महामारी के उस खौफनाक दौर को शायद ही कोई भूला हो, जब अपने ही अपनों से दूर भाग रहे थे। अस्पताल के गलियारों में सन्नाटा था और डॉक्टर-नर्स अपनी जान हथेली पर रखकर मरीजों की सेवा कर रहे थे। तब इन कोरोना योद्धाओं को 'भगवान का रूप' कहा गया था। लेकिन, संकट टलते ही इन रक्षक कहे जाने वाले योद्धाओं को अंधेरे में धकेल दिया गया। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक बार फिर वही पीपीई किट नजर आई, लेकिन इस बार मामला जान बचाने का नहीं, बल्कि खुद के वजूद और रोजगार को बचाने की गुहार का था।
पीपीई किट पहनकर क्यों पहुंचे कोरोना योद्धा?
बुधवार का दिन भोपाल की राजनीति और स्वास्थ्य महकमे के लिए एक अलग ही तस्वीर लेकर आया। जब प्रदेशभर से आए अस्थाई स्वास्थ्यकर्मी पीपीई किट पहनकर सीधे नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के आवास पर पहुंचे, तो हर कोई हैरान रह गया। उनका यह पहनावा सिर्फ एक पोशाक नहीं थी, बल्कि यह सरकार को उस दौर की याद दिलाने का एक सांकेतिक तरीका था जब इन लोगों ने अपनी जान की परवाह किए बिना अपनी सेवाएं दी थीं।
संघ के आंकड़ों के मुताबिक, मध्यप्रदेश में ऐसे करीब 4 हजार स्वास्थ्यकर्मी हैं, जो कोरोना काल में अग्रिम मोर्चे (frontline) पर डटे हुए थे। इनमें आयुष चिकित्सक, स्टाफ नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ और लैब टेक्नीशियन शामिल हैं। इन सभी का साफ कहना है कि उन्हें जुबानी तारीफ या कागजी सम्मान प्रमाण पत्र नहीं, बल्कि स्थायी रोजगार और सेवा में समायोजन चाहिए।
1 अप्रैल 2022 का वह फैसला और बढ़ता संकट
आखिर इन स्वास्थ्यकर्मियों के सामने यह संकट आया कैसे? इसकी शुरुआत 1 अप्रैल 2022 को हुई, जब सरकार ने कोविड संकट कम होने का हवाला देते हुए इनकी सेवाएं समाप्त कर दीं। इन लोगों ने लगभग दो साल तक कोविड केयर सेंटर, फीवर क्लीनिक, सैंपलिंग सेंटर्स और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं में दिन-रात काम किया था।
जैसे ही संक्रमण का ग्राफ नीचे आया, इन अस्थायी योद्धाओं की नौकरियां भी एक झटके में चली गईं। तब से लेकर आज तक, ये पिछले कई वर्षों से लगातार संघर्ष कर रहे हैं। इनमें से कई लोगों के परिवारों के सामने आर्थिक तंगी और भुखमरी तक की नौबत आ गई है। उनका सवाल है कि जब महामारी के समय उनकी जरूरत थी, तो वे कोरोना योद्धा बन गए और हालात सामान्य होते ही उन्हें सड़क पर क्यों छोड़ दिया गया?
नीलम पार्क में अनिश्चितकालीन धरना और आंदोलन की सुगबुगाहट
अपनी उपेक्षा से आहत इन स्वास्थ्यकर्मियों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। इसी कड़ी में बीते 5 अक्टूबर से भोपाल के ऐतिहासिक नीलम पार्क में इनका अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन जारी है। कड़ाके की ठंड हो या धूप, ये कोरोना योद्धा अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं।
- मुख्य मांग: कोविड काल के अनुभव के आधार पर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में प्राथमिकता और समायोजन।
- विरोध का तरीका: पीपीई किट पहनकर अपनी पुरानी यादों और सरकार के वादों की याद दिलाना।
- संघर्ष: पिछले कई सालों से लगातार प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद अब सड़क पर उतरना।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का कड़ा रुख
कोरोना योद्धाओं के प्रतिनिधिमंडल ने जब अपनी पीड़ा नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के सामने रखी, तो उन्होंने सरकार को आड़े हाथों लिया। सिंघार ने दो टूक शब्दों में कहा कि कोरोना योद्धाओं का सम्मान केवल भाषणों या कागजी प्रमाण पत्रों से नहीं किया जा सकता। सम्मान का असली मतलब तब है जब उन्हें उनके अनुभव और योग्यता के मुताबिक रोजगार दिया जाए।
नेता प्रतिपक्ष ने सोशल मीडिया और अपनी बैठकों के जरिए भी सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा, "जब आज भी प्रदेश के कई दूरदराज इलाकों और अस्पतालों में स्वास्थ्य अमले और मानव संसाधन की भारी कमी है, तो ऐसे में इन अनुभवी और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की सेवाओं का लाभ क्यों नहीं उठाया जा रहा?" उन्होंने मुख्यमंत्री से सीधे अपील की है कि इन युवाओं से सार्थक संवाद किया जाए और इनकी समस्याओं का स्थायी समाधान निकाला जाए।विधानसभा से लेकर सड़क तक गूंजेगी आवाज
उमंग सिंघार ने प्रदर्शनकारी स्वास्थ्यकर्मियों को यह भरोसा दिलाया है कि उनकी इस जायज मांग को आगामी विधानसभा सत्र में पूरी मजबूती के साथ उठाया जाएगा। उन्होंने सरकार की इस नीति पर भी सवाल उठाया कि संकट के वक्त जिन हाथों ने लोगों की जान बचाई, संकट टलते ही उन्हीं हाथों को बेरोजगार कर देना कहां का न्याय है?
फिलहाल, इन 4 हजार परिवारों की निगाहें पूरी तरह से सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या सरकार इन अनुभवी स्वास्थ्यकर्मियों की सुध लेगी या फिर इन्हें यूं ही सड़कों पर संघर्ष करना पड़ेगा? यह आने वाला वक्त ही तय करेगा, लेकिन इस आंदोलन ने एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।