फैशन वर्ल्ड में विजिबल मेंडिंग ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। जानिए कैसे फटे-पुराने और पैबंद लगे कपड़े नए कपड़ों से भी महंगे बिक रहे हैं और क्या है जापानी तकनीक।
फैशन की दुनिया में इन दिनों एक ऐसा अनूठा दौर चल रहा है, जहां कभी गरीबी और तंगी की निशानी माने जाने वाले फटे-पुराने और पैबंद लगे कपड़े लक्जरी फैशन का हिस्सा बन चुके हैं। यह ट्रेंड अब केवल स्टाइल तक सीमित नहीं है, बल्कि बाजार में ये मरम्मत किए गए कपड़े नए कपड़ों की तुलना में कई गुना अधिक महंगे दामों पर बेचे जा रहे हैं।
पारंपरिक रूप से कपड़ों की सिलाई और मरम्मत का उद्देश्य केवल फटे हुए वस्त्रों को दोबारा पहनने योग्य बनाना होता था ताकि पैसे बचाए जा सकें। लेकिन आधुनिक फैशन बाजार में तस्वीर बिल्कुल बदल चुकी है। अब लोग कपड़ों की मरम्मत कर उससे पैसे बचाने के बजाय पैसे कमाने का नया जरिया तलाश रहे हैं। इस अनोखे कारोबार की लोकप्रियता को देखते हुए दुनिया भर की बड़ी फैशन कंपनियां भी इस दौड़ में शामिल हो चुकी हैं।
ब्रिटेन की एलिस ब्राउन बनीं इस ट्रेंड का बड़ा चेहरा
इस वैश्विक फैशन बदलाव में ब्रिटेन की 27 वर्षीय फॉरेस्ट रेंजर एलिस ब्राउन एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरी हैं। एलिस सेकंड हैंड दुकानों से ऐसे कपड़े खरीदती हैं जिनमें छेद या खामियां होती हैं। इसके बाद वह 'नीडल फेल्टिंग' तकनीक की मदद से उन छेदों पर सुंदर जानवरों और कलाकृतियों की आकृतियां तैयार कर देती हैं। उनके इस अनूठे हुनर को सोशल मीडिया पर अत्यधिक पसंद किया गया है, जिसके चलते उनके फॉलोवर्स की संख्या में भी भारी इजाफा हुआ है।
क्या है 'विजिबल मेंडिंग' और इसका इतिहास
एलिस ब्राउन जैसी कलाकारों के प्रयासों के बाद से 'विजिबल मेंडिंग' (Visible Mending) का ट्रेंड फैशन जगत में मजबूती से टिक हुआ है। विजिबल मेंडिंग का सीधा अर्थ एक ऐसी मरम्मत से है जिसमें कपड़े की कमी या फटे हुए हिस्से को छिपाया नहीं जाता, बल्कि उसे कलात्मक रूप से आकर्षक बनाकर जानबूझकर प्रदर्शित किया जाता है। जानकारों के अनुसार, यह कोई एकदम नया चलन नहीं है, बल्कि इसे मुख्यधारा के फैशन में लोकप्रिय हुए लगभग 6 साल का समय बीत चुका है।
यूज एंड थ्रो संस्कृति और प्रदूषण के खिलाफ विरोध
अस्सी के दशक (1980s) में फैशन इंडस्ट्री में एक बड़ा बदलाव आया था जब 'यूज एंड थ्रो' (इस्तेमाल करो और फेंको) संस्कृति तेजी से हावी हुई। इस मानसिकता के चलते कपड़ों को दोबारा सिलकर और सहेजकर इस्तेमाल करने की पुरानी कला कहीं पीछे छूट गई थी। हालांकि, आज का उपभोक्ता वर्ग इस आधुनिक विजिबल मेंडिंग ट्रेंड को केवल एक फैशन स्टेटमेंट नहीं मान रहा है। इसे अत्यधिक प्रदूषण, बढ़ते कार्बन उत्सर्जन और कपड़ा उद्योगों में मजदूरों की दयनीय स्थिति के खिलाफ एक वैचारिक असंतोष और विरोध के रूप में भी देखा जा रहा है।
जापानी 'बोरो' और 'साशिको' तकनीक की भारी मांग
फटे-पुराने कपड़ों को नया और प्रीमियम रूप देने के लिए आजकल लोग जापान की पारंपरिक तकनीकों जैसे 'बोरो' (Boro) और 'साशिको' (Sashiko) को बड़े पैमाने पर सीख रहे हैं। इस पारंपरिक जापानी पद्धति में सिलाई के लिए कपड़े के रंग से मेल खाते धागों का उपयोग करने के बजाय चटख रंगों या सफेद धागों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे वस्त्रों पर अद्भुत और कलात्मक डिजाइन उभर कर आते हैं। यही वजह है कि ये वस्त्र सामान्य कपड़ों की तुलना में अधिक आकर्षक और महंगे बिकते हैं।