धर्म परिवर्तन के बाद पुराने सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण का दावा स्वतः स्वीकार्य नहीं: शीर्ष अदालत का स्पष्ट निर्देश
नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन और आरक्षण के एक महत्वपूर्ण मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि हिंदू धर्म छोड़कर किसी अन्य भिन्न धर्म को अपनाने वाला व्यक्ति अपने पुराने सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण का दावा स्वतः नहीं कर सकता है। अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और पहचान धर्म बदलने के साथ ही नई व्यवस्था के अधीन हो जाती है।
न्यायालय ने अपने फैसले में रेखांकित किया है कि धर्म परिवर्तन के उपरांत किसी व्यक्ति की पिछली सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा पिछड़ापन नए धर्म में स्वतः जारी नहीं माना जा सकता। सामाजिक पिछड़ेपन की स्थिति और उसकी पहचान नए धार्मिक और सामाजिक ढांचे के आधार पर तय होती है, इसलिए पुराने आधार पर मिलने वाले संरक्षण स्वतः स्थानांतरित नहीं होते हैं।
संवैधानिक प्रावधान और अनुसूचित जाति का दायरा
संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश के प्रावधानों के अनुसार, हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अलावा अन्य धर्मों को मानने वाले किसी भी व्यक्ति को अनुसूचित जाति (SC) का सदस्य नहीं माना जाता है। इस कानूनी स्थिति के चलते, जब कोई व्यक्ति इन निर्धारित धर्मों को छोड़कर किसी अन्य धर्म में परिवर्तन करता है, तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा कानूनी रूप से समाप्त हो जाता है।
दर्जा समाप्त होने के बाद उस विशेष श्रेणी पर आधारित आरक्षण और उससे जुड़े अन्य संवैधानिक तथा प्रशासनिक लाभों का दावा करने का अधिकार भी स्वतः समाप्त हो जाता है। यह निर्णय देश में धर्मांतरण के बाद मिलने वाले आरक्षण के दावों और कानूनी स्थिति को और अधिक स्पष्ट करता है।