हिमालयी देश नेपाल में प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाली आर्थिक चुनौतियों से निपटने की दिशा में एक अहम प्रशासनिक कदम उठाया गया है। काठमांडू स्थित सिंहदरबार में आयोजित प्रतिनिधि सभा की वित्त समिति की एक उच्चस्तरीय बैठक में नेपाल की अर्थव्यवस्था पर रसुवा जिले में आई भीषण बाढ़ के दुष्प्रभावों का गहन अध्ययन करने का निर्णय लिया गया है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त (क्लाइमेट फाइनेंस) के मोर्चे पर देश की स्थिति का आकलन करने के लिए एक विशेष सात सदस्यीय उपसमिति का गठन कर दिया गया है।
आपदा और अर्थव्यवस्था: क्यों पड़ी इस समिति की जरूरत?
हाल के वर्षों में वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण नेपाल जैसे पर्वतीय देशों में प्राकृतिक आपदाओं की बारंबारता और तीव्रता दोनों में खतरनाक वृद्धि देखी गई है। रसुवा क्षेत्र में आई बाढ़ ने स्थानीय जनजीवन के साथ-साथ देश की मैक्रो-इकोनॉमी और बुनियादी ढांचे को भी गहरा आघात पहुंचाया है। ऐसी आपदाएं केवल तात्कालिक राहत कार्यों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि इनसे देश के राजकोषीय संतुलन, पर्यटन, जलविद्युत परियोजनाओं और कृषि क्षेत्र पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं।
यही कारण है कि नेपाल की संसद ने इस मामले को अत्यधिक गंभीरता से लेते हुए इसके वैज्ञानिक और आर्थिक विश्लेषण का निर्णय लिया है। सरकार यह समझना चाहती है कि इस प्रकार की आपदाओं से उबरने के लिए देश की वित्तीय प्रणाली कितनी तैयार है और इसमें किस प्रकार के संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है।
सांसद सुशील खड़का के नेतृत्व में सात सदस्यीय टीम का गठन
सिंहदरबार में हुई इस महत्वपूर्ण बैठक में सर्वसम्मति से सांसद सुशील खड़का को इस नवनिर्मित उपसमिति का समन्वयक (Coordinator) नियुक्त किया गया है। उनके नेतृत्व में यह विशेषज्ञ समिति रसुवा बाढ़ के प्रत्येक आर्थिक पहलू का बारीकी से अध्ययन करेगी। इस सात सदस्यीय उपसमिति में नेपाल के विभिन्न राजनीतिक दलों और पृष्ठभूमियों से ताल्लुक रखने वाले अनुभवी सांसदों को शामिल किया गया है, ताकि रिपोर्ट पूरी तरह से निष्पक्ष और व्यापक हो सके।
उपसमिति के प्रमुख सदस्य:
- सुशील खड़का - समन्वयक (Coordinator)
- नरेंद्र कुमार केरुङ - सदस्य
- परशुराम तामाङ - सदस्य
- डॉ. पुष्पराज कंडेल - सदस्य
- लिमा अधिकारी - सदस्य
- पुष्पा चौधरी - सदस्य
- सुशांत वैदिक - सदस्य
क्लाइमेट फाइनेंस और वैश्विक फंडिंग पर रहेगा विशेष फोकस
इस उपसमिति के गठन के पीछे एक और सबसे बड़ा उद्देश्य 'क्लाइमेट फाइनेंस' (जलवायु वित्तपोषण) के उपयोग और उससे जुड़ी चुनौतियों का मूल्यांकन करना है। दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों के लिए विभिन्न वैश्विक मंचों और संस्थाओं द्वारा क्लाइमेट फंड जारी किए जाते हैं। नेपाल जैसे विकासशील देश इन फंड्स का किस प्रकार प्रभावी उपयोग कर रहे हैं और आपदा प्रबंधन में इसका क्या योगदान रहा है, यह समिति इन सभी बिंदुओं की समीक्षा करेगी।
वित्त समिति के अध्यक्ष डॉ. कृष्णहरि बुढाथोकी ने बैठक के दौरान मीडिया और समिति के सदस्यों को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि इस उपसमिति की कार्यप्रणाली बेहद पारदर्शी और समयबद्ध होगी। उन्होंने बताया कि समिति को न केवल रसुवा बाढ़ के तात्कालिक आर्थिक नुकसान का आकलन करना है, बल्कि भविष्य के लिए एक दीर्घकालिक रणनीति का खाका भी तैयार करना है।
18 सितंबर तक रिपोर्ट सौंपने का सख्त निर्देश
संसदीय प्रक्रियाओं में गतिशीलता और त्वरित कार्रवाई का परिचय देते हुए इस उपसमिति को बेहद कम समय सीमा दी गई है। समिति को निर्देश दिया गया है कि वह आगामी 18 सितंबर तक अपनी विस्तृत और तथ्यात्मक रिपोर्ट मुख्य वित्त समिति के समक्ष प्रस्तुत करे। इस अल्प अवधि के भीतर देश के पहाड़ी इलाकों में आए आर्थिक संकट और जलवायु वित्त के दांव-पेंचों का अध्ययन करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
जानकारों का मानना है कि इस रिपोर्ट के आने के बाद नेपाल सरकार नीतिगत स्तर पर कई बड़े फैसले ले सकती है। विशेष तौर पर आपदा प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्निर्माण के लिए बजट आवंटन, बीमा दावों के निपटारे में तेजी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाली जलवायु सहायता राशि के बेहतर प्रबंधन के लिए नए दिशानिर्देश बन सकते हैं।
आगे की राह और उम्मीदें
नेपाल में जलवायु परिवर्तन और आपदाओं के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान का आकलन करने के लिए यह पहल एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। दक्षिण एशिया के इस हिस्से में इकोसिस्टम बेहद संवेदनशील है, और हर साल मानसून के दौरान आने वाली आपदाएं अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार देती हैं। यदि यह उपसमिति अपनी रिपोर्ट के माध्यम से कोई ठोस और व्यावहारिक सिफारिशें पेश करने में सफल रहती है, तो यह न केवल रसुवा के पीड़ितों के लिए राहत का मार्ग प्रशस्त करेगी, बल्कि भविष्य की आपदाओं से निपटने के लिए नेपाल की वित्तीय सुरक्षा को भी मजबूत करेगी। अब सभी की निगाहें 18 सितंबर पर टिकी हैं, जब यह समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक करेगी।