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भोजपुरी लोकगीत 'ननदी करेली मनमानी' में ननद-भौजाई का खट्टा-मीठा रिश्ता

भोजपुरी लोकगीत 'ननदी करेली मनमानी' में ननद-भौजाई का खट्टा-मीठा रिश्ता

भोजपुरी लोकगीतों में पारंपरिक पारिवारिक रिश्तों की झलक और ननद-भाभी की नोंक-झोंक का अनोखा चित्रण

बिहार की सांस्कृतिक धरोहर में लोकगीतों का एक विशेष स्थान है, जो केवल मनोरंजन तक सीमित न होकर यहाँ के जनजीवन और रिश्तों की वास्तविक तस्वीर पेश करते हैं। फिल्मी धुनों और आधुनिकता से दूर, ये पारंपरिक गीत घर-परिवार के ताने-बाने को बहुत ही सहजता से दर्शाते हैं। ऐसा ही एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय लोकगीत 'ननदी करेली मनमानी' है, जो एक गृहणी और उसकी ननद के बीच के खट्टे-मीठे संबंधों को बहुत ही सजीव अंदाज में बयां करता है। इस गीत के माध्यम से एक पत्नी अपने पति के सामने अपनी ननद के रवैये को लेकर उलाहना देती है और अपनी परेशानियों को साझा करती है।

पति से की जाने वाली शिकायत और ननद की मनमानी

इस लोकगीत की संरचना एक पत्नी और उसके पति के बीच होने वाले संवाद पर आधारित है। गीत की शुरुआती पंक्तियों में पत्नी अपनी ननद के व्यवहार से उपजी झुंझलाहट को बयां करती हुई कहती है कि ननद पूरे दिन अपनी मनमानी करती है और छोटी-छोटी बातों के लिए उसे ही आवाज लगाती है। गीत के शब्दों के अनुसार, ननद बार-बार पानी मंगाकर भाभी के साथ ऐसा बर्ताव करती है जैसे वह घर की कोई साधारण नौकरानी हो। पति को 'ऐ राजा' कहकर संबोधित करते हुए वह अपनी इस रोजमर्रा की उलझन को खुलकर सामने रखती है, जिससे ग्रामीण परिवेश के परिवारों में घरेलू कामकाज और अधिकारों के बीच की हल्की-फुल्की तकरार झलकती है।

ताने, डराने का अंदाज और खुद को खानदानी समझना

जैसे-जैसे गीत आगे बढ़ता है, ननद और भाभी के बीच का तनाव और अधिक मुखर रूप लेता है। महिला अपने पति को बताती है कि उसकी ननद दिनभर ताने कसने से नहीं चूकती, उसे आंखें दिखाती है और बात-बात पर डराने की कोशिश करती है। गीत के भाव बताते हैं कि ननद उस महिला को घर के किसी अपने सदस्य की तरह नहीं समझती, बल्कि उस पर अपनी धौंस जमाती है। इसके अलावा, गीत में इस बात का भी जिक्र आता है कि कैसे ननद घर की अन्य वरिष्ठ महिलाओं, विशेषकर सास के कान भरकर सास और बहू के बीच दूरियां बढ़ाने का प्रयास करती है और खुद को किसी ऊंचे और बड़े खानदान की नुमाइंदा साबित करने की कोशिश करती है।

शिकायतों के पीछे छिपा दांपत्य विश्वास

यद्यपि इस पूरे लोकगीत में एक महिला का स्वर अपनी ननद की शिकायतों और उसके आक्रामक रवैये से भरा हुआ है, लेकिन इसके गहरे निहितार्थ में पति के प्रति उसका अटूट विश्वास छिपा होता है। पत्नी द्वारा पति से अपनी ननद की शिकायत करना यह दर्शाता है कि उसे अपने जीवनसाथी से पूरी उम्मीद है कि वह उसकी बात को गंभीरता से सुनेगा। इस प्रकार के लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय ग्रामीण समाज के पारिवारिक मनोविज्ञान, घरेलू राजनीति और रिश्तों की बारीकियों को समझने का एक जीवंत दस्तावेज हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा के रूप में आगे बढ़ते रहे हैं।

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काव्या त्रिपाठी

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Senior Editor

काव्या त्रिपाठी बिजनेस और टेक्नोलॉजी की जटिल दुनिया को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं। वे आर्थिक बदलाव, स्टार्टअप इकोसिस्...

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