वाराणसी के प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य और रसशास्त्र के अद्वितीय विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. सिद्धि नंदन मिश्र का 98 वर्ष की आयु में निधन हो गया है।
काशी के जाने-माने आयुर्वेदाचार्य डॉ. सिद्धि नंदन मिश्र का गुरुवार की शाम हृदयगति रुकने से उनके पैतृक आवास पर निधन हो गया। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रोफेसर मिश्र के निधन से आयुर्वेद जगत, काशी और पूरे देश को बड़ी क्षति हुई है। वे आयुर्वेद के रस विज्ञान शास्त्र के अनूठे विशेषज्ञ थे और उन्हें 'गुरुजी' के नाम से भी जाना जाता था।
रसशास्त्र में योगदान और पुस्तकें
डॉ. मिश्र ने रसशास्त्र के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया। उन्होंने इस विषय पर संस्कृत में अनेक पुस्तकें लिखीं, जिन्हें बाद में विभिन्न भाषाओं में अनुवादित करके देश भर के आयुर्वेद विद्यार्थियों को पढ़ाया गया। पटना आयुर्वेदिक कॉलेज के छात्र रहे डॉ. मिश्र ने अपने लंबे शैक्षणिक और चिकित्सकीय करियर के दौरान गुजरात आयुर्वेदिक यूनिवर्सिटी, पटना आयुर्वेदिक कॉलेज और वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में वे आयुर्वेद विभागाध्यक्ष के रूप में भी कार्यरत रहे।
पारा से स्वर्ण निर्माण का गुप्त ज्ञान
आयुर्वेदिक जगत में डॉ. सिद्धि नंदन मिश्र की पहचान देश के एकमात्र रस सिद्ध वैद्य के रूप में थी, जो औषधीय उपयोग के लिए पारद यानी पारा से स्वर्ण यानी सोना निर्माण की प्रक्रिया में पूरी तरह निपुण थे। हालांकि, इस रासायनिक सूत्र और ज्ञान का किसी भी रूप में दुरुपयोग न हो, इसलिए उन्होंने यह अनोखा ज्ञान किसी अन्य को नहीं सौंपा और इसे अपने तक ही सीमित रखा।
व्यक्तिगत जीवन और अंतिम संस्कार
डॉ. मिश्र लंबे समय से जहानाबाद जिले के हुलासगंज प्रखंड स्थित कंदौल गांव के पुश्तैनी आवास में पूरी जीवटता के साथ अकेले ही रह रहे थे। उनके परिवार में दो पुत्रियां हैं। वे बेहद संत स्वभाव के, धार्मिक और प्रख्यात शिवभक्त थे। एकादशी के पवित्र दिन उनके इस संसार से विदा होने को उनके अनुयायी और चिकित्सक वर्ग बहुत खास मान रहे हैं। उनके निधन से पूरे आयुर्वेद जगत और उनके निकटस्थ लोगों में गहरा मातम पसर गया है। उनका अंतिम संस्कार और अंत्येष्टि वाराणसी के श्मशान घाट पर संपन्न होगी।