चिकित्सा क्षेत्र की पवित्रता और नियमों की सख्ती के कितने भी दावे कर लिए जाएं, लेकिन जब सरकारी ऑनलाइन पोर्टलों पर जमीनी हकीकत सामने आती है, तो बड़े-बड़े सिस्टमों की पोल खुल जाती है। मध्य प्रदेश से एक ऐसा ही हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और ऑनलाइन पोर्टल की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ एक गधे की तस्वीर और बेतुके विवरण के साथ किए गए आवेदन पर बाकायदा बीएससी नर्सिंग पासआउट का डिजिटल पंजीयन प्रमाणपत्र जारी कर दिया गया। यह मामला अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है।
कैसे खुला सरकारी सिस्टम का यह हैरान करने वाला राज?
यह पूरा वाकया कोई तकनीकी भूल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी स्टिंग नुमा प्रक्रिया के तहत सामने आया है। नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार ने मध्य प्रदेश नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल की ऑनलाइन पंजीयन प्रणाली की पारदर्शिता और सुरक्षा जांचने का फैसला किया। इस परीक्षण के दौरान जो सामने आया, उसने किसी को भी सकते में डाल दिया। काउंसिल के पोर्टल पर एक ऐसा आवेदन किया गया, जिसकी कल्पना शायद ही किसी जिम्मेदार अधिकारी ने की होगी।
आवेदन में आवेदक का नाम 'डंकी एमपीएनआरसी' और पिता का नाम 'डंकी फादर' दर्ज किया गया। इतना ही नहीं, फॉर्म में किसी इंसान की जगह एक गधे की तस्वीर अपलोड कर दी गई। धर्म के कॉलम में 'अन्य' और जाति के कॉलम में 'जानवर' लिखा गया। सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाली बात यह थी कि पते के कॉलम में साफ-साफ शब्दों में टाइप किया गया—'जहां पर जगह मिल जाए'।
दो हजार से ज्यादा का शुल्क भुगतान और मिल गया वैध सर्टिफिकेट
किसी भी सामान्य प्रक्रिया में दस्तावेजों की गहन जांच और क्रॉस-वेरिफ़िकेशन की उम्मीद की जाती है, लेकिन इस मामले में पोर्टल की ऑटोमेटेड प्रणाली ने किसी भी स्तर पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की। पंजीयन के लिए निर्धारित 2050 रुपये के शुल्क का ऑनलाइन भुगतान करते ही सिस्टम ने अपनी प्रक्रिया पूरी कर ली। कुछ ही समय में काउंसिल की तरफ से एक डिजिटल पंजीयन प्रमाणपत्र भी जारी कर दिया गया।
इस फर्जी डिजिटल सर्टिफिकेट के अनुसार, 'डंकी एमपीएनआरसी' को भोपाल नर्सिंग कॉलेज से बीएससी नर्सिंग पासआउट प्रमाणित कर दिया गया। यही नहीं, उसे एक रजिस्टर्ड नर्स और मिडवाइफ के रूप में भी मान्यता दे दी गई। हैरान करने वाली बात यह थी कि यह पंजीयन आगामी पांच यानी सितंबर 2031 तक के लिए पूरी तरह वैध भी घोषित कर दिया गया।
दस्तावेज सत्यापन की पुरानी और नई व्यवस्था में बड़ा फर्क
विशेषज्ञों और इस खुलासे को करने वाले नेताओं का कहना है कि ऑनलाइन प्रक्रियाओं के नाम पर कागजी कार्रवाई को इतना आसान कर दिया गया है कि इंसानी निगरानी लगभग खत्म हो चुकी है। पुरानी व्यवस्था पर नजर डालें तो नियम काफी कड़े हुआ करते थे:
- आवेदन के साथ 10वीं और 12वीं की अंकसूचियां लगानी होती थीं।
- बीएससी नर्सिंग कोर्स कंप्लीशन का मुख्य प्रमाण पत्र जरूरी था।
- प्रोविजनल डिग्री या डिप्लोमा के सभी सत्रों की मार्कशीट संलग्न करनी पड़ती थी।
- इन सभी दस्तावेजों पर संबंधित कॉलेज के प्राचार्य (Principal) की सील और हस्ताक्षर अनिवार्य थे।
