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भोपाल नेशनल लोक अदालत: एक दिन में 18 हजार से ज्यादा मामलों का निपटारा, 88 करोड़ के अवार्ड पारित

भोपाल नेशनल लोक अदालत: एक दिन में 18 हजार से ज्यादा मामलों का निपटारा, 88 करोड़ के अवार्ड पारित

न्याय की लंबी और खर्चीली प्रक्रियाओं से राहत पाने की चाह रखने वालों के लिए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से एक बेहद सुकून भरी खबर सामने आई है। जिला न्यायालय परिसर में आयोजित वर्ष की तृतीय नेशनल लोक अदालत ने साबित कर दिया कि थोड़ी सी समझाइश और आपसी बातचीत से बड़े से बड़े विवादों का अंत मुमकिन है। इस विशेष न्यायिक आयोजन में एक ही दिन के भीतर हजारों उलझे हुए मामलों का ऐसा समाधान निकला, जिसने न सिर्फ अदालतों का बोझ कम किया, बल्कि कई परिवारों के चेहरे पर दोबारा मुस्कान भी लौटा दी।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण नई दिल्ली और मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण जबलपुर के दिशा-निर्देशों के तहत आयोजित इस विशाल लोक अदालत का माहौल पूरी तरह से सकारात्मक ऊर्जा से भरा हुआ था। कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण भोपाल के अध्यक्ष मनोज कुमार श्रीवास्तव द्वारा दीप प्रज्वलित कर की गई। इस दौरान मां सरस्वती और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के चित्रों पर माल्यार्पण कर न्याय और सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प दोहराया गया।

57 खंडपीठों का हुआ था गठन, दूर-दूर तक पहुंची न्याय की पहुंच

आम जनता को त्वरित और सुलभ न्याय दिलाने के उद्देश्य से इस लोक अदालत के लिए व्यापक स्तर पर तैयारियां की गई थीं। जिला न्यायालय भोपाल के साथ-साथ कुटुंब न्यायालय भोपाल, सिविल न्यायालय बैरसिया और औद्योगिक न्यायालय में कुल 57 अलग-अलग खंडपीठों (Benches) का गठन किया गया था। इन सभी खंडपीठों में सुबह से ही पक्षकारों और अधिवक्ताओं की भारी भीड़ देखने को मिली। हर कोई अपने लंबित विवादों को हमेशा के लिए खत्म कर एक नई शुरुआत करने के लिए उत्सुक नजर आ रहा था।

इस मेगा लोक अदालत में विभिन्न प्रकृति के कुल 18,086 मामलों का सफल निराकरण किया गया। इनमें 5,146 लंबित प्रकरण थे, जबकि 12,940 मामले प्री-लिटिगेशन स्तर के थे, यानी जिन्हें अदालत तक पहुंचने से पहले ही आपसी सहमति से सुलझा लिया गया। इन सभी मामलों के निपटारे के बाद कुल 88 करोड़ 68 लाख 9 हजार 922 रुपये के अवार्ड पारित किए गए, जो अपने आप में एक बड़ा आंकड़ा है।

विभिन्न विभागों और श्रेणियों के मामलों पर एक नजर

लोक अदालत की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि इसमें समाज के हर वर्ग और हर तरह के कानूनी विवाद को जगह मिली। विभागवार और श्रेणीवार आंकड़ों पर गौर करें तो:

  • चेक बाउंस प्रकरण: व्यापारिक और वित्तीय लेन-देन से जुड़े 589 मामलों का निपटारा हुआ।
  • मोटर दुर्घटना दावा: पीड़ितों को आर्थिक संबल देने वाले 707 मामलों में समझौते किए गए।
  • आपराधिक राजीनामा योग्य मामले: आपसी गिले-शिकवे दूर करते हुए 776 आपराधिक मामलों को खत्म किया गया।
  • पारिवारिक विवाद: टूटेते रिश्तों को जोड़ने के उद्देश्य से 148 पारिवारिक मामलों में सफलता मिली।
  • बैंक रिकवरी: बैंकों के फंसे हुए कर्ज से जुड़े 479 मामलों का समाधान हुआ।
  • व्यवहार वाद (Civil Suits): संपत्ति और दीवानी प्रकृति के 65 मामले सुलझाए गए।
  • विद्युत अधिनियम: बिजली चोरी और बिलों से जुड़े 1,805 मामलों का निराकरण किया गया।
  • श्रम विभाग: मजदूरों और नियोक्ताओं के बीच के 18 मामलों को हल किया गया।
  • जलकर एवं संपत्ति कर: नगर निगम से जुड़े टैक्स विवादों के 9,974 मामलों का निपटारा हुआ।
  • यातायात चालान: ट्रैफिक से जुड़े 743 छोटे-मोटे मामलों का मौके पर निस्तारण किया गया।
  • राजस्व प्रकरण: जमीन और राजस्व से जुड़े 1,075 मामलों को सुलझाया गया।
  • इसके अलावा आर्बिट्रेशन के 27, प्लीड बार्गेनिंग के 46 और अन्य श्रेणियों के 1,634 प्रकरण भी इस महाअभियान का हिस्सा बने।

