सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को आधुनिक और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के बड़े-बड़े दावों की हकीकत धरातल पर कैसे दम तोड़ती है, इसकी एक बानगी हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में देखने को मिल रही है। जिला सिरमौर के एकमात्र एचआरटीसी (HRTC) नाहन डिपो को आधुनिक इलेक्ट्रिक बसों से लैस कर एक आदर्श 'ई-डिपो' के रूप में विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना को महज दो महीने के भीतर ही बड़ा झटका लगा है। जिस डिपो को भविष्य की परिवहन क्रांति का केंद्र माना जा रहा था, वहां से बसों के अचानक कम होने से आम जनता की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
महज दो महीने का सफर और उम्मीदों को झटका
घटनाक्रम इसी साल जुलाई और अगस्त के महीनों का है, जब सरकार की ओर से नाहन डिपो को कुल 25 अत्याधुनिक इलेक्ट्रिक बसें सौंपी गई थीं। शुरुआत में इस सौगात से पूरे इलाके में खुशी की लहर दौड़ गई थी। जुलाई के महीने में डिपो को 15 इलेक्ट्रिक बसें मिलीं, जिसके बाद उत्साह और बढ़ गया। इसके बाद, ठीक चार अगस्त को प्रदेश के उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने खुद नाहन बस स्टैंड पर पहुंचकर इन बसों का विधिवत शुभारंभ किया था।
प्रशासन और सरकार के उस वक्त के बयानों से ऐसा लगा था कि सिरमौर जिले के लोगों को अब अत्याधुनिक और प्रदूषणमुक्त यात्रा का बेहतरीन अनुभव मिलने वाला है। इसके बाद 20 अगस्त तक डिपो को 10 और इलेक्ट्रिक बसें मिल गईं, जिससे नाहन डिपो के बेड़े में ई-बसों की कुल संख्या बढ़कर 25 हो गई। लेकिन, यह खुशी बहुत लंबी नहीं टिक पाई। महज दो महीनों के भीतर ही स्थिति ऐसी पलटी कि ई-डिपो का यह सपना कागजों और बयानों तक ही सिमटता नजर आ रहा है।
अचानक क्यों कम हो गईं बसें?
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, नाहन डिपो को दी गई कुल 25 इलेक्ट्रिक बसों में से 10 बसें निगम प्रबंधन द्वारा वापस ले ली गई हैं। इन बसों को अब राज्य के अन्य डिपो जैसे रोहड़ू, रामपुर और पठानकोट भेज दिया गया है। इनमें से तीन बसें रोहड़ू, दो रामपुर और पांच बसें पठानकोट डिपो को आवंटित कर दी गई हैं।
सिर्फ इलेक्ट्रिक बसें ही नहीं, बल्कि मारक असर डीजल बसों पर भी पड़ा है। नाहन डिपो की पहले से चल रही 7 डीजल बसों को भी शिमला जिले के अलग-अलग डिपो के हवाले कर दिया गया है। ये डीजल बसें शिमला जिले के नेरवा, तारा देवी, रोहड़ू और शिमला लोकल यूनिट को भेजी गई हैं। इसके अलावा, एक और डीजल बस को शिमला लोकल यूनिट में भेजे जाने की सुगबुगाहट है। इस तरह कुल मिलाकर 17 बसें (10 इलेक्ट्रिक और 7 डीजल) नाहन डिपो से हटाए जाने के बाद से स्थानीय स्तर पर हड़कंप मचा हुआ है।
कंडम होती बसों और त्योहारों के बीच बढ़ी चिंता
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब नाहन डिपो पहले से ही वाहनों के भारी संकट से जूझ रहा है। स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे फेरबदल से ठीक तीन महीने पहले ही नाहन डिपो की 10 पुरानी बसें कंडम घोषित की जा चुकी हैं। स्थिति यहीं नहीं रुकती, बल्कि आने वाले अक्टूबर महीने के अंत तक 5 और बसें कंडम होने की कगार पर हैं।
एक तरफ जहां पुरानी बसें कबाड़ बन रही हैं, वहीं दूसरी तरफ डिपो के बेड़े से 17 अच्छी खासी बसों का दूसरे डिपो में चले जाना सिरमौर की जनता के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। ग्रामीण और शहरी रूटों पर बसों के फेरे कम होने की आशंका से दैनिक यात्रियों, विद्यार्थियों और नौकरीपेशा लोगों में भारी रोष और चिंता देखने को मिल रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में वैसे भी सार्वजनिक परिवहन ही आवाजाही का एकमात्र और मुख्य साधन है, ऐसे में बसों की यह किल्लत आम जनजीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करेगी।
अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का पक्ष
इस पूरे मामले पर जब प्रशासनिक पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो डिपो के डीडीएम रामदयाल ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि इन 10 इलेक्ट्रिक बसों को फिलहाल 'ट्रायल' के तौर पर शिमला भेजा गया है। हालांकि, जनता और स्थानीय प्रतिनिधियों का कहना है कि ट्रायल के नाम पर इस तरह से बसों को हटाना और डिपो को खाली करना न्यायसंगत नहीं है।
इस गंभीर मसले पर नाहन के स्थानीय विधायक अजय सोलंकी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि नाहन डिपो से इस प्रकार अचानक बसों को दूसरे डिपो में ट्रांसफर किए जाने के मामले को वे बेहद गंभीरता से ले रहे हैं। विधायक ने कहा कि वे इस संबंध में सीधे परिवहन मंत्री एवं प्रदेश के उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहो हर से मुलाकात कर विस्तृत चर्चा करेंगे। उनका प्रयास होगा कि इन सभी बसों को जल्द से जल्द वापस नाहन डिपो में लाया जाए ताकि सिरमौर की जनता को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
आगे क्या होगी राह?
फिलहाल, गेंद परिवहन विभाग के पाले में है। एक तरफ जहां सरकार हरित ऊर्जा (Green Energy) को बढ़ावा देने और इलेक्ट्रिक वाहनों को सुदूर इलाकों तक पहुंचाने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर इस तरह की व्यवस्था का चरमरा जाना कई बड़े सवाल खड़े करता है। क्या वाकई यह सिर्फ एक तकनीकी ट्रायल है या फिर इसके पीछे कोई और प्रशासनिक मजबूरी है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि जब तक ये बसें वापस नाहन डिपो नहीं लौटतीं, तब तक सिरमौर की सड़कों पर परिवहन व्यवस्था का यह संकट गहराया रहेगा।