आवाहन अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री एवं कुंभ मेला प्रभारी महंत सत गिरि महाराज आगामी सिंहस्थ कुंभ की तैयारियों का जायजा लेने के लिए एक सप्ताह के प्रवास पर त्र्यंबकेश्वर पहुंच गए हैं।
नासिक और त्र्यंबकेश्वर में आयोजित होने वाले आगामी सिंहस्थ कुंभ मेले को दिव्य और भव्य रूप देने की तैयारियों के तहत आवाहन अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री एवं कुंभ मेला प्रभारी श्री महंत सत गिरि महाराज त्र्यंबकेश्वर स्थित अखाड़े में पहुंचे हैं। अपने एक सप्ताह के इस प्रवास के दौरान वे अखाड़े में चल रहे विभिन्न निर्माण कार्यों का प्रत्यक्ष निरीक्षण कर रहे हैं। इसके साथ ही, आगामी महाकुंभ के आयोजन को लेकर राज्य शासन, स्थानीय प्रशासन और सरकार के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए उनकी महत्वपूर्ण वार्ताओं का दौर भी जारी है।
अखाड़े में संवाद के दौरान महंत सत गिरि महाराज ने कहा कि त्र्यंबकेश्वर केवल एक भौगोलिक स्थल मात्र नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की चेतना का वह जागृत केंद्र है जहाँ साक्षात् देवाधिदेव महादेव विराजमान हैं।
त्र्यंबकेश्वर की पावन भूमि और महाकुंभ का महत्व
नासिक जिले में गोदावरी नदी के उद्गम स्थल ब्रह्मगिरि पर्वत की तलहटी में बसा त्र्यंबकेश्वर धाम देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में विशिष्ट स्थान रखता है। इस ज्योतिर्लिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देव तीन अलग-अलग विग्रहों यानी पिंडियों के रूप में एक साथ निवास करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि गौतम और माता अहिल्या की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहाँ प्रकट हुए थे और लोक-कल्याण के लिए ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए। यहीं से पतित-पावनी गोदावरी नदी का उद्गम होता है, जो दक्षिण भारत को पवित्र करती है और जिसे 'दक्षिण गंगा' भी कहा जाता है। शिव पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, यह भूमि कालसर्प दोष निवारण, पितृ दोष शांति और नारायण नागबलि जैसे धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है।
कुंभ पर्व और अमृत स्नान की परंपरा
समुद्र मंथन के दौरान निकले अमृत कलश से कुंभ पर्व का सीधा संबंध जुड़ा हुआ है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, देव-दानव संग्राम के समय जब अमृत कलश को लेकर छीना-झपटी हो रही थी, तब आकाश मार्ग से अमृत की कुछ बूंदें प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक-त्र्यंबकेश्वर इन चार स्थानों पर गिरी थीं। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, जब सूर्य, चंद्रमा और गुरु विशिष्ट राशियों विशेषकर सिंह राशि में प्रवेश करते हैं, तब गोदावरी के तट पर सिंहस्थ महाकुंभ का पर्व मनाया जाता है। इस अवधि में गोदावरी नदी का जल अमृत के समान दिव्य और औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है।
कुंभ मेले का मुख्य आकर्षण अमृत स्नान या राजयोगी स्नान होता है। शाही स्नान के निर्धारित दिनों में पूरा त्र्यंबकेश्वर क्षेत्र नागा संन्यासियों, अखाड़े के महामंडलेश्वरों, साधु-संतों और तपस्वियों के शंखनाद, डमरू की गूंज और 'हर-हर महादेव' के जयघोष से गुंजायमान हो जाता है। कुंभ मेले का शुभारंभ संतों के पारंपरिक जुलूस यानी पेशवाई से होता है, जिसमें संन्यासी अस्त्र-शस्त्रों और पारंपरिक वैभव के साथ कुशावर्त कुंड की ओर बढ़ते हैं। त्र्यंबकेश्वर में शाही स्नान मुख्य रूप से कुशावर्त कुंड में ही संपन्न होता है, जिसके बारे में मान्यता है कि महर्षि गौतम ने इसी कुंड को कुशा घास से घेरकर गोदावरी के वेग को नियंत्रित किया था। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, सिंहस्थ कुंभ के दौरान गोदावरी और कुशावर्त कुंड में स्नान करने से श्रद्धालुओं को मोक्ष की प्राप्ति होती है।