स्वच्छता के मामले में देश भर में अपनी एक अलग पहचान बना चुका इंदौर शहर अपनी एक और अनूठी संस्कृति के लिए इन दिनों चर्चा के केंद्र में है। बात चाहे जन्मदिन के जश्न की हो, किसी नेता की स्वागत यात्रा की, चुनरी यात्रा की या फिर कांवड़ और सामूहिक विवाह जैसे आयोजनों की—शहर का कोना-कोना बड़े-बड़े पोस्टरों और बैनरों से पट जाता है। इन पोस्टरों की सबसे दिलचस्प बात यह होती है कि आयोजन चाहे धार्मिक हो या सामाजिक, उनके ठीक पीछे किसी न किसी राजनीतिक चेहरे की महत्वाकांक्षा साफ झलकती है। आखिर यह पोस्टर संस्कृति है क्या और तमाम प्रशासनिक सख्ती के बावजूद यह थमने का नाम क्यों नहीं ले रही है?
पोस्टर फटते ही सामने आते हैं राजनीतिक चेहरे
इंदौर की फिजाओं में इन दिनों एक जुमला बहुत आम है—'जब-जब फटा पोस्टर, तब-तब पीछे से निकला नेता!' यह केवल एक कटाक्ष नहीं, बल्कि शहर की जमीनी हकीकत को बयां करने वाला वाक्य है। शहर के मुख्य चौराहों, ट्रैफिक सिग्नलों, और व्यस्त सड़कों पर रातों-रात बड़े-बड़े होर्डिंग लग जाना आम बात हो गई है। हैरानी की बात यह है कि इन पोस्टरों पर शुभकामनाओं के नाम पर आयोजकों से ज्यादा उन नेताओं की तस्वीरें होती हैं जो आगामी चुनावों या स्थानीय राजनीति में अपनी जमीन मजबूत करना चाहते हैं। जब कभी हवा या प्रशासन की कार्रवाई से ये पोस्टर हटते या फटते हैं, तो उनके पीछे छिपे राजनीतिक समीकरण और चेहरों की दावेदारी खुलकर सामने आ जाती है।
नियम क्या कहते हैं और धरातल पर क्या है स्थिति?
नगर निगम और जिला प्रशासन के स्पष्ट नियम हैं कि शहर के डिवाइडर, फुटपाथ, बिजली के खंभों और सार्वजनिक संपत्ति पर बिना अनुमति के कोई भी विज्ञापन, पोस्टर या होर्डिंग नहीं लगाया जा सकता। इसके बावजूद, नियमों की धज्जियां किस तरह उड़ाई जाती हैं, इसका अंदाजा शहर के किसी भी प्रमुख चौराहे पर जाकर लगाया जा सकता है। डिवाइडर के बीचों-बीच गड़े लोहे के एंगल और उन पर तनी फ्लेक्स की चादरें न केवल शहर की सुंदरता को बिगाड़ती हैं, बल्कि चालकों का ध्यान भटकाकर सड़क हादसों को भी खुला निमंत्रण देती हैं।
हाईकोर्ट की सख्ती का भी नहीं हो रहा असर
पोस्टर और बैनर संस्कृति को लेकर देश की न्यायपालिका भी समय-समय पर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुकी है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा भी इस अवैध होर्डिंग संस्कृति पर लगाम लगाने के लिए कई बार कड़े निर्देश जारी किए जा चुके हैं। अदालत की फटकार के बाद कुछ दिनों के लिए प्रशासनिक अमला हरकत में आता है, सड़कों से बैनर-पोस्टर हटाए जाते हैं और जुर्माने की कार्रवाई भी होती है। लेकिन हैरानी इस बात की है कि कार्रवाई का यह दौर थमते ही शहर की दीवारों और चौराहों पर फिर से पोस्टरों की बाढ़ आ जाती है।
क्यों खत्म नहीं हो रही यह संस्कृति?
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें स्थानीय राजनीति की नब्ज को टटोलना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक दलों में अपनी पैठ दिखाने और आलाकमान तक अपनी विजिबिलिटी बढ़ाने का सबसे आसान और सस्ता जरिया यही पोस्टर कल्चर बन गया है। जब तक कोई नेता या कार्यकर्ता चौराहों पर बड़ा नहीं दिखेगा, तब तक उसकी 'राजनीतिक सक्रियता' को जनता और पार्टी के बीच प्रभावी नहीं माना जाता। यही कारण है कि नियमों के उल्लंघन पर लगने वाला मामूली जुर्माना या चेतावनी इन आयोजकों और नेताओं के लिए कोई बड़ा मायने नहीं रखता।
आम नागरिकों की परेशानी और ट्रैफिक पर असर
- दुर्घटनाओं का खतरा: चौराहों पर लगे बड़े-बड़े होर्डिंग अक्सर ट्रैफिक सिग्नलों और टर्न्स पर विजिबिलिटी को पूरी तरह ब्लॉक कर देते हैं, जिससे तेज रफ्तार वाहनों के टकराने का खतरा बना रहता है।
- सौंदर्य को नुकसान: स्वच्छता के मामले में नंबर वन रहने वाले शहर में ये अवैध पोस्टर और फ्लेक्स विजुअल पॉल्यूशन का बड़ा कारण बन रहे हैं।
- सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान: सरकारी संपत्तियों, दीवारों और पुलों पर पोस्टर चिपकाने से शहर की संपत्ति कुरूप होती है।
आगे की राह: क्या इंदौर इस आदत से पा सकेगा छुटकारा?
सवाल यह उठता है कि क्या इंदौर इस पुरानी और गैर-कानूनी आदत से कभी पूरी तरह मुक्त हो पाएगा? जब तक राजनीतिक दल खुद अपनी इच्छाशक्ति से इस संस्कृति का त्याग नहीं करते और प्रशासन बिना किसी दबाव के लगातार और कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित नहीं करता, तब तक इस समस्या का कोई स्थायी समाधान मिलना मुश्किल नजर आता है। शहर की जनता अब यह उम्मीद लगाए बैठी है कि नियमों का पालन करवाने में न सिर्फ आम आदमी की जवाबदेही तय हो, बल्कि उन रसूखदार चेहरों पर भी नकेल कसे जाए जो इन पोस्टरों के पीछे छुपकर शहर के सौंदर्य और नियमों की धज्जियां उड़ाते हैं।