- काउंसिल के भीतर स्तर पर इनकी भौतिक या डिजिटल रूप से सूक्ष्म जांच की जाती थी, जिसके बाद ही डिजिटल हस्ताक्षरयुक्त सर्टिफिकेट जारी होता था।
इसके उलट, वर्तमान डिजिटल प्रणाली में केवल ट्रेनिंग कंप्लीशन सर्टिफिकेट और डिग्री या डिप्लोमा की स्कैन कॉपी अपलोड करने का नियम बना दिया गया। सिस्टम में ऐसी कोई तकनीक या एल्गोरिदम नहीं रखा गया जो यह जांच सके कि अपलोड किया गया दस्तावेज वास्तव में उसी कोर्स से जुड़ा है या फिर उसकी जगह कोई अन्य फाइल या तस्वीर लगा दी गई है।
मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ का गंभीर खतरा
यह घटना भले ही पहली नजर में एक अजीब या हास्यस्पद मामला लगे, लेकिन इसके दूरगामी और बेहद खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। रवि परमार ने मीडिया के सामने अपनी बात रखते हुए स्पष्ट किया कि उनका मकसद सिर्फ सिस्टम की खामियों को उजागर करना था। उन्होंने चेताया कि यदि कोई शातिर ठग या फर्जीवाड़ा करने वाला व्यक्ति बिना किसी वास्तविक नर्सिंग योग्यता के इस तरह आसानी से पंजीयन हासिल कर लेता है, तो वह भविष्य में किसी भी अस्पताल, नर्सिंग होम या स्वास्थ्य संस्थान में आसानी से नौकरी पा सकता है।
अस्पतालों में ऐसे फर्जी और अयोग्य लोगों की मौजूदगी सीधे तौर पर मासूम मरीजों की जान और स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ एक बड़ा खिलवाड़ साबित हो सकती है। जब बुनियादी स्तर पर ही दस्तावेजों की विश्वसनीयता की धज्जियां उड़ रही हों, तो हेल्थ सेक्टर की सुरक्षा पर सवाल उठना लाजिमी है।
काउंसिल की प्रतिक्रिया और प्रशासनिक कार्रवाई
इस बड़े खुलासे और सोशल मीडिया पर मामला तूल पकड़ने के बाद मध्य प्रदेश नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल हरकत में आई। फौरी कदम उठाते हुए काउंसिल ने अपने आधिकारिक पोर्टल से ऑनलाइन पंजीयन का लिंक ही हटा दिया है। फिलहाल वेबसाइट पर नए पंजीयन की प्रक्रिया को अगले कुछ दिनों के लिए पूरी तरह रोक दिया गया है।
इस पूरे प्रकरण पर प्रतिक्रिया देते हुए मप्र नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल की अध्यक्ष, डॉ. बीनू कुशवाहा ने इसे एक सोची-समझी धोखाधड़ी (Fraud) करार दिया है। उन्होंने बताया कि काउंसिल की आईटी सेल को कड़े निर्देश दिए गए हैं कि वे वेबसाइट की सुरक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करें और उसमें अतिरिक्त सेफगार्ड्स (Safeguards) जोड़ें। साथ ही, इस पूरी करतूत को अंजाम देने वाले अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई और एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। उनका यह भी कहना था कि यह वेबसाइट विशेष रूप से योग्य विद्यार्थियों के लिए बनाई गई है, लेकिन कुछ लोग इसका गलत इस्तेमाल कर व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।
बहरहाल, यह घटना देश के तमाम डिजिटल पोर्टलों और ऑनलाइन सरकारी प्रणालियों की आंतरिक सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है। क्या सिर्फ वेबसाइट का लिंक हटा लेने या एफआईआर दर्ज कर देने से सिस्टम की यह बुनियादी कमजोरी दूर हो जाएगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इस वाकये ने यह जरूर साबित कर दिया है कि कागजी और डिजिटल सुरक्षा के दावों के बीच अभी भी मीलों का फासला बाकी है।