भारतीय राजनीति के गलियारों में अक्सर अपने बेबाक बयानों से सु्र्खियों में रहने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने एक बार फिर ऐसे बयान दिए हैं, जो राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गए हैं। इस बार उन्होंने न केवल केंद्र सरकार की विदेश नीतियों पर तीखे सवाल खड़े किए हैं, बल्कि अपनी ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के विचारों से भी असहमति जता दी है। श्रीनगर में मीडिया से खुलकर बात करते हुए अय्यर ने कूटनीति से लेकर संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली तक कई गंभीर मुद्दों पर अपने विचार रखे।
विदेश नीति और 'ढोंगी' रवैये पर कड़े सवाल
श्रीनगर में पत्रकारों से मुखातिब होते हुए मणिशंकर अय्यर ने भारत की मौजूदा विदेश नीति पर खुलकर बात की। उन्होंने पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के संबंधों के संदर्भ में केंद्र सरकार को घेरा। अय्यर का कहना था कि वैश्विक मंचों पर भारत का रुख और जमीन पर की जाने वाली कार्रवाई के बीच विरोधाभास नजर आता है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को लेकर असहज स्थिति बन सकती है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक तरफ जहां दुनिया को यह संदेश दिया जाता है कि यह युद्ध का दौर नहीं है, वहीं दूसरी ओर पड़ोसी देशों के साथ तनाव और संघर्ष की स्थितियां बनी रहती हैं। अय्यर ने कहा, “हम दुनिया से कहते हैं कि यह युद्ध का दौर नहीं है और फिर हम जाकर पाकिस्तान के साथ युद्ध करते हैं। हम कहते हैं कि कूटनीति और बातचीत होनी चाहिए, लेकिन जिन देशों के साथ हमारे कूटनीतिक संबंध और पारस्परिक बातचीत नहीं है, उनमें सिर्फ एक देश पाकिस्तान है।”
चीन और 'क्वाड' को लेकर क्या बोले कांग्रेस नेता?
चीन के साथ कूटनीतिक संबंधों पर बात करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश की मौजूदा विदेश नीति रणनीतिक स्वायत्तता से कोसों दूर है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का मुख्य उद्देश्य लेन-देन (Transactional) और अपने तात्कालिक राजनीतिक हितों साधना है, न कि किसी नैतिक या दीर्घकालिक नीति पर चलना।
चीन के मोर्चे पर अय्यर ने क्वाड (Quad) गठबंधन का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें शामिल होने से बीजिंग अनावश्यक रूप से नाराज हुआ है। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा समय में वैश्विक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और अमेरिका जैसी महाशक्तियों की तरफ से भी इस गठबंधन के महत्व को लेकर अलग तरह की बातें सामने आ रही हैं, जिस पर देश को गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।
मल्लिकार्जुन खरगे के बयान से स्पष्ट असहमति
इस पूरी बातचीत का सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से संवेदनशील हिस्सा वह था जब मणिशंकर अय्यर से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के चुनाव आयोग (ECI) को लेकर दिए गए बयानों के बारे में पूछा गया। आमतौर पर पार्टी लाइन के भीतर एकजुटता दिखाने का चलन होता है, लेकिन अय्यर ने बेहद साफगोई से अपने पार्टी प्रमुख की राय से किनारा कर लिया।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने हाल ही में चुनाव आयोग की स्वायत्तता और इसकी कार्यप्रणाली को लेकर तीखा हमला बोला था। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मणिशंकर अय्यर ने कहा, “मैं उनसे (मल्लिकार्जुन खरगे से) सहमत नहीं हूं। मैं मानता हूं कि हाल ही में हुए चुनावों तक चुनाव आयोग पूरी तरह से स्वायत्त तरीके से काम करता रहा है और मुझे नहीं लगता है कि किसी भी संवैधानिक संस्था को स्वायत्त बनाने के लिए किसी कानून के जरिए ऐसा प्रावधान करना जरूरी है।”
संवैधानिक संस्थाओं और नियुक्तियों की पारदर्शिता पर चिंता
हालांकि चुनाव आयोग की संस्थागत गरिमा का बचाव करते हुए अय्यर ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि प्रणाली में सुधार की गुंजाइश नहीं है। उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट का उदाहरण दिया।
अय्यर ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट का भी किसी स्वायत्त संस्था के तौर पर जिक्र नहीं किया गया है। वह एक संवैधानिक संस्था है। इसलिए किसी संस्था को संवैधानिक दर्जा देकर आप स्वाभाविक रूप से यह सुनिश्चित करते हैं कि वह स्वायत्त होगी, लेकिन फिर इसमें हस्तक्षेप किया गया है।” उन्होंने इसके साथ ही वर्तमान समय में चुनाव आयुक्तों और न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि इन पदों पर चयन की मौजूदा प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी नहीं कही जा सकती।
राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज
मणिशंकर अय्यर के इन बयानों के सामने आने के बाद राजनीतिक विश्लेषकों के बीच बहस छिड़ गई है। एक तरफ जहां विपक्षी दलों द्वारा केंद्र सरकार की विदेश नीति पर उठाए जाने वाले सवालों को अय्यर के बयानों से और बल मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर पार्टी अध्यक्ष से उनकी असहमति को लेकर राजनीतिक गलियारों में विभिन्न प्रकार के कयास लगाए जा रहे हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी के भीतर से इस खुलासे पर किस तरह की प्रतिक्रियाएं आती हैं और आने वाले दिनों में यह बयान किस प्रकार राष्ट्रीय राजनीति की दिशा को प्रभावित करता है। फिलहाल, अय्यर की यह बेबाक टिप्पणी एक बार फिर से देश की आंतरिक राजनीति के साथ-साथ कूटनीतिक बहसों के केंद्र में आ गई है।