महाराष्ट्र का मराठवाड़ा इलाका एक बार फिर से गंभीर जल संकट की चपेट में आ गया है। कुदरत की बेरुखी और मानसून के दौरान हुई बेवक्त और कम बारिश ने इस पूरे क्षेत्र की जीवन रेखा को हिला कर रख दिया है। आलम यह है कि ग्रामीण इलाकों में पानी की एक-एक बूंद के लिए हाहाकार मचा हुआ है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्तमान में इस क्षेत्र के 157 गांवों और 103 बस्तियों की प्यास बुझाने के लिए प्रशासन को कुल 295 टैंकरों का सहारा लेना पड़ रहा है।
बारिश के बाद भी नहीं टला संकट, बढ़ रही है टैंकरों पर निर्भरता
मराठवाड़ा में सूखे का यह साया कोई नया नहीं है, लेकिन इस बार स्थिति ने शुरुआती दौर में ही विकराल रूप धारण करना शुरू कर दिया है। जानकारों और स्थानीय निवासियों के अनुसार, इस साल मानसून सीजन में बारिश का कोटा पूरा नहीं हो पाया, जिसके चलते क्षेत्र के तमाम जलस्रोत और छोटे-छोटे जलाशय समय से पहले ही दम तोड़ने लगे। जलस्रोतों में पर्याप्त पानी जमा न होने के कारण भूजल स्तर में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
प्रशासन की ओर से मिली आधिकारिक जानकारियों के मुताबिक, पिछले महज 10 दिनों के भीतर ही टैंकरों की संख्या में 50 से अधिक की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ रहे हैं, पानी की किल्लत सुरसा की तरह विकराल होती जा रही है। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के पास अब टैंकरों के आने के इंतजार के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है।
मानसून से थी उम्मीदें, लेकिन अधूरा रह गया इंतजार
गर्मी के मौसम की शुरुआत के साथ ही मराठवाड़ा के सभी आठ जिलों में पानी की भारी किल्लत वाले इलाकों की पहचान कर चरणबद्ध तरीके से टैंकरों के जरिए जलापूर्ति की शुरुआत कर दी गई थी। उस वक्त प्रशासनिक अमले को पूरी उम्मीद थी कि जब मानसून पूरी तरह से सक्रिय होगा, तो झमाझम बारिश से सभी नदियां, नाले और कुएं लबालब भर जाएंगे। इसके बाद टैंकरों की इस बैसाखी की जरूरत स्वतः ही खत्म हो जाएगी।
हालांकि, मौसम की चाल ने प्रशासन और आम जनता दोनों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। पूरे क्षेत्र में अपेक्षित और समान रूप से बारिश न होने के कारण जलस्रोत रिचार्ज नहीं हो सके। जून महीने का शुरुआती दौर बीत जाने के बाद भी ग्रामीणों की निर्भरता पूरी तरह से पानी के टैंकरों पर ही टिकी रही। जुलाई के आखिरी हफ्ते की यदि बात करें, तो परभणी जिले को छोड़कर मराठवाड़ा के अन्य सात जिलों के लगभग 257 गांवों और 130 बस्तियों में कुल 428 टैंकरों के जरिए पानी की आपूर्ति की जा रही थी।
जुलाई के अंत और अगस्त के पहले सप्ताह में कुछ इलाकों में हल्की से मध्यम बारिश जरूर हुई, जिससे कुछ दिनों के लिए टैंकरों की संख्या में मामूली गिरावट दर्ज की गई थी। लोगों को लगा कि शायद अब संकट टल गया है, लेकिन यह राहत बहुत ही कम समय के लिए साबित हुई। अगस्त और सितंबर के महीनों में अधिकांश क्षेत्रों में संतोषजनक बारिश न होने के कारण भूजल स्तर और अधिक नीचे चला गया, जिससे जल संकट एक बार फिर से विकराल रूप लेकर सामने आ गया।
परिस्थिति से निपटने के लिए छह जिलों में 553 कुएं अधिग्रहित
बढ़ते जल संकट की गंभीरता को भांपते हुए स्थानीय प्रशासन ने एहतियातन कड़े कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। हाल ही में सामने आई 30 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, संभावित भीषण जल संकट से निपटने की तैयारियों के तहत मराठवाड़ा के कुल छह जिलों में युद्धस्तर पर कार्रवाई की गई है। हिंगोली और नांदेड को छोड़कर मराठवाड़ा के अन्य छह जिलों में कुल 553 निजी और सार्वजनिक कुओं का अधिग्रहण किया गया है। इन कुओं के पानी का इस्तेमाल अब सार्वजनिक जलापूर्ति के लिए किया जाएगा ताकि लोगों को राहत पहुंचाई जा सके।
जिलेवार कुओं के अधिग्रहण के आंकड़े इस प्रकार हैं:
- छत्रपति संभाजीनगर: 41 कुएं
- जालना: 24 कुएं
- परभणी: 3 कुएं
- बीड: 60 कुएं
- लातूर: 230 कुएं
- धाराशिव (उस्मानाबाद): 195 कुएं
इन आंकड़ों से साफ जाहिर है कि लातूर और धाराशिव जैसे जिलों में स्थिति कितनी ज्यादा संवेदनशील और चिंताजनक बनी हुई है, जहां अकेले इन दो जिलों में सैकड़ों कुओं को प्रशासन ने अपने कब्जे में लेकर जलापूर्ति की व्यवस्था से जोड़ा है।
जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव और भविष्य की बड़ी चुनौतियां
लगातार बढ़ रही टैंकरों की संख्या और कुओं के अंधाधुंध अधिग्रहण से यह स्पष्ट हो गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल का ढांचा किस हद तक दबाव में आ चुका है। भूजल का अत्यधिक दोहन होने से आने वाले दिनों में स्थिति और भी अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है। पर्यावरणविदों और जल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते पानी के संरक्षण और प्रभावी प्रबंधन की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले गर्मियों के महीनों में हालात बेहद भयावह हो सकते हैं।
फिलहाल, जिला प्रशासन और ग्रामीण विकास विभाग इस बात पर पूरा जोर दे रहा है कि हर प्रभावित गांव और बस्ती तक समय पर पानी की एक-एक बूंद पहुंचाई जाए। लेकिन यह केवल एक तात्कालिक समाधान है। मराठवाड़ा की इस चिरपरिचित जल समस्या का स्थायी हल खोजने के लिए लंबी अवधि की जल संचयन योजनाओं, नहरों के जीर्णोद्धार और वाटरशेड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स पर नए सिरे से काम करने की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है, ताकि हर साल इस इलाके के लोगों को प्यास बुझाने के लिए संघर्ष न करना पड़े।