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किन्नौर में पहली बार दिखा पैसिफिक गोल्डन प्लोवर, 3800 मीटर की ऊंचाई पर हुआ अभिलेखन

किन्नौर में पहली बार दिखा पैसिफिक गोल्डन प्लोवर, 3800 मीटर की ऊंचाई पर हुआ अभिलेखन

समुद्र तटों और आर्द्रभूमियों की यह प्रजाति पहली बार इतनी अधिक ऊंचाई पर नजर आई है, जिससे राज्य की पक्षी विविधता के नए आयाम सामने आए हैं।

हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ों में प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी का एक नया और महत्वपूर्ण मामला सामने आया है। राज्य के किन्नौर जिले के कल्पा क्षेत्र में समुद्र तल से लगभग 3,800 मीटर की ऊंचाई पर पैसिफिक गोल्डन प्लोवर (Pacific Golden Plover) पक्षी को पहली बार अभिलेखित किया गया है। बीते 5 अक्टूबर को एक स्थानीय घास के मैदान में छोटी जलधारा के किनारे इस अनोखे मेहमान को देखा गया। इस खोज ने किन्नौर की उस समृद्ध पक्षी विविधता की ओर ध्यान खींचा है, जिसका अब तक पूरी तरह से वैज्ञानिक अन्वेषण नहीं हो पाया है।

प्रकृतिविदों और पक्षी प्रेमियों की टीम ने किया अवलोकन

यह महत्वपूर्ण पक्षी अवलोकन स्थानीय प्रकृतिविद महेश नेगी रोनसेरू और हिमांशु चौधरी द्वारा किया गया। इस दौरान उनके साथ पुणे से आए पक्षी प्रेमी चंद्रकांत भगवत, सुधाकर कुलकर्णी और श्रीराम टकले भी मौजूद थे। विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक अपरिपक्व (juvenile) पक्षी था। इसकी पहचान इसके पंखों की विशिष्ट बनावट, अपेक्षाकृत लंबी टांगों और शरीर के निचले हिस्से के रंगों समेत कई शारीरिक लक्षणों के आधार पर की गई। अक्टूबर के महीने में इस पक्षी का दिखना इसके दक्षिण की ओर होने वाले नियमित मौसमी प्रवास (migration) के बिल्कुल अनुरूप है।

पर्वतीय घास के मैदान और जलधाराएं बनीं महत्वपूर्ण पड़ाव

सामान्य तौर पर पैसिफिक गोल्डन प्लोवर को तटीय क्षेत्रों, समुद्र तटों और आर्द्रभूमियों से जोड़ा जाता है। ऐसे में 3,800 मीटर जितनी अधिक ऊंचाई पर इसका मिलना इस बात का संकेत है कि लंबे प्रवास के दौरान ऊंचे पर्वतीय घास के मैदान और छोटी जलधाराएं भी इन प्रवासी पक्षियों के लिए बेहद अहम पड़ाव (stopover sites) साबित होती हैं। हिमाचल प्रदेश में इस प्रजाति के पहले के रिकॉर्ड मुख्य रूप से पौंग बांध क्षेत्र से मिले हैं, जहां मई 2026 में डॉ. अभिनव चौधरी ने भी इसका उल्लेख किया था। इसके अलावा, लाहुल-स्पीति के ट्रांस-हिमालयी क्षेत्रों से भी इस प्रजाति की उपस्थिति के पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध रहे हैं। अब किन्नौर में इसकी पुष्टि होने से राज्य में इसके भौगोलिक वितरण और प्रवास मार्गों से जुड़ी जानकारी को और अधिक विस्तार मिला है।

अनछुए क्षेत्रों में छिपे हैं जैव विविधता के अनसुने सुराग

कल्पा के स्थानीय प्रकृतिविद महेश नेगी रोनसेरू का मानना है कि किन्नौर जिले के कई दूरदराज इलाके ऐसे हैं, जिनका अभी तक वैज्ञानिक दृष्टि से व्यवस्थित अध्ययन होना बाकी है। यदि इन क्षेत्रों में नियमित सर्वेक्षण और पक्षी अवलोकन अभियान चलाए जाएं, तो यहां पक्षियों और अन्य वन्यजीवों के कई नए रिकॉर्ड सामने आ सकते हैं। इस प्रकार की खोजें न केवल क्षेत्र की स्थानीय जैव विविधता को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती हैं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को मजबूत करने और पर्वतीय क्षेत्रों में प्रकृति पर्यटन (nature tourism) की नई संभावनाएं तलाशने का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। किन्नौर में पैसिफिक गोल्डन प्लोवर का यह पहला अभिलेखित होना यह रेखांकित करता है कि हिमालय के दुर्गम और अनछुए इलाकों में व्यवस्थित वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण से प्रकृति के कई अनदेखे पहलू दुनिया के सामने आ सकते हैं।

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निवेदिता ठाकुर

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निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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