काठमांडू की सड़कों पर गूंजने वाले नारों और उसके बाद भड़की भयानक हिंसा की आग को शांत हुए एक साल पूरा हो चुका है। नेपाल की राजनीति के वरिष्ठ नेता और सीपीएन-यूएमएल के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली ने इस खौफनाक दिन की पहली बरसी पर एक वीडियो संदेश जारी किया है। इस संदेश में उन्होंने पिछले साल यानी 9 सितंबर के घटनाक्रम को लेकर जो खुलासे किए हैं, उन्होंने राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर हलचल पैदा कर दी है। ओली ने साफ शब्दों में कहा है कि जेन-जी के नाम पर भड़की वह हिंसा केवल एक तात्कालिक गुस्सा नहीं था, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक बुनियाद को हिलाने के लिए रची गई एक खतरनाक साजिश थी।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन और आपराधिक घुसपैठ की दास्तान
केपी शर्मा ओली के मुताबिक, युवाओं का वह आंदोलन शुरुआत में पूरी तरह से शांतिपूर्ण था। 8 सितंबर को जब युवा सड़कों पर उतरे थे, तो उनके मुद्दे बिल्कुल स्पष्ट थे। वे देश में सुशासन चाहते थे और सोशल मीडिया पर लगाए गए पाबंदियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे। भारतीय उपमहाद्वीप के इस पड़ोसी देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान हर नागरिक को देता है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना हर युवा का लोकतांत्रिक हक भी है।
लेकिन समस्या तब शुरू हुई जब इस पवित्र और अधिकार-युक्त आंदोलन में कुछ असामाजिक और आपराधिक तत्व घुस आए। ओली का आरोप है कि इन तत्वों ने सुनियोजित तरीके से शांतिपूर्ण प्रदर्शन की दिशा को मोड़ दिया। उन्होंने युवाओं को आगे करके उन्हें संसद भवन की तरफ धकेला, जहां सुरक्षा बलों के साथ झड़प हुई और दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से कुछ युवाओं को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस दौरान उन्होंने अपनी ड्यूटी निभा रहे पुलिसकर्मियों की शहादत और जान गंवाने वाले युवाओं के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की।
9 सितंबर का दिन: आक्रोश या कोई सुनियोजित साजिश?
ओली का मानना है कि 8 सितंबर की घटनाओं के बाद उपजा गुस्सा स्वाभाविक था, लेकिन 9 सितंबर को जो कुछ हुआ, उसे महज़ गुस्से की प्रतिक्रिया कहकर टाला नहीं जा सकता। राष्ट्रपति कार्यालय, प्रधानमंत्री आवास, देश का पावर सेंटर सिंहदरबार, संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट और राजनीतिक दलों के मुख्यालयों पर एक साथ हुए हमले इस बात की गवाही देते हैं कि यह कोई स्वतःस्फूर्त विरोध नहीं था।
सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को जिस बेदर्दी से लूटा गया और आग के हवाले किया गया, उसने नेपाल की रीढ़ की हड्डी यानी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को गहरा जख्म दिया। ओली ने सीधे तौर पर सवाल उठाया है कि आखिर इस तबाही को अंजाम देने वाले असली चेहरे कौन थे? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी राष्ट्रीय क्षति के बावजूद अब तक दोषियों को जवाबदेह क्यों नहीं बनाया गया? रिपोर्टों पर पर्दा क्यों डाला जा रहा है?
युवाओं की भावनाएं सच्ची थीं, लेकिन फायदा दूसरों ने उठाया
राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि नेपाल के युवाओं के मन में व्यवस्था को लेकर जो असंतोष था, वह पूरी तरह वास्तविक था। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और भविष्य को लेकर अनिश्चितता जैसे मुद्दों पर युवा वर्ग का सड़कों पर उतरना लाजिमी था। लेकिन इस आंदोलन की कमजोरी का फायदा उन ताकतों ने उठाया जो नेपाल की प्रगतिशील राह को रोकना चाहती थीं।
केपी शर्मा ओली ने अपनी चेतावनी में कहा कि जेन-जी आंदोलन की आड़ में अराजकता फैलाने वाले लोग देश को एक बार फिर अंधकार और निरंकुशता के युग में धकेलना चाहते थे। राष्ट्रवाद और लोकतंत्र के रास्ते पर चल रहे नेपाल की संप्रभुता को कमजोर करने का यह एक सुनियोजित प्रयास था, जिसे वक्त रहते समझ लेना बेहद जरूरी है।
नफरत और बदले की राजनीति से देश को खतरा
अपने संबोधन में ओली ने इस बात पर भी जोर दिया कि आज लोकतांत्रिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों के खिलाफ सोची-समझी रणनीति के तहत नफरत फैलाई जा रही है। समाज में बदले की भावना को बढ़ावा देना किसी भी देश के हित में नहीं हो सकता। यदि इस प्रकार की प्रवृत्तियों को रोका नहीं गया, तो यह नेपाल को विकास के मार्ग से कई साल पीछे धकेल देंगी।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमला: देश के मुख्य अंगों और संवैधानिक पीठों को निशाना बनाना लोकतंत्र के लिए घातक है।
- दण्डहीनता के खिलाफ जंग: कानून तोड़ने वालों को संरक्षण मिलने से अराजकता को बढ़ावा मिलता है।
- युवाओं का असंतोष: नीति निर्माताओं को युवाओं की वास्तविक चिंताओं का समाधान संवाद के जरिए निकालना होगा।
देशभक्त और प्रगतिशील ताकतों से एकजुट होने की अपील
मौजूदा हालात की नजाकत को समझते हुए केपी शर्मा ओली ने देश के सभी देशभक्त, लोकतांत्रिक, वामपंथी और शांतिप्रिय नागरिकों से आगे आने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि नेपाल के संविधान, उसकी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए अब राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर एक मंच पर खड़े होने का समय आ गया है।
बरसी के इस दिन को केवल एक शोक दिवस के रूप में मनाने के बजाय, इसे अराजकता और दण्डहीनता के विरुद्ध एक कड़े संकल्प के रूप में लिया जाना चाहिए। देश की सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए एक मजबूत और समृद्ध नेपाल के निर्माण के लिए हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति कभी न हो सके।