार इन सभी पशुपालन गतिविधियों से जुड़े रोजगार और मांस उत्पादन को भी पूरी पारदर्शिता और नियमों के तहत बढ़ावा दे रही है ताकि हर वर्ग के पशुपालक की आजीविका सुरक्षित हो सके।
निष्कर्ष: ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नया ग्रोथ इंजन
'रंगीलो काशी' जैसे आयोजनों और 'नंदी कैटवॉक' जैसी अनूठी पहलों ने यह साबित कर दिया है कि अब पशुपालन को केवल एक पारंपरिक व्यवसाय के रूप में नहीं, बल्कि एक हाई-टेक और प्रॉफिटेबल बिजनेस के रूप में देखा जाने लगा है। वैज्ञानिक तकनीकों, कम लागत में मिलने वाले सेक्स-ॉर्टेड सीमेन और देशी नस्लों के संवर्द्धन के जरिए आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश का दुग्ध उद्योग देश में एक नया मील का पत्थर साबित हो सकता है।