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‘कितनी देर लगेगी, खाना खाना है...’ बेटियों ने वीडियो कॉल पर कराया पिता का अंतिम संस्कार

‘कितनी देर लगेगी, खाना खाना है...’ बेटियों ने वीडियो कॉल पर कराया पिता का अंतिम संस्कार

सोनीपत: "इसमें और कितना समय लगेगा? हमें खाना खाना है और नहाना भी है..." मोबाइल स्क्रीन के उस पार से आई यह आवाज किसी अजनबी की नहीं, बल्कि उस बेटी की थी, जिसकी बेहतर परवरिश और तालीम के लिए एक पिता ने अपनी पूरी जिंदगी न्योछावर कर दी थी।

हरियाणा के सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम में जब पूर्व कपड़ा व्यापारी शिवचरण राम रतन गुप्ता की चिता को अग्नि दी जा रही थी, तब उनकी बेटियां सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठकर मोबाइल स्क्रीन पर यह मंजर देख रही थीं। यह महज एक अंतिम संस्कार नहीं था, बल्कि बदलते समाज में बिखरते रिश्तों की एक झकझोर देने वाली तस्वीर थी।

सफलता की सीढ़ियां चढ़ीं बेटियां, छूट गया पिता का साथ

मुंबई के रहने वाले शिवचरण गुप्ता अपने दौर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी थे। उन्होंने खूब मेहनत की, नाम और पैसा कमाया। उनकी तीन बेटियां थीं— अनीता, निशा और प्रिया। शिवचरण ने अपनी बेटियों को पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाया। बेटियां भी अपने-अपने क्षेत्रों में सफल हुईं और अच्छे परिवारों में ब्याही गईं।

  • अनीता (बड़ी बेटी): नेपाल में शिक्षिका हैं।
  • निशा (मंझली बेटी): उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रहती हैं।
  • प्रिया (छोटी बेटी): मुंबई में अपने परिवार के साथ सेटल हैं।

सबकी अपनी दुनिया बस गई। लेकिन समय का पहिया ऐसा घूमा कि बुढ़ापे में माता-पिता अकेले पड़ गए।

वृद्धाश्रम का वो डेढ़ साल और खामोश इंतजार

जीवन के ढलते पड़ाव पर शिवचरण गुप्ता अपनी पत्नी मीना के साथ सोनीपत के 'समाज कल्याण शिक्षा समिति' ओल्ड-एज होम आ गए। कुछ समय पहले पत्नी का साथ छूट गया, जिसके बाद शिवचरण बिल्कुल अकेले पड़ गए थे।

वृद्धाश्रम प्रबंधन के मुताबिक, शिवचरण हमेशा अपनी बेटियों की कामयाबी के बारे में गर्व से बातें करते थे। मौत से करीब 20 दिन पहले जब उनकी तबीयत बिगड़ने लगी, तो बेटियों को इसकी जानकारी दी गई। लेकिन कोई हाल-चाल पूछने नहीं आया। पिता के पास जो फोन था, उस पर भी कॉल आनी बंद हो गईं।

ऑनलाइन 5,100 रुपये और वीडियो कॉल पर विदाई

मंगलवार को जब शिवचरण ने अंतिम सांस ली, तो आश्रम प्रबंधन ने फिर बेटियों से संपर्क किया कि वे आ जाएं ताकि अंतिम संस्कार किया जा सके। हालांकि, बेटियों ने साफ कह दिया कि उनके पास सोनीपत आने का समय नहीं है।

"नेपाल में रह रही बड़ी बेटी अनीता ने ऑनलाइन 5,100 रुपये ट्रांसफर किए और गुजारिश की कि अंतिम संस्कार कर दिया जाए। इसके बाद वीडियो कॉल के जरिए पिता को अंतिम विदाई दी गई।"

हद तो तब हो गई जब अंतिम संस्कार के दौरान ही एक बेटी ने कॉल पर पूछ लिया कि 'और कितनी देर लगेगी, हमें खाना भी खाना है।' इतना ही नहीं, बाद में अस्थियों को भी ले जाने से मना कर दिया गया और उन्हें गंगा में विसर्जित करने का आग्रह किया गया।

जाते-जाते दो लोगों को दे गए नई रोशनी

अपनों की इस बेरुखी के बावजूद शिवचरण गुप्ता का बड़प्पन जिंदा रहा। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार, निधन के तुरंत बाद उनकी आंखें दान कर दी गईं। जीते जी भले ही उन्हें अपनों का साथ न मिला हो, लेकिन जाते-जाते वे दो बेनूर जिंदगियों में रोशनी भर गए।

यह घटना सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं है, बल्कि आधुनिकता की दौड़ में पीछे छूटते मानवीय मूल्यों और बुजुर्गों के एकाकीपन पर एक गंभीर सवाल खड़ा करती है।

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तनु उपाध्याय

तनु उपाध्याय

Senior Sub Editor

तनु उपाध्याय एंटरटेनमेंट जगत की हलचल को करीब से समझती हैं और उसे दर्शकों के सामने आकर्षक अंदाज में पेश करती हैं। फिल्मों, टीवी, ओटीटी और वायरल ट्रे...

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