विशेषज्ञों के अनुसार स्तनपान से स्तन कैंसर का जोखिम कम जरूर होता है, लेकिन यह इस बीमारी को पूरी तरह समाप्त नहीं करता।
महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े विषयों में यह सवाल अक्सर सामने आता है कि क्या बच्चों को स्तनपान (ब्रेस्टफीडिंग) कराने से ब्रेस्ट कैंसर का खतरा पूरी तरह टल जाता है? मेडिकल एक्सपर्ट्स का स्पष्ट मानना है कि स्तनपान कराने से इस गंभीर बीमारी का जोखिम घट जरूर जाता है, लेकिन इसे इस खतरे का संपूर्ण अंत नहीं माना जा सकता। हालांकि स्तनपान के फायदों के समर्थन में कई बड़े शोध के आंकड़े उपलब्ध हैं, फिर भी किसी महिला की फीडिंग हिस्ट्री यह तय नहीं करती कि उसे भविष्य में ब्रेस्ट कैंसर होगा या नहीं।

क्या कहती हैं मेडिकल रिसर्च?
साल 2002 में प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल 'द लांसेट' में एक विस्तृत अध्ययन प्रकाशित हुआ था, जिसमें 30 देशों के 47 अध्ययनों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया था। इस रिसर्च में यह बात सामने आई थी कि महिलाएं जितने लंबे समय तक बच्चों को स्तनपान कराती हैं, ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम उतना ही कम होता जाता है। बच्चों के जन्म की संख्या को ध्यान में रखते हुए, स्तनपान कराने के कुल समय में हर 12 महीने की बढ़ोतरी से ब्रेस्ट कैंसर के जोखिम में आनुपातिक रूप से 4.3 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह अवधि एक महिला की सभी गर्भधारण की अवधियों को जोड़कर आंकी जाती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी महिला ने अपने दो बच्चों में से प्रत्येक को 6-6 महीने तक स्तनपान कराया है, तो स्तनपान की कुल अवधि 12 महीने मानी जाएगी। आमतौर पर स्तनपान का समय जितना अधिक होता है, उसका सकारात्मक प्रभाव उतना ही अधिक मिलता है, फिर भी इसे बीमारी से बचाव की कोई शत-प्रतिशत गारंटी नहीं माना जा सकता है।
स्तनपान जोखिम को किस प्रकार प्रभावित करता है?
डॉक्टरों और शोधकर्ताओं के अनुसार, स्तनपान कराने से महिलाओं में ओव्यूलेशन (अंडोत्सर्ग) और मासिकधर्म (पीरियड्स) में देरी हो सकती है। इससे शरीर का साइक्लिकल ओवेरियन हार्मोन के संपर्क में रहने का समय कम हो जाता है, जो कैंसर के जोखिम को नियंत्रित करने में मददगार है। इसके अतिरिक्त, दूध पिलाने और दूध छुड़ाने की प्रक्रिया के दौरान स्तनों के ऊतकों (ब्रेस्ट टिश्यूज) में कई तरह के बदलाव आते हैं, जो डीएनए को नुकसान पहुंचाने वाली कोशिकाओं को हटाने में सहायता कर सकते हैं। हालांकि, ये सभी संभावित चिकित्सीय कारण हैं और यह पूरी तरह साफ नहीं है कि इनमें से किस एक कारक का कितना योगदान रहता है।
यह असर कैंसर के प्रकार पर भी निर्भर करता है। साल 2015 में किए गए एक अन्य अध्ययन से पता चला कि जिन महिलाओं ने अपने बच्चों को स्तनपान कराया था, उनमें ट्रिपल-नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर का खतरा 22 प्रतिशत तक कम पाया गया। वहीं, हार्मोन रिसेप्टर-पाजिटिव कैंसर के मामलों में परिणाम एक जैसे नहीं देखे गए।
ब्रेस्ट हेल्थ और मानसिक सतर्कता क्यों जरूरी है?
अमृता अस्पताल, फरीदाबाद के जनरल सर्जरी विभाग की ब्रेस्ट डिजीज डिवीजन की सीनियर कंसलटेंट और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शिवेता राजदान का कहना है कि जो महिलाएं किसी चिकित्सकीय या व्यक्तिगत कारण से स्तनपान नहीं करा पाती हैं, जो ऐसा करने की इच्छा नहीं रखती हैं या जिनके कोई संतान नहीं है, उन्हें कैंसर होने पर खुद को दोषी नहीं मानना चाहिए। उम्र, आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) और अन्य कई जीवनशैली से जुड़े कारक मिलकर ब्रेस्ट कैंसर के संपूर्ण जोखिम को तय करते हैं। इसलिए महिलाओं को नियमित स्वास्थ्य जांच और सतर्कता पर ध्यान देना चाहिए।