दर्द के आंसुओं के बीच उम्मीद की किरण: सड़क दुर्घटना के मुआवजे पर समझौता

लोक अदालतें केवल आंकड़ों का खेल नहीं होतीं, बल्कि इनके पीछे इंसानी भावनाएं और दर्द भी जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक मार्मिक और राहत भरा मामला मोटर दुर्घटना दावे से जुड़ा सामने आया। दिव्यांश पटवारी नामक युवक की 25 नवंबर 2023 को दिल्ली में एक भीषण सड़क दुर्घटना में अकाल मृत्यु हो गई थी। इस असहनीय वियोग से टूटे परिजनों, विशेषकर उनकी माता मंजू पटवारी ने मोटर यान अधिनियम के तहत न्याय और क्षतिपूर्ति के लिए दावा पेश किया था।

लोक अदालत के दौरान टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी और पीड़ित परिवार के बीच चली सकारात्मक चर्चा के बाद 34 लाख 50 हजार रुपये के हर्जाने पर आपसी समझौता तय हुआ। समझौते की औपचारिकताएं पूरी होते ही मंच पर ही आवेदक को राशि का चेक सौंप दिया गया। हालांकि यह राशि उस युवा बेटे की कमी को कभी पूरा नहीं कर सकती, लेकिन इस आर्थिक मदद ने शोकसंतप्त परिवार को भविष्य की अनिश्चितताओं से लड़ने का एक संबल जरूर प्रदान किया।

जब टूटे रिश्ते फिर जुड़े: अदालत कक्ष में खिले चेहरे

जिंदगी की भागदौड़ और वैचारिक मतभेदों के चलते कई बार हंसते-खेलते परिवार बिखरने की कगार पर पहुंच जाते हैं। भोपाल की इस लोक अदालत ने पारिवारिक मामलों में जो परिणाम दिए, उसने साबित कर दिया कि अगर नीयत साफ हो तो रिश्तों की हर दरार को भरा जा सकता है। लोक अदालत में कई ऐसे दंपती पहुंचे थे जो आपसी अहंकार और वैमनस्य के कारण एक-दूसरे से कानूनी रूप से अलग होने का मन बना चुके थे।

काउंसलिंग और जजों की समझाइश के बाद एक ऐसे मामले में चमत्कारिक परिणाम आया जहां 22 जनवरी 2022 को विवाह के बाद पति-पत्नी के बीच गंभीर वैचारिक मतभेद पैदा हो गए थे और पत्नी अलग रहने लगी थी। लोक अदालत में हुई लंबी बातचीत के बाद दोनों पक्षों ने अपने पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक बार फिर से साथ हंसी-खुशी जीवन बिताने का संकल्प लिया।

इसी प्रकार, वर्ष 2025 से लंबित एक और पारिवारिक विवाद का भी सुखद अंत हुआ। एक अन्य मामले में 12 मार्च 2004 को विवाह के बंधन में बंधे एक दंपती, जिनके दो जवान बेटे भी हैं, आपसी गलतफहमियों के चलते तलाक (विवाह विच्छेद) के लिए अदालत की चौखट तक पहुंच चुके थे। सालों के इस लंबे तनाव को लोक अदालत के मंच पर चंद घंटों की संवेदनशीलता भरी चर्चा ने खत्म कर दिया। दोनों ने अपने बच्चों के भविष्य और पुराने प्रेम का हवाला देते हुए साथ रहने पर सहमति जताई, जिससे पूरा परिवार एक बार फिर एकजुट हो गया।

इनकी बदौलत परवान चढ़ा न्याय का यह उत्सव

इतनी बड़ी संख्या में मामलों का शांतिपूर्ण ढंग से निपटारा होना किसी एक व्यक्ति या विभाग के बूते की बात नहीं थी। इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे न्यायपालिका, प्रशासन और आम जनता का संयुक्त प्रयास था। इस आयोजन की सफलता में विशेष रूप से न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं, न्यायालयीन कर्मचारियों, नगरीय प्रशासन, पुलिस विभाग, विभिन्न बैंकों के अधिकारियों और सबसे बढ़कर उन पक्षकारों का अहम योगदान रहा जिन्होंने अपने अहंकार को छोड़कर समझौते का हाथ थामा।

कार्यक्रम के दौरान विशेष न्यायाधीश राजर्षि श्रीवास्तव, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अग्नीध्र कुमार द्विवेदी, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव एवं न्यायाधीश सुनीत अग्रवाल, पुलिस कमिश्नर संजय कुमार, एडीएम पी.सी. शाक्य, मध्यप्रदेश राज्य अधिवक्ता परिषद के सदस्य राजेश व्यास, अभिभाषक संघ के अध्यक्ष देवेंद्र रावत, सचिव मुकेश नागपुरे और जिला विधिक सहायता अधिकारी मुहम्मद जीलानी सहित तमाम गणमान्य लोग उपस्थित रहे। लोक अदालत ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि मुकदमों की तारीखों के दलदल में फंसने से बेहतर है कि आपसी संवाद के जरिए शांति का रास्ता चुना जाए।

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नसीम अहमद

नसीम अहमद

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नसीम अहमद जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं। उन...

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